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युद्ध, हिंसा, उत्पीड़न, जलवायु संकट की गाज से करोड़ों लोग विस्थापित

सूडान के अल फ़शर में भीषण युद्ध से लाखों लोगों को जान बचाकर भागना पड़ा है. दुनिया भर में युद्ध व हिंसा से करोड़ों लोग विस्थापन के लिए विवश हुए हैं.
© UNOCHA
सूडान के अल फ़शर में भीषण युद्ध से लाखों लोगों को जान बचाकर भागना पड़ा है. दुनिया भर में युद्ध व हिंसा से करोड़ों लोग विस्थापन के लिए विवश हुए हैं.

युद्ध, हिंसा, उत्पीड़न, जलवायु संकट की गाज से करोड़ों लोग विस्थापित

प्रवासी और शरणार्थी

दुनिया भर के अनेक क्षेत्रों में, युद्ध, हिंसा और उत्पीड़न के कारण कम से कम 11 करोड़ 70 लाख लोग विस्थापित हुए हैं, मगर विस्थापित लोगों और शरणार्थियों का ये कष्ट, जलवायु संकट से भी जुड़ा हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने सोमवार को कहा है कि चाहे दक्षिण सूडान और ब्राज़ील में आई बाढ़ हो, केनया और पाकिस्तान में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी हो, या चाड और इथियोपिया में पानी की कमी हो, चरम मौसम, पहले से ही कमज़ोर हालात वाले समुदायों को और भी अधिक संकट में धकेल रहा है.

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पिछले एक दशक में, मौसम सम्बन्धी आपदाओं के कारण 25 करोड़ लोग, अपने देशों के भीतर ही विस्थापित हुए हैं, जो प्रतिदिन लगभग 70 हज़ार लोगों के विस्थापन के बराबर है. 

यूएन शरणार्थी एजेंसी - UNHCR एक नई रिपोर्ट में यह भी बताया है कि बेघर हुए सभी लोगों में से 75 प्रतिशत यानि चार में से तीन लोग अब ऐसे देशों में रहते हैं जहाँ जलवायु घटनाओं से प्रभावित के समुदायों को, “अधिक से अत्यधिक” स्तर के जलवायु सम्बन्धी ख़तरों का सामना करना पड़ता है .

यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैंडी ने कहा, "अत्यधिक ख़राब मौसम, लोगों की सुरक्षा को और भी अधिक ख़तरे में डाल रहा है; यह संकट ज़रूरी सेवाओं तक पहुँच को बाधित कर रहा है, घरों और आजीविका को तबाह कर रहा है और परिवारों को, बार-बार पलायन करने पर मजबूर कर रहा है."

उन्होंने कहा, "ये वे लोग हैं जिन्होंने पहले ही भारी नुक़सान सहन किया है, और अब उन्हें फिर से उन्हीं कठिनाइयों व तबाही का सामना करना पड़ रहा है."

"ये लोग भीषण सूखे, जानलेवा बाढ़ और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की लहरों से सबसे अधिक प्रभावित हैं, फिर भी उनके पास उबरने के लिए सबसे कम संसाधन हैं."

यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त ने ख़बरदार किया है कि दुनिया भर में, शरणार्थियों के लिए जीवन-यापन की बुनियादी प्रणालियाँ पहले से ही दबाव में हैं.

उदाहरण के लिए, बाढ़ प्रभावित चाड के कुछ हिस्सों में, पड़ोसी सूडान में युद्ध से भागकर आए नए शरणार्थियों को प्रतिदिन 10 लीटर से भी कम पानी मिलता है, जो आपातकालीन मानकों से काफ़ी कम है.

साक्ष्य यह भी दर्शाते हैं कि वर्ष 2050 तक, सबसे गर्म स्थानों पर बनाए गए शरणार्थी शिविरों को, प्रति वर्ष लगभग 200 दिनों तक अत्यधिक गर्मी के दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे स्वास्थ्य और जीवन-यापन को गम्भीर ख़तरा हो सकता है.

UNHCR ने कहा है, "इनमें से अनेक स्थान, अत्यधिक गर्मी और उच्च आर्द्रता के घातक संयोजन के कारण, इनसानों के रहने योग्य नहीं बचेंगे."

लाखों शरणार्थी स्वदेश भी लौटे

रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2025 की शुरुआत में, 12 लाख शरणार्थी अपने वतन लौटे हैं, लेकिन इनमें से लगभग आधी संख्या ऐसे क्षेत्रों में पहुँची है जहाँ, जलवायु आपदाओं का बहुत ख़तरा है.

इस बीच, UNHCR ने यह भी कहा है कि अफ़्रीका महाद्वीप में, 75 प्रतिशत भूमि की स्थिति ख़राब हो रही है और शहरार्थियों की दो में से लगभग एक बस्तियाँ, "उच्च दबाव" वाले क्षेत्रों में स्थित हैं.

यूएन शरणार्थी एजेंसी ने ज़ोर देकर कहा, "इस स्थिति के कारण, भोजन, पानी और आय तक पहुँच कम हो रही है," जिससे सहेल के कुछ हिस्सों में, लड़ाई में प्रयोग किए जाने के इरादे से, सशस्त्र समूहों में लोगों की भर्ती बढ़ रही है, जिससे युद्ध व टकराव और बार-बार होने वाला विस्थापन बढ़ रहे हैं.

फ़िलिपो ग्रैंडी ने, ब्राज़ील के बेलेम में संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन COP30 के उदघाटन दिवस पर कहा, "धन की उपलब्धता में कटौती, शरणार्थियों और विस्थापित परिवारों को चरम मौसम के प्रभावों से बचाने की हमारी क्षमता को गम्भीर रूप से सीमित कर रही है."

यूएनएचसीआर प्रमुख ने कहा, "अगर हम स्थिरता चाहते हैं, तो हमें उन क्षेत्रों में निवेश करना होगा, जहाँ लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं."

"और अधिक विस्थापन को रोकने के लिए, जलवायु आपदा का सामना करने के लिए धन उपलब्धता, उन समुदायों तक पहुँचाया जाना ज़रूरी है जो पहले से ही संकटग्रस्त हैं. उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता. इस COP को वास्तविक कार्रवाई करनी चाहिए, खोखले वादे नहीं."