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ICC पर दबाव व प्रतिबन्धों से, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की साख़ कमज़ोर

हेग में अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की इमारत के प्रवेश द्वार पर लोग इकट्ठे होते हैं, जिसके अग्रभाग में अदालत के लोगो वाले एक बड़े नीले बोर्ड पर लोगो दिखाई दे रहा है।
International Criminal Court अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का मुख्यालय भी नैदरलैंड के द हेग में स्थित है.

ICC पर दबाव व प्रतिबन्धों से, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की साख़ कमज़ोर

यूएन मामले

अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) पर दबाव बनाना और उसके विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाया जाना, “स्वयं अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धान्त पर आघात है”. यह चेतावनी यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने मंगलवार को महासभा में, ICC की वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान दी है.

यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने याद दिलाया कि अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) इस सिद्धान्त पर स्थापित किया गया था कि “न्याय एक सार्वभौमिक कर्तव्य है”, मगर इस न्यायालय काम अभी पूरा नहीं हुआ है.

उन्होंने कहा, “दो दशकों से भी अधिक समय के दौरान, इस न्यायालय ने दंडमुक्ति का मज़बूती से सामना किया है और दिखाया है कि बहुत अन्धकारमय और निराशाजनक क्षणों में भी, जवाबदेही को क़ायम रखना सम्भव है.”

“मगर, आज, जबकि हम ऐसे अत्याचार होते देख रहे हैं, जिन्होंने मानवता की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है, यह स्पष्ट है कि इस न्यायालय का मिशन, पूरा होने से अभी बहुत दूर है.”

प्रतिबन्ध के नतीजे

यूएन महासभा ने ICC की इस वार्षिक रिपोर्ट पर, इस न्यायालय पर लगे अमेरिकी प्रतिबन्धों के सन्दर्भ में चर्चा की है.

ग़ौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने, इस वर्ष के आरम्भ में ICC के न्यायाधीशों और अभियोजकों (Prosecutors) के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाए थे.

यूएन समर्थित अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय – ICC ने, ग़ाज़ा में तथाकथित युद्धापराधों को अंजाम देने के आरोप में फ़रवरी (2025) में, इसराइल के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किए थे, जिसके प्रतिक्रियास्वरूप, संयुक्त राज्य अमेरिका ने, ICC के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाए थे.

जनरल असेंबली की अध्यक्ष एनालेना बेरबॉक संयुक्त राष्ट्र में अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की रिपोर्ट पर केंद्रित एक बैठक की अध्यक्षता करती हैं। वह एक लैपटॉप पर काम करने वाले एक अन्य अधिकारी के साथ एक बैंगनी डेस्क पर माइक्रोफोन के साथ बैठी हैं।
UN Photo/Loey Felipe

इन प्रतिबन्धों के तहत, ICC के न्यायाधीशों और अभियोजकों की, संयुक्त राज्य अमेरिका में वित्तीय सम्पदा और सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा किया जा सकता है, साथ ही अमेरिका की यात्रा पर भी प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं.

महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने जाँच कर्ताओं, गिरफ़्तारियों और वारंटों पर अमल किए जाने के साथ-साथ, न्यायालय की स्वतंत्रता क़ायम रखने के लिए अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की महत्ता को रेखांकित किया, ताकि अपराधों के लिए, रोम संविदा के तहत मुक़दमे चलाए जा सकें.

ध्यान रहे कि अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की स्थापना अन्तरराष्ट्रीय - रोम संविदा (Rome Statute) के तहत की गई है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा – मगर न्यायालय हस्तक्षेपों से मुक्त नहीं रहा है.

ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा, “विधि के शासन की रक्षा करने और जवाबदेही निर्धारित करने के लिए, न्यायालय के अधिकारों पर प्रतिबन्ध लगाए गए हैं, और न्यायालय की साख़ को कमज़ोर करने के इरादे से, इसकी व्यवस्थाओं को साइबर हमलों का सामना करना पड़ा है.”

उन्होंने कहा कि ये कोई इक्का-दुक्का और अलग-थलग की घटनाएँ नहीं हैं, ये न्यायालय के विरुद्ध जानबूझकर किए गए हमले हैं, जिनका उद्देश्य क़ानून के शासन को कमज़ोर करना और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं में, विश्वास को कमज़ोर करना था.

न्यायिक कामकाज की आज़ादी क़ायम रहे

यूएन महासभा में मंगलवार को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जिसमें ज़ोर दिया है कि ICC पदाधिकारियों को, अपना मिशन, बिना किसी दबाव और उत्पीड़न के अपना कामकाज करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए. 

प्रस्ताव में साथ ही, न्यायालय, इसके पदाधिकारियों या उनके साथ सहयोग करने वालों के विरुद्ध किसी तरह की धमकियों, हमलों या हस्तक्षेप की निन्दा भी की गई है.

जापानी महिला टोमोको अकाने United Nations के प्रतीक चिन्ह वाले मंच पर भाषण दे रही हैं।
UN Photo/ लोई फेलिप

ICC की अध्यक्ष जज टोमोको अकाने ने महासभा में मौजूद प्रतिनिधियों से कहा कि इस न्यायालय के निर्णय, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाते हैं कि न्याय का दायरा, सीमाओं व हितों से परे जाता है, मगर जब न्यायाधीशों पर दबाव बनाया जाता है, उन्हें धमकाया जाता है, या उनकी अहमियत को कम किया जाता है, तो स्वयं अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की साख़ कमज़ोर होती है.

उन्होंने कहा, “न्यायालय और उसके पदाधिकारियों के विरुद्ध हमले, धमकियाँ और दबाव वाले उपाय लगातार बने रहे हैं और वो, न्यायालय द्वारा न्याय के प्रशासन व दंडमुक्ति के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई के लिए गम्भीर जोखिम उत्पन्न करते हैं.”

न्यायाधीश टोमोको अकाने ने, इस न्यायालय की उपलब्धियों और इसके सामने दरपेश चुनौतियों का भी ज़िक्र किया और सदस्य देशों से, अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था की सुरक्षा करने का आहवान किया.

उन्होंने बताया कि इस वर्ष अगस्त तक, ICC में मामलों की सुनवाई में 18 हज़ार पीड़ितों ने शिरकत की थी.

न्यायाधीश टोमोको अकाने ने कहा, “न्यायालय पीड़ितों की आवाज़ बनता है, यह एक ऐसा स्थान है जहाँ पीड़ितों की आपबीतियों को जगह मिलती है, और यह आशा मिलती है कि सत्य को स्वीकार किया जाएगा और जवाबदेही निर्धारित की जाएगी.”

उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि गिरफ़्तारी वारंटों पर अमल, सदस्य देशों के सहयोग के ज़रिए ही किया जा सकता है.