वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का मुद्दा: ‘समानता, सम्मान व मानवाधिकारों का सवाल’

एक महिला अपने हाथ की हथेली पर लाल रंग का क्रॉस बनाकर दिखाती है, जो हिंसा को रोकने का प्रतीक है।
Agência Brasil/Joédson Alves ब्राज़ील की राष्ट्रीय न्याय परिषद (CNJ) ने महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा से निपटने के लिए iFood डिलीवरी मंच के साथ एक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का मुद्दा: ‘समानता, सम्मान व मानवाधिकारों का सवाल’

महिलाएँ

जब सलमा* केवल 15 साल की थीं, तो उनकी इच्छा के ख़िलाफ़ उनकी जबरन शादी कर दी गई. सलमा शिक्षा जारी रखना चाहती थीं और उनका सपना, डॉक्टर बनने का था. 

सलमा की ज़िन्दगी ने उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग मोड़ ले लिया. उन्हें ऐसे आदमी के साथ विवाब-बन्धन में बांध दिया गया जो, उनके शब्दों में, “शुरुआत में तो नरमदिल था, लेकिन बाद में राक्षस बन गया.”

सलमा बताती हैं, “वह मुझे अपने हाथों से पीटता था.”

यमन की यह युवा माँ सलमा, दुनिया की उन लगभग 84 करोड़ महिलाओं में से एक है - यानि हर तीन में से एक - जिन्होंने अपने किसी अंतरंग साथी, पूर्व पति या मौजूदा पति से शारीरिक या यौन हिंसा झेली है.

अफ़सोसनाक बात यह है कि साल 2000 से यह आँकड़ा लगभग बदला ही नहीं है. दो दशकों में इसमें हर साल केवल 0.2 प्रतिशत की हल्की सी गिरावट आई है.

केवल पिछले एक साल में ही, 15 साल या उससे अधिक उम्र की 11 प्रतिशत महिलाएँ - यानि लगभग 31.6 करोड़ - अपने अंतरंग साथी द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा की शिकार हुई हैं.

Tweet URL

एक गहरा अन्याय

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस कहते हैं, “महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा, मानवता के सबसे पुराने और सबसे व्यापक अन्यायों में से एक है, लेकिन उस पर सबसे कम कार्रवाई की गई है.”

प्रगति की इस कमी को बुधवार को जारी एक नई रिपोर्ट में दर्ज किया गया है, जिसे WHO और अन्य संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने मिलकर तैयार किया है.

यह रिपोर्ट साल 2000 से 2023 के बीच, 168 देशों के आँकड़ों का विश्लेषण करती है और दिखाती है कि यह संकट, कितनी गहरी उपेक्षा का शिकार है और इसके समाधान के लिए वित्तीय सहायता कितनी कम है.

पहली बार, इस रिपोर्ट में ऐसी यौन हिंसा के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अनुमान भी शामिल किए गए हैं, जिनमें हमलावर जीवनसाथी नहीं, बल्कि कोई अन्य पुरुष होते हैं - जैसेकि कोई रिश्तेदार या परिचित.

नतीजों से पता चलता है कि 15 साल की उम्र के बाद से अब तक 26.3 करोड़ महिलाओं ने, किसी ग़ैर-साथी पुरुष द्वारा की गई यौन हिंसा का सामना किया है. 

विशेषज्ञों का कहना है कि सामाजिक कलंक और डर की वजह से वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है.

वित्तीय सहयोग अपर्याप्त

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के लिए प्रभावी रणनीतियों के बढ़ते सबूतों के बावजूद, इन पर मिलने वाला वित्तीय सहयोग लगातार घट रहा है.

साल 2022 में वैश्विक विकास सहायता का केवल 0.2 प्रतिशत हिस्सा ही ऐसे कार्यक्रमों के लिए दिया गया, और उसके बाद से यह धनराशि और कम हो गई है.

यह ऐसे समय में हो रहा है, जब मानवीय आपात स्थितियाँ, बढ़ती असमानताएँ और अन्य संकट, दुनिया भर में लाखों महिलाओं और लड़कियों को हिंसा के और ज़्यादा ख़तरे में धकेल रहे हैं.

हिंसा की शुरुआत बहुत जल्दी

रिपोर्ट के मुताबिक़, हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं को अक्सर अनचाही गर्भावस्था, यौन संचारित संक्रमणों और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का अधिक ख़तरा होता है.

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा अक्सर बहुत कम उम्र से ही शुरू हो जाती है और पूरी ज़िन्दगी उनके लिए एक लगातार बना रहने वाला ख़तरा बन जाती है.

पिछले 12 महीनों में ही 15-19 साल की सवा करोड़ लड़कियों ने किसी अंतरंग साथी द्वारा की गई शारीरिक और/या यौन हिंसा झेली है.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल कहती हैं, “आँकड़े बताते हैं कि बहुत-सी महिलाएँ अपने साथी की हिंसा का सामना पहली बार किशोरावस्था में करती हैं."

"और बहुत-से बच्चे ऐसे घरों में बड़े होते हैं, जहाँ वे रोज़ देखते हैं कि उनकी माँ को धक्का दिया जाता है, मारा–पीटा जाता है या उसका अपमान किया जाता है - यानि हिंसा उनके रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाती है.”

उनका कहना है कि असली ज़रूरत इस हिंसा के चक्र को तोड़ने की है.

कार्रवाई, सहयोग और निवेश की ज़रूरत

रिपोर्ट महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा के उन्मूलन के अन्तरराष्ट्रीय दिवस से कुछ ही दिन पहले जारी की गई है, जो हर साल 25 नवम्बर को मनाया जाता है.

रिपोर्ट में सरकारों से ठोस कार्रवाई और पर्याप्त वित्तीय सहयोग की अपील की गई है, ताकि प्रमाण-आधारित रोकथाम कार्यक्रमों को बढ़ाया जा सके व हिंसा से बची महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, न्याय एवं सामाजिक सेवाएँ मज़बूत की जा सकें.

देशों से यह भी कहा गया है कि वे बेहतर डाटा प्रणालियों में निवेश करें, ताकि प्रगति पर नज़र रखी जा सके और उन समूहों तक पहुँचा जा सके, जो सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं. 

साथ ही, ऐसे क़ानून एवं नीतियाँ लागू की जाएँ जो महिलाओं व लड़कियों को सशक्त बनाएँ.

डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा, “कोई भी समाज ख़ुद को न्यायपूर्ण, सुरक्षित या स्वस्थ नहीं कह सकता, अगर उसकी आधी आबादी डर के साए में जी रही हो.”

उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “इस हिंसा को ख़त्म करना केवल नीतिगत विषय नहीं है; यह गरिमा, समानता एवं मानवाधिकारों का बुनियादी सवाल है.”

सलमा का सपना

काफ़ी संघर्षों के बाद सलमा* अब दोबारा स्कूल जाने लगी है. एक न्यायाधीश ने आख़िरकार उसे उसके माता-पिता की देखरेख में वापस जाने की अनुमति दे दी.

सलमा को संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) द्वारा संचालित एक सुरक्षित केन्द्र भेजा गया, जहाँ उसने अपने अधिकारों के बारे में सीखा - और डॉक्टर बनने के अपने सपने को फिर से मज़बूती से थाम लिया.

UNFPA की कार्यकारी निदेशक डिएन केइटा कहती हैं, “हमें तुरन्त, साथ मिलकर कार्रवाई करनी होगी, ताकि हर महिला व हर लड़की, अपने अधिकारों का इस्तेमाल करे, अपनी क्षमता पहचाने और न्यायपूर्ण, समान एवं समृद्ध समाजों के निर्माण में पूरी तरह भाग ले सके.”

*सुरक्षा के लिए नाम बदला गया है.