कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): विकलांगजन के लिए समानता की राह में एक क़दम
भारत के गोवा में आयोजित 'अन्तरराष्ट्रीय पर्पल फ़ेस्ट 2025' में विकलांगता पर चर्चा केवल नीतियों या रैम्प तक सीमित नहीं रही. ये बोर्डरूम, कक्षा और डिजिटल दुनिया तक पहुँची - जहाँ कामकाज का भविष्य तय हो रहा है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अब कामकाज के नियमों को नए सिरे से लिख रही है. दुनिया भर में लाखों विकलांग व्यक्तियों के लिए यह “समान अवसर” का सबसे बड़ा साधन बन सकती है, जहाँ सहायक तकनीकें दैनिक जीवन में एक बड़ी शक्ति में बदल रही हैं.
जब एआई को जीवन के अनुभवों के आधार पर बनाया जाता है, तो यह सिर्फ़ बाधाएँ नहीं हटाता - यह सम्भावनाएँ बढ़ाता है. संवाद करने वाले स्क्रीन रीडर, वास्तविक समय में कैप्शनिंग, और ऐसे इंटरफ़ेस जो हर व्यक्ति के अनुसार ख़ुद को ढालने में सक्षम हैं - ये सभी उपकरण केवल पहुँच नहीं, बल्कि भागेदारी का अधिकार देते हैं.
महत्वाकाँक्षा की नई परिभाषा
एक चर्चा के दौरान, गॉदरेज कंज़्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड में डिप्टी जनरल मैनेजर (ब्रांड), प्रीतम सुनकवली ने यह सवाल सामने रखा कि समावेशन का असली अर्थ क्या है. ख़ासतौर पर तब, जब लोग यह नहीं जानते कि किसी व्यक्ति को किस तरह शामिल किया जाए.
जन्म से दृष्टिबाधित प्रीतम सुनकवली कभी भौतिक विज्ञानी बनना चाहते थे. लेकिन जब उनसे कहा गया कि “उनके लिए डायग्राम बनाना मुश्किल होगा,” तो उन्होंने राह बदली - महत्वाकांक्षा छोड़ी नहीं, बल्कि उसकी परिभाषा बदल दी.
वर्षों बाद, एक ऑटोमोबाइल कम्पनी में हुई बातचीत ने उन्हें एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराया. कम्पनियाँ तब तक सुलभता (accessibility) में निवेश नहीं करतीं, जब तक उनके कार्यबल में विकलांग लोग न हों. और विकलांग व्यक्ति तब तक काम नहीं कर पाते, जब तक वहाँ सुलभता मौजूद नहीं होती.
लेकिन उनकी वर्तमान कम्पनी में हालात अलग हैं. कामकाज शुरू करने के कुछ ही समय बाद उनके सीईओ ने उन्हें मार्केट रीसर्च पर साथ चलने के लिए आमंत्रित किया - और वह आमंत्रण भरोसे का प्रतीक बन गया. बाद में सीईओ ने एक सार्वजनिक पोस्ट में लिखा कि एक दृष्टिबाधित ब्रांड मैनेजर के साथ काम करना “प्रेरणा नहीं, बल्कि साझेदारी” का अनुभव था.
प्रीतम सुनकवली कहते हैं, “जब समाज आपको सक्षम के रूप में देखता है, तो वह अपने ढाँचे और दृष्टिकोण को भी उसी के अनुरूप ढालने लगता है. उनका मानना है कि एआई इस बदलाव को और तेज़ कर सकता है - दया या सहानुभूति के रूप में नहीं, बल्कि बराबरी के अवसर के रूप में.
अनुभव से निर्माण
Yearbook Canvas की संस्थापक और सीईओ सुरश्री रहाणे, समावेशन को एक अलग नज़र से देखती हैं - वो नज़रिया जो परिवार, मार्गदर्शन और आत्मबल से बना है.
वो ऐसे घर में पली-बढ़ीं जहाँ विकलांगता सामान्य थी, उन्होंने ख़ुद को कभी सीमित नहीं माना. उनके शब्दों में, “विकलांगता जीवन का हिस्सा है, त्रासदी नहीं.” मार्गदर्शकों से प्रेरणा लेकर उन्होंने रोज़गार नहीं, उद्यमिता चुनी.
वह कहती हैं, “मेरे मेंटॉर्स ने हमेशा कहा - रोज़गार मत ढूँढो, रोज़गार पैदा करो. वहीं से मैंने सीखा कि असली नेतृत्व वही है, जो दूसरों को अवसर देता है.”
सुरश्री मानती हैं कि विकलांग व्यक्तियों के लिए उद्यमिता की राह अब भी कठिन है - न सुलभ ढाँचा, न समावेशी वित्तीय नेटवर्क, न लचीली शिक्षा व्यवस्था. इसी कमी को पाटने के लिए वह न्यूटन स्कूल ऑफ़ टैक्नोलॉजी के साथ काम कर रही हैं, जहाँ एआई-आधारित लर्निंग मॉडल तैयार हो रहे हैं ताकि हर छात्र अपनी गति से सीख सके.
उनका कहना है कि एआई शिक्षा को सच में लोकतांत्रिक बना सकता है, बशर्ते हम उसे विविध शिक्षार्थियों को पहचानना और समझना सिखाएँ. वरना यह सिर्फ़ पुराने पूर्वाग्रहों का आधुनिक रूप बनकर रह जाएगा.
एआई: सहायक से समानता तक
असिस्टटेक फाउंडेशन (ATF) के सीईओ प्रतीक माधव, एआई को “महान समताकारी” बताते हैं. बोलने में बाधा का सामना करने वाले लोगों के लिए ‘वॉयस-टू-स्पीच’ टूल्स से लेकर व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए संकेत-आधारित नियंत्रण तक - एआई अब उन बाधाओं को तोड़ रही है जिन्हें कभी स्थाई मानी जाती थीं.
प्रतीक माधव ने कहा, “जहाँ दुनिया एआई से रोज़गार खोने की चिन्ता कर रही है, वहीं विकलांग व्यक्तियों के लिए एआई नए अवसर पैदा कर रहा है.”
दृष्टिबाधितों के लिए ज़ेवियर्स संसाधन केन्द्र के केतन कोठारी ने बताया कि एआई ने अब उन्हें पूरी तरह आत्मनिर्भर बना दिया है. वह दस्तावेज़ तैयार कर सकते हैं, लाइव कैप्शनिंग के साथ बैठकों में शामिल हो सकते हैं और विभिन्न ऐप्स की मदद से दृश्य विवरण प्राप्त कर सकते हैं. उनके शब्दों में, एआई ने कल्पना को वास्तविकता में बदल दिया है.
हालाँकि, मेटा इंडिया में डेटा अर्थव्यवस्था और उभरती प्रौद्योगिकियों के सार्वजनिक नीति निदेशक सुनील अब्राहम ने चेतावनी दी कि तकनीक स्वतंत्रता देती है, लेकिन उसे ज़िम्मेदारी से डिज़ाइन करना आवश्यक है. उनके अनुसार, सुलभता और निजता दोनों ही मानव अधिकार हैं - और किसी एक को दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए.
आगे की राह
संयुक्त राष्ट्र विकास समन्वय कार्यालय (एशिया-प्रशान्त और अरब क्षेत्र) की शैरिंग देमा ने कहा कि यह किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा यात्रा है. उनके अनुसार, समावेशन का अर्थ केवल क़ानूनों या ढाँचों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोच और साझा दृष्टिकोण से जुड़ा है. भविष्य के कार्यस्थल केवल लोगों के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर बनाए जाने चाहिए.
स्वचालन और एल्गोरिद्म से आकार लेती इस सदी में, ये नेता एक नया सूत्र सामने रख रहे हैं - जहाँ तकनीक और मानवता साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं.
सुरश्री के शब्दों में, “नवाचार मशीनों से नहीं, सहानुभूति से शुरू होता है. अगर एआई सबका समावेशन सीख ले, तो वह ऐसी दुनिया बना सकता है जिसमें हर कोई शामिल हो.”