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एक डॉक्टर क्लिनिक में डेस्क पर एक महिला के साथ बैठा है और वह मेडिकल रिकॉर्ड में लिख रहा है।

भारत: रक्त की गम्भीर बीमारी का बोझ, मगर दोस्तों के साथ से मिली नई उम्मीद

© UNICEF/मिथिला जरीवाला निदान और उपचार के बाद, सुरेखा की सेहत पहले से बेहतर हो गई है.

भारत: रक्त की गम्भीर बीमारी का बोझ, मगर दोस्तों के साथ से मिली नई उम्मीद

स्वास्थ्य

छत्तीसगढ़ प्रदेश के जशपुर ज़िले में एक 19 वर्षीय महिला सुरेखा विश्वकर्मा को, रक्त की एक बहुत जटिल प्रकार की बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था, जिसका नाम है सिकल सैल (Sickle cell). मगर यूनीसेफ़ की पहल और कुछ दोस्तों के अनमोल साथ ने, उनकी ज़िन्दगी को नया मोड़ दे दिया. यूनीसेफ़ के सहयोग से चल रहा एक स्वास्थ्य कार्यक्रम सैकड़ों युवाओं के जीवन में नई उम्मीद भर रहा है.

इस पहल के तहत स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों को सिकल सैल जैसी गम्भीर बीमारियों की पहचान और इलाज करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि मरीज़ों को समय पर सही निदान और उपचार मिल सके. 

इसी कार्यक्रम की बदौलत 19 वर्षीय सुरेखा विश्वकर्मा की ज़िन्दगी को नई राह मिली है.

साल भर पहले, सुरेखा अपने बिस्तर पर दर्द से कराह रही थीं. घुटनों में सूजन थी. कमर में असहनीय दर्द था. जैसे उनका शरीर उम्र के बोझ से झुक गया हो.

पहले उन्हें बुख़ार हुआ था. वह याद करती हैं, “जब डॉक्टर ने कहा कि यह पीलिया है, तो मुझे राहत मिली,” “क्योंकि पीलिया तो ठीक हो जाता है.”

लेकिन पीलिया ठीक होते ही नया दर्द शुरू हुआ. घुटनों में सूजन और अकड़न बनी रही. ऐक्स-रे में कैल्शियम की कमी बताई गई. दवाइयाँ चलती रहीं, पर आराम नहीं मिला. धीरे-धीरे दर्द इतना बढ़ा कि वह बिस्तर से उठ भी नहीं पाती थीं. उन्हें अपनी कॉलेज - शिक्षा भी छोड़नी पड़ी.

वह कहती हैं, “शारीरिक दर्द तो असहनीय था ही. लेकिन अपने परिवार को मेरी वजह से परेशान देखकर मैं भीतर से टूट गई थी.”

एक डॉक्टर और एक सहायक कार्यालय में एक महिला से परामर्श कर रहे हैं और एक चिकित्सा संबंधी मामले पर चर्चा कर रहे हैं।
© UNICEF/मिथिला जरीवाला नियमित जाँच के लिए अस्पताल पहुँची सुरेखा.

फिर एक दिन, जब सुरेखा को जशपुर ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो यूनीसेफ़ के सहयोग से प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों ने उनकी बीमारी की असली वजह पहचान ली - सिकल सैल रोग (Sickle Cell Disease). 

यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें रक्त की लाल कोशिकाएँ विकृत होकर कठोर हो जाती हैं और शरीर में रक्त का प्रवाह रुक जाता है. इससे तीव्र दर्द और गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं.

सुरेखा को रोग की पहचान किए जाने के बाद, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत एक विशेष स्वास्थ्य कार्ड मिला. इसके ज़रिए उन्हें हर महीने मुफ़्त दवाइयाँ, नियमित रक्त जाँच और अस्पताल तक आने-जाने के लिए यात्रा भत्ता मिलने लगा.

सुरेखा कहती हैं, “मैं एक साल तक अपने कॉलेज नहीं जा पाई क्योंकि चलना भी मुश्किल था. लेकिन अब मैं फिर से कॉलेज जा रही हूँ. अर्थशास्त्र की शिक्षा ले रही हूँ और शिक्षक बनने का सपना पूरा करने की राह पर आगे बढ़ रही हूँ.”

सुरेखा मुस्कुराते हुए वह कहती है, “अगर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों ने मेरा सही समय पर इलाज न किया होता, तो शायद मैं आज जीवित नहीं होती.”

भारत के एक क्लिनिक में एक महिला स्वास्थ्यकर्मी एक मरीज को दवा दे रही है।
© UNICEF/मिथिला जरीवाला सुरेखा को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत हेल्थ कार्ड मिला, जिससे उन्हें मुफ़्त दवाइयाँ, मासिक ब्लड टेस्ट और अस्पताल आने-जाने के लिए यात्रा भत्ता मिलने लगा.

सुरेखा की बहन एक सीमित आय वाले रोज़गार पर काम करती हैं और घर चलाती हैं. सुरेखा कहती हैं, “अगर इलाज मुफ़्त नहीं मिलता, तो मुझे अपनी शिक्षा और ज़िन्दगी में से किसी एक को चुनना पड़ता.”

यूनीसेफ़ द्वारा समर्थित बाल अवस्था ग़ैर-संचारी रोग कार्यक्रम ने, छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य तंत्र को नई दिशा दी है. यह कार्यक्रम सिकल सैल जैसी ‘मौन बीमारियों’ की पहचान करने, समय पर उपचार और समुदाय में जागरूकता फैलाने पर केन्द्रित है.

इस पहल ने न केवल सुरेखा को दर्द और निराशा से उबारा, बल्कि उसे एक नया उद्देश्य भी दिया. वह दृढ़ता से कहती हैं, “अब मैं चाहती हूँ कि गाँव की दूसरी लड़कियाँ भी जानें कि यह बीमारी छिपाने की नहीं, इलाज करने की है.”

सुरेखा की कहानी यह साबित करती है कि सही समय पर पहचान, देखभाल और सहयोग, न केवल एक युवा ज़िन्दगी को बचा सकता है, बल्कि उसे नई उम्मीद और नई उड़ान भी दे सकता है.