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पल्लवी और उनके पिता विवेक ताम्रकार, अब डायबिटीज़ के साथ जीवन जीने के संघर्ष में साथ मिलकर आगे बढ़ रहे हैं.

भारत: इंसुलिन की सुई से आशाओं व सपनों को सहारा

© UNICEF/Mithila Jariwala
पल्लवी और उनके पिता विवेक ताम्रकार, अब डायबिटीज़ के साथ जीवन जीने के संघर्ष में साथ मिलकर आगे बढ़ रहे हैं.

भारत: इंसुलिन की सुई से आशाओं व सपनों को सहारा

स्वास्थ्य

11 साल की पल्लवी ताम्रकार हर सुबह की तरह दाँत ब्रश करती है, अपना स्कूल बैग तैयार करती है और फिर शान्त मन से अपने हाथ पर इंसुलिन की सुई लगाती है. कभी ऐसा भी था कि पल्लवी को यह सुई लगाने से डर लगता थामगर अब यह सुई उसकी हिम्मत की पहचान है आत्मनिर्भरतासाहस और एक नन्ही बच्ची के बड़े सपनों व उम्मीदों की पहचान. 

पल्लवी के जीवन में, कुछ साल पहले जैसे एक भूकम्प आ गया था. एक दिन अचानक उसके पेट में ज़ोर का दर्द उठा. अस्पताल में जाँच ने, उसके परिवार की दुनिया हिलाकर रख दी. 

रिपोर्ट से मालूम हुआ कि पल्लवी को मधुमेह यानि डायबिटीज़ है. डॉक्टर ने बताया कि अब पल्लवी को हर दिन इंसुलिन की ज़रूरत होगी.

पल्लवी याद करती हैं, “जब चिकित्सकों ने सुई दिखाई, तो मैं बहुत रोई. मुझे लगा मेरी ज़िन्दगी बदल गई.” अब वही पल्लवी मुस्कुराकर कहती हैं, “अगर मैं इतनी बड़ी बीमारी झेल सकती हूँ, तो उतनी समझदार भी हूँ कि अपना इंजेक्शन स्वयं लगा सकूँ.”

आज उसके लिए इंसुलिन की सुई, उतनी ही सामान्य है, जितना नाश्ता करना या होमवर्क करना.

पिता का संबल

पल्लवी के पिता विवेक ताम्रकार उसकी सबसे बड़ी ताक़त हैं. जब पल्लवी तीन साल की थी, उसकी माँ का निधन हो गया था. तब से विवेक ने बेटी की देखभाल को अपना मिशन बना लिया.

वे कहते हैं, "उसकी बीमारी ने मुझे और सतर्क बना दिया है. मैंने ऐसा स्कूल चुना जो सुबह 11 बजे शुरू होता है, ताकि वह घर पर समय से खाना खा सके और इंसुलिन ले सके."

घर की दिनचर्या पूरी तरह पल्लवी के स्वास्थ्य के अनुसार ढली है. पिता के लिए यह केवल देखभाल नहीं, बल्कि बेटी को मज़बूत बनाने के इरादे से जुड़ा मुद्दा है.

पल्लवी का छोटा भाई पहले हर इंजेक्शन से डरता था. टीका लगवाने के नाम पर वह रो पड़ता था. अब वह अपनी बहन को रोज़ बिना हिचक सुई लगाते देखता है. धीरे-धीरे उसका डर भी ख़त्म हो गया. वह सोचता है, "दीदी कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं?" यही विचार उसे भी साहस देता है.

11 वर्षीय पल्लवी ताम्रकार अपनी नियमित जाँच के लिए अपने पिता के साथ जशपुर ज़िला अस्पताल में.
© UNICEF/Mithila Jariwala

स्कूल की दुनिया

पल्लवी अपने स्कूल में अन्य बच्चों की तरह पढ़ाई, खेल और गतिविधियों में हिस्सा लेती है. कभी-कभी दोस्त पूछते हैं कि वह सुई क्यों लगाती है. पल्लवी मुस्कुराकर समझाती है, "यह मुझे ताक़त देती है, ताकि मैं तुम सबके साथ खेल सकूँ."

उसके शिक्षक भी पूरा सहयोग करते हैं. वे समय-समय पर ध्यान रखते हैं कि पल्लवी ने समय पर भोजन खाया है और दवा ली है या नहीं.

जहाँ दूसरे बच्चे जन्मदिन पर पार्टी और तोहफ़े चाहते हैं, पल्लवी की इच्छा अलग है. वह ग़रीब बच्चों में मिठाइयाँ बाँटती हैं. वह सरलता से कहती है, "उन्हें भी कुछ मीठा मिलना चाहिए." उसकी मासूम बातों में गहरी संवेदनशीलता स्पष्ट नज़र आती है.

सुलभ इलाज

पल्लवी की इस यात्रा में उनका साथ दिया है - छत्तीसगढ़ में यूनीसेफ़ के बाल ग़ैर-संचारी रोग कार्यक्रम (NCD) ने. 

स्थानीय एनजीओ संगवारी के साथ मिलकर, NCD कार्यक्रम के ज़रिए यह सुनिश्चित किया जा रहे है कि डायबिटीज़ जैसी बीमारियों से जूझते बच्चों का इलाज घर के पास और मुफ़्त हो सके.

ज़िला स्तर पर ग़ैर-संचारी रोग गतिविधियों के समन्वयक डॉक्टर लक्ष्मीकांत आपत बताते हैं, "हमने सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित किया, लक्षण चार्ट बनाए और सूचना-शिक्षा-संचार सामग्री तैयार की."

"अब टाइप 1 डायबिटीज़ और जन्मजात हृदय रोग जैसी स्थितियों का जल्दी निदान व इलाज सम्भव हो रहा है. पल्लवी जैसे बच्चे समय पर दवा पाकर अपना जीवन सामान्य रूप से जी पा रहे हैं." 

इन कार्यक्रमों से परिवार पर दवा और इलाज का आर्थिक बोझ भी हल्का हुआ है.

डॉक्टरों के साथ अपने अनुभव ने पल्लवी को गहराई से प्रेरित किया है. वह बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती है.

पल्लवी आत्मविश्वास के साथ कहती है, "मेरे डॉक्टर मुझे बच्चे की तरह नहीं देखते. वे मेरी बात सुनते हैं, सवालों के जवाब देते हैं. मैं भी ऐसी डॉक्टर बनना चाहती हूँ जो ग़रीब मरीज़ों का इलाज करे."

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.