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रंगभेद अब भी क़ायम, काले लोगों के साथ नस्लवाद के विरुद्ध कार्रवाई पर ज़ोर

नस्लभेद के ख़िलाफ़, ऑस्ट्रेलिया में प्रदर्शन
© Unsplash/Ying Ge
नस्लभेद के ख़िलाफ़, ऑस्ट्रेलिया में प्रदर्शन

रंगभेद अब भी क़ायम, काले लोगों के साथ नस्लवाद के विरुद्ध कार्रवाई पर ज़ोर

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के अफ़्रीकी मूल के लोगों के लिए स्थाई मंच के प्रमुख मार्टिन किमानी ने कहा है कि “रंगभेद की दीवार” आज भी मौजूद है, जो साबित करती है कि काले लोगों के ख़िलाफ़ नस्लवाद को समाप्त करने के लिए और प्रयास किए जाने की आवश्यकता है. उन्होंने जिनीवा में मानवाधिकार परिषद को मंच की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की और देशों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद किया.

मार्टिन किमानी ने बताया, “हर साल अफ़्रीकी मूल के लोगों के अनुभव और समाचारों में दिखने वाली घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि 21वीं सदी में भी रंगभेद की दीवार मौजूद है, जो सामाजिक विभाजन, हिंसा, समान अवसरों की कमी और शोषण को जारी रखती है.” 

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उन्होंने कहा कि “मानवाधिकार आन्दोलनों को पहले से कहीं अधिक एकजुट होकर कार्रवाई करनी होगी, ताकि संयुक्त राष्ट्र के कई प्रस्तावों की प्रतिज्ञा को पूरी तरह साकार किया जा सके, जिसमें सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन (International Convention on the Elimination of All Forms of Racial Discrimination) भी शामिल है.”

प्रगति के लिए एक दशक

जनवरी 2025 में, अफ़्रीकी मूल के लोगों के लिए दूसरा अन्तरराष्ट्रीय दशक शुरू हुआ. इस अवधि में तीन प्रमुख स्तम्भों – पहचान, न्याय और विकास – पर काम करने की ज़रूरत महसूस की गई है.

इसमें ढाँचागत नस्लवाद को मान्यता देना, न्यायपूर्ण मुआवज़ा और विकास में समानता सुनिश्चित करना शामिल है.

मार्टिन किमानी ने कहा कि डिजिटल युग में न्याय महत्वपूर्ण है क्योंकि उभरती प्रौद्योगिकी असमानताओं को बढ़ा सकती हैं.

उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमता (AI) में नस्लीय पूर्वाग्रहों पर चिन्ता जताई और कहा कि तकनीकें समाज में योगदान दे सकती हैं, लेकिन इन्हें ऐतिहासिक और वर्तमान अन्याय से अलग नहीं देखा जा सकता.

महिलाओं और लड़कियों के लिए चिन्ता

मंच ने अफ़्रीकी महिलाओं और लड़कियों के संघर्षों की तरफ़ भी ध्यान आकर्षित किया. 

मार्टिन किमानी ने कहा, “दासता की शुरुआत से अफ़्रीकी महिलाओं का अमानवीयकरण, उनके आज के भेदभाव और अवमूल्यन का आधार है."

"विकास के लक्ष्य तब तक हासिल नहीं हो सकते जब तक उनके साथ हुए इस अन्याय की न्यायसंगत भरपाई नहीं की जाती है.”

हेती पर विशेष ध्यान

मार्टिन किमानी ने हेती के संकट को औपनिवेशिक और दासता की विरासत से जुड़ा हुआ बताया. हेती 1804 में स्वतंत्र हुआ, लेकिन उसे फ़्राँस को 1.5 करोड़ फ्रैंक मुआवज़े के रूप में चुकाने पड़े.

उन्होंने मानवाधिकार परिषद से कहा कि इस संकट को “स्वतंत्रता ऋण” के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए. साथ ही, इस नस्लवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई और न्याय सुनिश्चित करना आज भी वैश्विक प्राथमिकता होनी चाहिए.