वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां
एक रेतीले समुद्र तट पर एक जैसी सफेद कमीजें और रंगीन साड़ियां पहने लोगों का एक समूह खड़ा है, जिनके हाथों में विरोध प्रदर्शन के संकेत हैं जिन पर 'ECRICC' लिखा हुआ है।

भारत: ओडिशा में कविता, संस्कृति और समुदाय सक्रियता के ज़रिए जलवायु मुहिम

© UNDP भारत जलवायु चैम्पियन, ECRICC परियोजना की रीढ़ हैं.

भारत: ओडिशा में कविता, संस्कृति और समुदाय सक्रियता के ज़रिए जलवायु मुहिम

जलवायु और पर्यावरण

भारत के ओडिशा प्रदेश की महिलाएँ चक्रवात-प्रवण पूर्वी तट पर एक शान्त जलवायु क्रान्ति की अगुवाई कर रही हैं. इस क्रान्ति में न तो विरोध प्रदर्शन हैं और न ही नीतिगत दस्तावेज़बल्कि इसमें शामिल हैं - कवितानृत्य और सामुदायिक भावना. ये महिलाएँ, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) समर्थित पहल के ज़रिए, तूफ़ानकटाव और हानि के अनुभवों को कविताओंगीतों एवं सतत आजीविकाओं में बदल रही हैं. यही बदलाव परिस्थितियों का सामना करने के हौसले व उम्मीद की नई कहानियाँ गढ़ रहा है.

ओडिशा के 575 किलोमीटर लम्बे तटीय इलाक़े के लोग, दशकों से समन्दर की लय के साथ जीते आए हैं. बंगाल की खाड़ी में, हर कुछ वर्षों के बाद, उठने वाले चक्रवात, फ़सलें तबाह कर देते हैं, घरों को बहा ले जाते हैं और खारा पानी उपजाऊ ज़मीनों में छोड़ जाते हैं. 

स्थानीय समुदाय बार-बार अपना जीवन फिर से बसाते हैं, लेकिन हर तूफ़ान पहले से कहीं गहरी चोट दे जाता है.

केंद्रपाड़ा की जलवायु चैम्पियन ममता माई कहती हैं, “हमें हर चक्रवात के बाद, फिर से बिल्कुल नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ती है. जब हवाएँ चलती हैं तो वो केवल हमारी छतें ही नहीं उड़ा देतीं, बल्कि हमारे मन की शांति भी छीन लेती हैं.”

ममता इस दर्द को भलीभाँति जानती हैं - उनके बचपन का गाँव सातभाया, पूरी तरह समुद्र में समा गया था. आज वे उसी पीड़ा का सामना करने को अपना उद्देश्य बना चुकी हैं. 

ममता अब, ECRICC परियोजना के तहत, पास के चार गाँवों में काम का नेतृत्व करती हैं, जहाँ वे किसानों को ‘‘धान उत्पादन की गहन प्रणाली’ तकनीक सिखाती हैं. 

यह जलवायु-कुशल पद्धति कम पानी का उपयोग करती है, मीथेन उत्सर्जन घटाती है और पैदावार बढ़ाती है.

ममता दृढ़ता के साथ कहती हैं, “हमने अपने घर खोए हैं, पर अपना हौसला नहीं. मैं, इस परियोजना के ज़रिए अन्य लोगों की मदद कर रही हूँ ताकि वे अनिश्चितता के बीच भी सम्मान के साथ जीवन जी सकें.”

UNDP इंडिया क्लाइमेट चैंपियंस कार्यशाला के दौरान पारंपरिक साड़ियों में सजी चार भारतीय महिलाएं एक बड़े व्हाइटबोर्ड के चारों ओर इकट्ठा होकर एक चार्ट पर चर्चा कर रही हैं और उस पर उंगली से इशारा कर रही हैं।
© UNDP भारत

जलवायु कार्रवाई की डोर थामे महिलाएँ

गंजम, केंद्रपाड़ा, पुरी और बालासोर ज़िलों में, 300 से अधिक प्रशिक्षित जलवायु चैम्पियन, पारिस्थितिकी तंत्र की मरम्मत और सतत आजीविकाओं के विस्तार पर काम कर रहे हैं, जिनमें अधिकतर महिलाएँ हैं.

ये मिलकर 968 गाँवों में लगभग 10 लाख लोगों तक पहुँच रही हैं. इनके काम में मैन्ग्रोव पुनर्बहाली, जलग्रहण क्षेत्र का बेहतर प्रबंधन, और कीचड़ केकड़ा पालन व सजावटी मछली पालन जैसी वैकल्पिक आजीविकाओं को बढ़ावा देना शामिल है.

ECRICC परियोजना को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), ओडिशा सरकार, हरित जलवायु कोष (GCF) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने संयुक्त रूप से लागू किया है. 

इसका उद्देश्य समुदायों को सशक्त बनाना है ताकि वे स्थानीय स्तर पर अपनी जलवायु सहनसक्षमता बढ़ा सकें और परिवर्तन के प्रति अधिक तैयार रह सकें.

कविता के ज़रिए विरोध एवं उपचार

बालासोर ज़िले की कंचन जेना ने बदलाव की अपनी भाषा कविता में खोजी. उनकी राह व्यक्तिगत संघर्षों से होकर गुज़री - लकवाग्रस्त पति की देखभाल, दो बच्चों की परवरिश और दैनिक जीवन की आर्थिक जद्दोजहद. 

उन्होंने, ECRICC की कार्यशालाओं में जुड़ने के बाद, अपने आसपास की दुनिया पर कविताएँ लिखनी शुरू कीं, जिनके विषय होते हैं - समुद्र, ज़मीन और अपने लोगों के ख़ामोश संघर्ष.

उनकी शुरुआती कविताओं में से एक थी, समुद्र तट पर बिखरे कचरे पर —

“हम समंदर किनारे गए,
मन दुःख से भर गया.
देखा चारों ओर बिखरा कचरा,
जो कभी न सड़ता, न मिटता.
समंदर हमारा गहना है,
फिर तुम इसे क्यों बिगाड़ते हो?”

कंचन अपनी कविताएँ स्थानीय ओड़िया बोली में लिखती हैं और गाँव की बैठकों व पर्यावरण दिवस जैसे मंचों पर सुनाती हैं. उनके शब्द तकनीकी बातों को भावनाओं से जोड़ देते हैं, ताकि लोग समझ सकें कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन में भी है.

कंचन ने साथियों के प्रोत्साहन से, अपनी कविताएँ गाँव की बैठकों, जागरूकता अभियानों और विश्व पर्यावरण दिवस जैसे आयोजनों में सुनाना शुरू कीं. उनकी रचनाएँ धीरे-धीरे एक स्थानीय आंदोलन में बदल गईं.

वह मुस्कराकर कहती हैं, “लोग तथ्यों से ज़्यादा भावनाओं से जुड़ते हैं. जब मैं कविता सुनाती हूँ, तो उन्हें समझ में आता है कि प्रकृति की रक्षा कोई आदेश नहीं, बल्कि हमारी साझी भावना है.”

आज कंचन एक दर्जन से अधिक कविताएँ लिख चुकी हैं — जिनमें कचरा प्रबंधन, मैंग्रोव संरक्षण और महिलाओं की दृढ़ता जैसे विषय शामिल हैं.

वह कहती हैं, “इस परियोजना ने मुझे केवल जलवायु परिवर्तन के बारे में नहीं सिखाया, बल्कि यह भी सिखाया कि मेरी आवाज़ की भी अहमियत है. एक गाँव की महिला के शब्द भी बदलाव की प्रेरणा बन सकते हैं.”

भारत में आयोजित सेवा पर्व 2025 बीच क्लीनिंग इवेंट में, सफेद वर्दी पहने एक व्यक्ति सफेद शर्ट और लाल स्कर्ट पहने एक महिला को प्रमाण पत्र प्रदान करता है।
© UNDP भारत बबीना कांदी को उनके कार्य के लिए चार जलवायु चैम्पियनों में शामिल किया गया, और विधायक द्वारा सम्मानित किया गया.

संस्कृति बनी बदलाव की कारक

पुरी ज़िले की बबीना कांदी ने अपने समुदाय को जोड़ने का उपायट, नृत्य के माध्यम से खोजा. वह पारम्परिक लोकनृत्यों में पर्यावरण के सन्देश पिरोती हैं, जिससे त्यौहार और स्थानीय सभाएँ जलवायु जागरूकता के मंच बन जाती हैं.

वह कहती हैं, “जब मैं नृत्य के ज़रिए पर्यावरण की बात करती हूँ, तो लोग उसे अलग तरह से सुनते हैं. वे ख़ुद को कहानी का हिस्सा महसूस करते हैं.”

शुरुआत आसान नहीं थी. उन्हें बुज़ुर्गों और पुरुषों - दोनों की ओर से सन्देह का सामना करना पड़ा. “मैंने बच्चों से शुरुआत की. वे उत्सुक और खुले विचारों वाले थे. फिर धीरे-धीरे माताएँ भी जुड़ती गईं. आज हमारे स्वयं सहायता समूहों में, 150 से ज़्यादा महिलाएँ हैं, जो जलवायु से जुड़ी गतिविधियों की अगुवाई कर रही हैं.”

उनका समूह समुद्र तट सफ़ाई, वन संरक्षण और कचरा अलगाव जैसे अभियान चलाता है. वर्ष 2025 में उन्हें वैश्विक तटीय स्वच्छता दिवस पर, सम्मानित किया गया.

वह मुस्कराकर कहती हैं, “जब लोग अपने आस-पास बदलाव देखते हैं, तो उन्हें विश्वास होता है कि वे भी उसे सम्भव बना सकते हैं.”

कक्षा से लेकर समुद्र तट तक

गंजम ज़िले की भारती सेठी ने बदलाव का अलग रास्ता चुना. उन्होंने एक शिक्षक और सामुदायिक स्वयंसेवक के रूप में, ECRICC से जुड़कर स्थानीय महिलाओं को टिकाऊ आजीविका के जरिए आय बढ़ाने में मदद शुरू की. 

आज वे 12 केकड़ा पालन इकाइयों, 25 एसआरआई (SRI) किसानों व एक सजावटी मत्स्य पालन समूह का मार्गदर्शन करती हैं.

उनकी मेहनत का नतीजा तब नज़र याया जब ओडिशा के प्रतिनिधिमंडल ने, वर्ष 2025 में चेन्नई में आयोजित समुद्री भोजन की प्रदर्शनी में सरकारी क्षेत्र की श्रेणी में पहला पुरस्कार जीता.

भारती मुस्कराकर कहती हैं, “उस मंच पर खड़े होकर अपने ज़िले का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए अविस्मरणीय पल था. तब मुझे अहसास हुआ कि हमारे गाँवों में उठाए गए छोटे-छोटे क़दम भी, राष्ट्रीय पहचान बन सकते हैं.”

 

एक मुस्कुराती हुई भारतीय महिला मत्स्यपालन फार्म में डिजिटल तराजू पर एक केकड़ा पकड़े हुए है।
© UNDP भारत गंजम में, भारती सेठी तटीय मत्स्य पालन की मजबूती बढ़ाने के लिए मड क्रैब फार्मिंग जैसी टिकाऊ प्रथाओं का समर्थन करती हैं।

हौसले की पुनर्कल्पना

इन सभी कहानियों को एक सूत्र में बाँधने वाली सच्चाई यह है कि जलवायु कार्रवाई की शुरुआत लोगों से होती है. 

ओडिशा की महिलाएँ साबित कर रही हैं कि स्वयं को परिस्थितियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाना, केवल ढाँचों या तकनीक का मुद्दा नहीं है, बल्कि पहचान, रचनात्मकता और आपसी जुड़ाव का मुद्दा भी है.

ममता कहती हैं, “पहले हम केवल आपदाओं की शिकार भर थीं. अब हम अपनी ज़मीन की रक्षक हैं. हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि इसकी देखभाल कैसे करनी है, क्योंकि यही हमारा घर है.”

ज्ञान, कला और संवेदनशीलता के संगम से ये महिलाएँ, जलवायु अनुकूलन की कहानी नए सिरे से लिख रही हैं. यह हानि की नहीं, नेतृत्व की कहानी है.

आशा की एक पंक्ति

कंचन की ताज़ा कविता इस बदलाव को खूबसूरती से बयाँ करती है —
“चलो अपनाएँ एसआरआई की राह,
मीथेन गैस को रखें दूर, करें आहट सदा.
कम लागत, अधिक मुनाफ़ा जब आए,
किसानों के संघर्ष धीरे-धीरे मिट जाएँ.”

जब कंचन से पूछा गया कि उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है, तो वह मुस्कराकर कहती हैं, “समुद्र ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है. लेकिन उसी ने हमें यह भी सिखाया है कि हर ज्वार के बाद, फिर से उठ खड़ा होना ही जीवन है.”

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.