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'पाँडोरा की प्रमुख पहलों में से एक है 'पाँड एम्बैसडर कार्यक्रम', जिसके तहत छात्रों को किसी एक तालाब को “गोद लेने” और उसकी नियमित निगरानी व देखभाल का प्रशिक्षण दिया जाता है.

तालाबों की सफ़ाई के ज़रिए पर्यावरण व लोगों की भलाई की मुहिम, देव करन

© Dev Karan
'पाँडोरा की प्रमुख पहलों में से एक है 'पाँड एम्बैसडर कार्यक्रम', जिसके तहत छात्रों को किसी एक तालाब को “गोद लेने” और उसकी नियमित निगरानी व देखभाल का प्रशिक्षण दिया जाता है.

तालाबों की सफ़ाई के ज़रिए पर्यावरण व लोगों की भलाई की मुहिम, देव करन

जलवायु और पर्यावरण

भारत के एक किशोर देव करन ने, तालाबों की सफ़ाई और उनके संरक्षण के लिए ऐसा काम कर दिखाया है जिसने उन्हें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान और ख्याति दिला दी है. उनकी इस मुहिम में, पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लोगों की भलाई की नीयत व इरादा शामिल है.

देव करन, दुनिया के उन पाँच युवा बदलाव कर्ताओं में शामिल हैं, जिन्हें हाल ही में जिनीवा में आयोजित युवा कार्यकर्ता सम्मेलन (#YAS25) में सम्मानित किया गया. 

यह सम्मेलन उन युवाओं को मान्यता देता है जो तकनीक एवं सामुदायिक भागेदारी के ज़रिए सामाजिक व पर्यावरणीय परिवर्तन लाने के लिए काम कर रहे हैं.

भारत में तालाब और छोटे जल-स्रोत कभी जीवन का आधार होते थे. ये तालाब, तापमान घटाने, भूजल को भरने, खेती को सहारा देने व जैव विविधता की रक्षा करने में सहायक थे. 

लेकिन तेज़ी से होते शहरीकरण और समाज लापरवाही के कारण, ये तालाब अब धीरे-धीरे ग़ायब होते जा रहे हैं. बहुत से तालाब तो अब केवल सरकारी काग़ज़ों में ही बचे हैं.

भारत की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के निवासी देव करण ने, सामुदायिक जीवन में तालाबों की अहमियत और उनके अस्तित्व के लिए उत्पन्न हुए इस संकट को बचपन से महसूस किया. 

दिल्ली क्षेत्र में बढ़ती गर्मी, गिरता हुआ भूजल स्तर और पानी के लिए जूझती बस्तियाँ - इन सबका असर, देव करण ने अपने आसपास बहुत क़रीब से देखा.

'बैंगनी रंग' का तालाब

देव करन के लिए बदलाव का क्षण अचानक आया.

स्कूल में एक विज्ञान भ्रमण (science trip)  के दौरान वे अपने साथियों के साथ सोनीपत के पास एक गाँव पहुँचे, जहाँ उन्होंने एक ऐसा तालाब देखा जो प्लास्टिक और काई से इतना भर गया था कि पूरा पानी बैंगनी दिखाई दे रहा था.

देव याद करते हैं, “ऐसा तालाब हमने कभी नहीं देखा था. वह बहुत डरावना था. हम तुरन्त वहाँ के लोगों से मिलने गए.”

बातचीत में मालूम हुआ कि सफ़ाई अभियान तो होते हैं, लेकिन लोग, कुछ ही महीनों में तालाब की देखभाल करना छोड़ देते हैं और वह फिर से बिगड़ जाता है.

यह दृश्य देव के मन में एक गहरी बेचैनी छोड़ गया - आख़िर इतने अहम जल-स्रोतों की लगातार निगरानी और देखभाल क्यों नहीं की जा रही है?

दिल्ली क्षेत्र में पले-बढ़े देव करन ने तपती गर्मियाँ, तेज़ी से घटता भूजल, और सुरक्षित पीने के पानी के लिए जूझते गाँवों की कठिनाइयाँ अपनी आँखों से देखी थीं.
© Dev Karan

तालाबों के संरक्षक

2024 में देव ने Pondora नामक पहल शुरू की, जो सामुदायिक भागेदारी, युवजन की भूमिका और कम-लागत वाली तकनीक को साथ जोड़ती है. 

देव की 16 साल की उम्र में शुरू हुई यह मुहिम, अब कई ज़िलों तक फैल चुकी है और इसके तहत 15 से अधिक तालाबों की नियमित निगरानी की जा रही है.

Pondora का एक अहम हिस्सा है तालाब दूत कार्यक्रम (pond ambassador programme), जिसमें स्कूल के बच्चों को किसी एक तालाब को “गोद लेने” और उसकी नियमित जाँच–पड़ताल करने का प्रशिक्षण दिया जाता है.

देव कहते हैं, “हम केवल स्वयंसेवक नहीं बनाना चाहते हैं. हम ऐसे 30 युवा कार्यकर्ता तैयार करना चाहते हैं जो अपने घर-गाँव के पर्यावरण के लिए खड़े हो सकें, आवाज़ उठा सकें.”

अब तक 150 से अधिक छात्र इस काम में सक्रिय रूप से जुड़ चुके हैं.

देव करन और उनकी टीम कम लागत वाली स्थानीय तकनीकों पर भी लगातार काम करती है.
© Dev Karan

छोटे बदलाव, बड़ा असर

देव का मानना है कि तालाबों को बचाने की सबसे मज़बूत कुंजी है - तकनीक .

Pondora के साथ जुड़े हुए युवा, सरल कैमिकल पट्टियों और देव करण द्वारा बनाए गए क़िफ़ायती IoT किट की मदद से pH, TDS, तापमान और प्रदूषकों की जाँच करते हैं और सभी आँकड़े एक डिजिटल मानचित्र पर दर्ज करते हैं. 

इससे किसी भी तालाब की सेहत की समय-समय पर आसानी से निगरानी की जा सकती है.

देव ने कम–लागत वाला एक XyloCarbon शुद्धिकरण यंत्र (filter) भी विकसित किया है, जो लकड़ी के ऊतकों, दानेदार कार्बन और जाली की परतों से बनता है. 

यह शुद्धिकरण यंत्र उन गाँवों में साफ़ पेयजल उपलब्ध कराने में मदद करता है जहाँ पानी की गुणवत्ता एक गम्भीर समस्या है.

देव कहते हैं, “छोटा तालाब भी बेहद अहम होता है. वह भूजल भरता है, कार्बन को रोकता है और स्थानीय जैव विविधता को जीवित रखता है.”

देव करन, समुदायों को अहम जल-स्रोतों को बचाने व टिकाऊ जल प्रबंधन के बारे में जागरूक करते हैं.
© Dev Karan

समुदाय का भरोसा 

शुरुआत आसान नहीं थी. गाँव वालों को समझाना, और पंचायत से अनुमति लेना - सब में बहुत समय लगा. 

देव हँसते हुए कहते हैं, “सबसे जल्दी बच्चे समझे. वो हमसे तुरन्त जुड़ गए.”

धीरे-धीरे स्कूलों, पंचायतों और स्थानीय समूहों के साथ मिलकर काम बढ़ा.

आज स्थिति ये है कि कई गाँव ख़ुद Pondora को अपने यहाँ बुलाते हैं, ताकि अपने तालाबों को बचाने और सम्भालने की योजना बना सकें.

भारतीय किशोर देव करन को जिनीवा में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित युवा कार्यकर्ता सम्मेलन में सम्मानित किया गया.
© Young Activists Summit/Jérôme Favre

संयुक्त राष्ट्र सम्मान

नवम्बर में जिनीवा में आयोजित युवा कार्यकर्ता सम्मेलन का विषय था “From Hashtag to Action” - यानि ऑनलाइन आवाज़ों को ज़मीनी बदलाव का रूप देना.

इस मंच पर देव ने जापान, लेबनान, ब्राज़ील और आइवरी कोस्ट के युवा कार्यकर्ताओं के साथ हिस्सा लिया.

वो कहते हैं, “वहाँ जाकर समझ में आया कि हमारी समस्याएँ सीमाओं से बंधी नहीं हैं. हमारे समाधान भी, किसी एक देश तक सीमित नहीं, हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.”

कार्रवाई से बदलाव सम्भव

Pondora अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इससे स्पष्ट होता है कि तकनीक और सामुदायिक ताक़त के सहारे, किस तरह स्थानीय समस्याओं को हल किया जा सकता है.

देव का सपना है कि छात्र, आने वाले वर्षों में पूरे भारत में, तालाबों और छोटे जल-स्रोतों के संरक्षक बनें.

देव करन कहते हैं, “हर छोटी कार्रवाई मायने रखती है. भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन पर्यावरण की क़ीमत पर विकास नहीं हो सकता - और ग्रामीण युवाओं को पीछे छोड़कर तो बिल्कुल भी नहीं.”