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रोहिंग्या समुदाय की 'असाधारण सहनक्षमता', उनके लिए समाधान ढूंढना 'मानवता की परीक्षा'

म्याँमार से रोहिंग्या शरणार्थी कामचलाऊ नाव के ज़रिए बांग्लादेश में पहुँच रहे हैं.
© UNICEF/Mackenzie Knowles-Coursin
म्याँमार से रोहिंग्या शरणार्थी कामचलाऊ नाव के ज़रिए बांग्लादेश में पहुँच रहे हैं.

रोहिंग्या समुदाय की 'असाधारण सहनक्षमता', उनके लिए समाधान ढूंढना 'मानवता की परीक्षा'

प्रवासी और शरणार्थी

जले हुए घर. मारे जा चुके पड़ोसी. धूमिल होती आशाएँ. हिंसा के कारण विस्थापन. दैनिक गुज़र-बसर के लिए संघर्ष. 50 लाख से अधिक रोहिंग्या पुरुष, महिलाएँ व बच्चे इसी व्यथा को झेलते हुए शरणार्थी शिविरों या फिर घरेलू विस्थापितों के रूप में रहने के लिए मजबूर हैं. संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रमुख ऐनालेना बेयरबॉक ने मंगलवार को एक उच्चस्तरीय सम्मेलन में म्याँमार में रोहिंग्या मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति पर गहरी चिन्ता जताते हुए कहा कि इस संकट के एक राजनैतिक समाधान की तलाश करना, मानवता की परीक्षा है.

वर्ष 2017 में, म्याँमार में हथियारबन्द गुटों द्वारा सुरक्षा बलों पर हमले किए जाने के बाद, सैन्य बलों ने अपनी बर्बर, दमनात्मक कार्रवाई शुरू की थी, जिससे जान बचाने के लिए रोहिंग्या समुदाय के लाखों लोगों ने बांग्लादेश में शरण ली थी.

उनसे पहले भी, हज़ारों रोहिंग्या लोग हिंसा व भेदभाव से बचने के लिए कॉक्सेस बाज़ार में स्थित शरणार्थी शिविरों में आश्रय के लिए पहुँचते रहे हैं. रोहिंग्या समुदाय को म्याँमार की नागरिकता हासिल नहीं है.

10 लाख से अधिक लोग अब शरणार्थी के तौर पर बांग्लादेश में रहते हैं, जबकि बड़ी संख्या में अन्य रोहिंग्या विकट हालात में म्याँमार के भीतर या तो विस्थापित हैं या फिर अन्य अल्पसंख्यकों के साथ फँसे हुए हैं.

म्याँमार में रोहिंग्या समुदाय व अन्य अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की स्थिति पर न्यूयॉर्क में यूएन मुख्यालय में राष्ट्राध्यक्षों, सरकार प्रमुखों, यूएन के शीर्ष अधिकारियों और रोहिंग्या कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.

इस सम्मेलन के दौरान, म्याँमार में फ़रवरी 2021 में सैन्य तख़्तापलट के बाद से जबरन लड़ाकों के रूप में भर्ती करने, यौन हिंसा, हवाई हमलों, भुखमरी और सामूहिक विस्थापन समेत अन्य कठोर वास्तविकताओं पर चर्चा हुई.

यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक (स्क्रीन पर) जनरल असेम्बली में म्याँमार में रोहिंग्या समुदाय की स्थिति पर आयोजित सम्मेलन को सम्बोधित कर रही हैं.
UN Photo/Manuel Elias
यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक (स्क्रीन पर) जनरल असेम्बली में म्याँमार में रोहिंग्या समुदाय की स्थिति पर आयोजित सम्मेलन को सम्बोधित कर रही हैं.

मानवाधिकारों पर प्रहार

यूएन महासचिव के ‘शैफ़ डे कैबिने’ या स्टाफ़ प्रमुख कोर्टनी रैट्रे ने उनकी ओर से वक्तव्य पढ़ा, जिसमें यूएन प्रमुख ने क्षोभ जताया है कि इस संकट से लाखों लोगों के मानवाधिकार, गरिमा व सुरक्षा को कुचला जा रहा है. इससे क्षेत्रीय स्थिरता को भी ख़तरा पनप रहा है.

उन्होंने तीन अहम क़दम उठाए जाने पर बल दिया है: अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अनुरूप आम नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए मार्ग की गारंटी, और शरणार्थी व उनके मेज़बान समुदायों पर बोझ घटाने के लिए निवेश.

यूएन प्रमुख के सन्देश में कहा गया है कि इस संकट का समाधान, अन्तत: म्याँमार में है. उनके उत्पीड़न का अन्त करना होगा और रोहिंज्या लोगों को पूर्ण नागरिक के रूप में मान्यता दी जानी होगी.

मानवीय सहायता संगठनों ने आगाह किया है कि राहत प्रयासों के लिए संसाधन समाप्त होते जा रहे हैं, शरणार्थी कुपोषित हैं और अधिक संख्या में लोग सुरक्षा की तलाश में ख़तरनाक समुद्री यात्राएँ करने के लिए मजबूर हैं.

म्याँमार के राख़ीन प्रान्त को रोहिंग्या समुदाय का मूल स्थान माना जाता है, जहाँ वर्तमान परिस्थितियाँ बेहद चुनौतीपूर्ण हैं, और आम नागरिक, सेना और जातीय हथियारबन्द गुटों के बीच लड़ाई में पिस रहे हैं.

म्याँमार से बचकर भागे रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में भी अक्सर मौसम की मार जैसी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.
IOM/Mohammed
म्याँमार से बचकर भागे रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में भी अक्सर मौसम की मार जैसी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

शर्मसार कर देने वाला संकट

महासभा प्रमुख ऐनालेना बेयरबॉक ने इस संकट की भयावहता पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि 50 लाख से अधिक रोहिंग्या पुरुष, महिलाएँ व बच्चे पीड़ा को झेल रहे हैं.

बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार में स्थित शिविरों में रहने वाले आठ लाख से अधिक बच्चे स्कूली पढ़ाई से दूर हैं.

मानवीय सहायता प्रयासों के लिए संसाधन बहुत कम हैं, और 2025 के लिए योजना के तहत फ़िलहाल 12 प्रतिशत रक़म जुटा पाना ही सम्भव हो पाया है.

ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि इस स्थिति से हमें शर्मिन्दा होना चाहिए. इसके मद्देनज़र, उन्होंने सदस्य देशों से मानवीय सहायता प्रयासों को मज़बूती देने और एक राजनैतिक समाधान की अपील की है ताकि रोहिंग्या समुदाय की सुरक्षित, स्वैच्छिक, गरिमामय ढंग से वापसी हो सके.

उनके अनुसार, रोहिंग्या लोगों ने आठ वर्षों के कष्टों, विस्थापन, और अनिश्चितता को झेला है और उनकी सहनक्षमता असाधारण है. यह ज़रूरी है कि हमारे द्वारा भी उसके अनुरूप ही क़दम उठाए जाएं, और यह मानवता की परीक्षा है.