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‘ग़ाज़ा, पश्चिमी तट और यूक्रेन में अत्याचारों के सामने हम शक्तिहीन नहीं’: फ़िलिपो ग्रैंडी

बच्चों समेत सैकड़ों फ़िलिस्तीनी परिवार गाज़ा शहर की एक भीड़भाड़ वाली तटीय सड़क पर अपना सामान लेकर भाग रहे हैं। दृश्य में धूप वाले दिन लोग बक्से, थैले और पानी की बोतलें लिए हुए दिखाई दे रहे हैं, और पृष्ठभूमि में समुद्र नज़र आ रहा है।
UN News ग़ाज़ा में भीड़भाड वाली अल-राशिद सड़क के ज़रिए सैकड़ों फ़लस्तीनी परिवार सुरक्षित आश्रय की तलाश में जा रहे हैं.

‘ग़ाज़ा, पश्चिमी तट और यूक्रेन में अत्याचारों के सामने हम शक्तिहीन नहीं’: फ़िलिपो ग्रैंडी

प्रवासी और शरणार्थी

संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों की एजेंसी - UNHCR के मुखिया फ़िलिपो ग्रैंडी ने, युद्ध के नियमों की "जानबूझकर अनेदेखी किए जाने" पर निशाना साधा है, और साथ ही इस तरह के सुझावों या स्थिति को भी ख़ारिज किया है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय, क़ानून व मानवाधिकारों के इन उल्लंघनों के सामने शक्तिहीन है.

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फ़िलिपो ग्रैंडी ने सोमवार को जिनीवा में, UNHCR की वार्षिक कार्यकारी बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा  कि ग़ाज़ा और [इसराइल द्वारा क़ाबिज़] फ़लस्तीनी क्षेत्र पश्चिमी तट, यूक्रेन, सूडान या म्याँमार में हो रहे अत्याचार, हिंसक शक्ति के नाम पर जानबूझकर नियमों का उल्लंघन किए जाने के प्रमाण हैं. 

“इन उल्लंघन को, देश और ग़ैर-देशीय संगठन, पूरी तरह से दंडमुक्ति के साथ अंजाम दे रहे हैं.”

शरणार्थी उच्चायुक्त ने क़ानून और मानवाधिकार के इन उल्लंघनों के कुछ उदाहरण देते हुए कहा, "भोजन प्राप्त करने के लिए क़तार में खड़े लोगों की हत्या हुई. उन शिविरों में लोगों का जनसंहार, जहाँ वो सुरक्षा की तलाश में पनाह लेने के लिए पहुँचे थे. अस्पताल और स्कूल नष्ट कर दिए गए हैं. रिकॉर्ड संख्या में सहायताकर्मी मारे गए."

फ़िलिपो ग्रैंडी ने कहा कि यूएन शरणार्थी एजेंसी का मूल मिशन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 75 साल पहले था: ख़तरे से बचने के लिए भाग रहे लोगों को शरण प्रदान करना और उनकी दुर्दशा के समाधान खोजना.

12.2 करोड़ लोग बेघर

UNHCR प्रमुख ने कहा कि इस समय युद्ध और उत्पीड़न के कारण विस्थापित हुए लोगों की संख्या 12 करोड़ 20 लाख है जो एक दशक पहले की संख्या से लगभग दोगुनी है. 

उन्होंने इस पृष्ठभूमि में, शरणार्थियों की आमद को रोकने के लिए सरकारों के विफल प्रयासों की तरफ़ ध्यान खींचा, जिसके कारण 1951 के शरणार्थी सम्मेलन में सुधार करने या उसे "ख़त्म" करने की मांग बढ़ रही है.

उन्होंने कहा कि यह अन्तरराष्ट्रीय समझौता, देशों को युद्ध, हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न से बचकर भागने वाले किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बाध्य करता है; जो लोग इन मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं, उन्हें "सम्मानजनक तरीक़े से उनके देशों...या किसी तीसरे देश में वापस भेजा जा सकता है."

हालाँकि, "मैं इस बात को लेकर चिन्तित हूँ कि मौजूदा बहस व कार्रवाइयाँ, वास्तविक चुनौतियों का ऐसे तरीक़े से समाधान कर रही हैं जो अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अनुरूप नहीं हैं. – उन्होंने इस सन्दर्भ में योरोप - और संयुक्त राज्य अमेरिका में शरण चाहने वालों को जबरन देश से निकाले जाने की कुछ मौजूदा निर्वासन प्रथाओं का उदाहरण दिया.

"UNHCR आपको सलाह और समर्थन देने के लिए मौजूद है ताकि आप जो भी उपाय करें, वो क़ानूनी हों."

हिंसा के लिए बेपरवाही

संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च शरणार्थी कल्याण अधिकारी ने फ़िलिपो ग्रैंडी ने ज़ोर देकर कहा कि युद्धग्रस्त पक्ष यह मानते हैं कि, युद्ध और अन्धाधुन्ध हिंसा करना और मानदंडों की अवहेलना करना न्यायसंगत है, बशर्ते कि सैन्य उद्देश्य प्राप्त किए जाएँ.

उन्होंने कहा, "कोई भी मानवीय क़ीमत बहुत ज़्यादा नहीं नज़र आ रही है, मृत्यु या विनाश की कोई भी तस्वीर बहुत ज़्यादा चौंकाने वाली नहीं लगती."

"समझने में कोई ग़लती नहीं करें: अत्याचारों को रोज़ाना दोहराने का उद्देश्य हमारी अन्तरात्मा को सुन्न करना है. हमें शक्तिहीन महसूस कराना है."

UN शरणार्थी उच्चायुक्त श्री फिलिपो ग्रांडी ने जिनेवा के पैलेस डेस नेशन्स में यूएनएचसीआर की कार्यकारी समिति के 76वें वार्षिक सत्र के उद्घाटन के अवसर पर एक बयान दिया।
© UNHCR/Baz RatnerUNHCR के

शरणार्थियों से मेज़बान देशों को भी लाभ

UNHCR प्रमुख ने, तेज़ी से बढ़ती मानवीय आपात स्थितियों के मद्देनज़र, वैश्विक स्तर पर मानवीय कार्यों के लिए घटते धन के "बेहद हानिकारक" प्रभाव की ओर भी ध्यान दिलाया.

उन्होंने इस सन्दर्भ में अधिक समावेशी और टिकाऊ कार्रवाई किए जाने पर ध्यान केन्द्रित करने की पुकार लगाई.

फ़िलिपो ग्रैंडी ने ज़ोर देकर कहा, "यदि (शरणार्थियों को पनाह देने वाले) मेज़बान देशों की नीतियाँ, शरणार्थियों को अलग-थलग कर देती हैं या उन्हें अवसरों से वंचित कर देती हैं, तो समावेशन कारगर नहीं होता.”

“इसके बजाय मेज़बान देश, सेवाओं और रोज़गारों तक पहुँच खोलकर, आवाजाही की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबन्धों को हटाकर, शरणार्थियों के क्षमता विकास में निवेश करके, अपने लिए और शरणार्थियों के लिए भी, आर्थिक व सामाजिक लाभ अर्जित करते हैं."

फ़िलिपो ग्रैंडी एक इतालवी नागरिक हैं और शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के 11वें उच्चायुक्त हैं. उनकी नियुक्ति संयुक्त राष्ट्र महासभा के ज़रिए हुई थी, उन्होंने 2016 की शुरुआत में पदभार ग्रहण किया था.

उनका कार्यकाल 31 दिसम्बर (2025) को समाप्त हो रहा है.

UNHCR की स्थापना 1950 में हुई थी और इसे अपने मानवीय कार्यों के लिए दो बार नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है - 1954 और 1981 में.