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सोशल मीडिया मंचों पर, झूठ के पाँव, 'सच से छह गुना तेज़', मारिया रेसा

फ़िलिपीन्स की पत्रकार मारिया रेस्सा, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद एक प्रैस वार्ता के दौरान.
© Rappler
फ़िलिपीन्स की पत्रकार मारिया रेस्सा, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद एक प्रैस वार्ता के दौरान.

सोशल मीडिया मंचों पर, झूठ के पाँव, 'सच से छह गुना तेज़', मारिया रेसा

क़ानून और अपराध रोकथाम

नोबेल पुरस्कार विजेता पत्रकार मारिया रेसा का कहना है कि आज दुनिया के सामने, जलवायु परिवर्तन, मानव तस्करी, निर्धनता या लोकतंत्र में गिरावट, जैसी जितनी भी बड़ी समस्याएँ हैं, उन सबकी जड़, सूचना की विश्वसनीयता (information integrity) के संकट में छिपी है. मारिया रेसा ने, न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में, यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत कहा कि सोशल मीडिया मंच, इरादतन ‘झूठ को सच से छह गुना तेज़’ फैलाते हैं.  

उन्होंने कहा, “अगर आपके पास तथ्य ही नहीं होंगे तो आप न जलवायु परिवर्तन की समस्या सुलझा पाएँगे, न सतत विकास लक्ष्य से जुड़ी… सच के बिना विश्वास नहीं बनता, और विश्वास के बिना साझा वास्तविकता नहीं बनती.”

रेसा ने कहा कि सोशल मीडिया मंच, जानबूझकर, ‘झूठ को सच से छह गुना तेज़’ फैलाते हैं.  

“जब आप किसी झूठ को लाखों बार कहते हैं, वह लोगों के दिमाग़ में सच बन जाता है. इसीलिए लोकतंत्र, चुनावों और पत्रकारिता तक की नींव हिल रही है,” 

उनके अनुसार, ऐलॉन मस्क द्वारा ट्विटर ख़रीदे जाने और जैनरेटिव एआई आने के बाद यह संकट और अधिक गहरा गया है.

जनसुरक्षा का मुद्दा

मारिया रेसा ने “सूचना की अखंडता” को साधारण शब्दों में समझाते हुए कहा कि इससे हम तथ्यों की दुनिया में टिके रहते हैं. “हम अलग-अलग पक्षों पर हो सकते हैं, लेकिन कम-से-कम इस बात पर सहमत हों कि हम न्यूयॉर्क में हैं, मनीला में नहीं. अगर यह भी नहीं रहेगा, तो चर्चा की शुरुआत कैसे होगी?”

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल “Free Speech” यानि बोलने की आज़ादी का मामला नहीं है, बल्कि “Public Safety” यानि जनसुरक्षा का मुद्दा है.

“जिस तरह इमारतों के कोड होते हैं ताकि वह आप पर नहीं गिरे, उसी तरह सार्वजनिक सूचना व्यवस्था के लिए भी नियम होने चाहिए.”

उन्होंने उदाहरण दिया कि “मार्क ज़ुकरबर्ग ने कहा था: ‘Move fast, break things’. लेकिन फ़ेसबुक ने इस नारे के तहत लोकतंत्र को ही कमज़ोर कर दिया. उनके पास इसका ठोस डेटा है, मेरे पास इसका अनुभव है, और हमने हर देश में अध्ययन करके इसे साबित किया है. इसके बावजूद किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया गया.”

लोकतंत्र ख़तरे में...

मारिया रेसा ने आगाह किया कि जैनरेटिव एआई और महाकाय टैक्नॉलॉजी कम्पनियाँ, हमारी जैविक प्रवृत्तियों पर “क़ब्ज़ा” कर चुकी हैं… डर, भय और नफ़रत सबसे तेज़ फैलते हैं. 

यही कारण है कि दुनिया के 72 प्रतिशत लोग आज अलोकतांत्रिक शासन में रह रहे हैं और लोकतांत्रिक चुनावों के ज़रिए ही, अलोकतांत्रिक नेता चुने जा रहे हैं.

उन्होंने समाधान पूछे जाने पर, “Public Interest Technology” यानि जनहित प्रौद्योगिकी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया. ऐसी डिजिटल प्रणाली, जो मुनाफ़े से, पहले सार्वजनिक हित को रखे, अल्गोरिदम से लोगों को उकसाए नहीं.

मारिया रेसा ने अपने समाचार मंचों - ‘Rappler’ के लिए मैट्रिक्स प्रोटोकॉल आधारित चैट ऐप विकसित करने का उदाहरण दिया, जिसमें लोगों और चुनाव आयोग के बीच सीधे संवाद हो रहा है, बिना ट्रोलिंग और हमलों के.

उन्होंने आगाह किया कि दुनिया भर में छोटे और मझोले समाचार संस्थान, डिजिटल मंचों और एआई की वजह से, ख़त्म हो रहे हैं.

उन्होंने कहा कि “घाना, केन्या, फ़िलिपींस, भारत – सब जगह डिजिटल मीडिया बुरी हालत में है.” 

मारिया रेसा ने संयुक्त राष्ट्र से उम्मीद जताई कि यह विश्व संगठन, लोकतंत्र और सूचना की अखंडता के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकता है.

"अगर यह नहीं हुआ, तो दुनिया बेहद ख़राब दिशा में जाएगी. समय कम है, और ‘Move Fast, Break Things’ नहीं, ‘Move Fast, Build Things’ की ज़रूरत है, यानि हमें तोड़ने नहीं, बल्कि जोड़ने की ज़रूरत है."