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आंशिक रूप से बादलों से घिरे आसमान के नीचे हिमालय के एक पहाड़ी दर्रे से गुजरने वाली बर्फीली सड़क पर एक वाहन और पर्यटक।

‘जहाँ विचरण करते हैं हिम तेन्दुए’: भारत के हिम रेगिस्तान को वैश्विक मान्यता

© UNESCO/Spiti Wildlife Division Kasa कोल्ड डेज़र्ट बायोस्फ़ियर रिज़र्व, हिमाचल प्रदेश के अभूतपूर्व परिदृश्यों में से एक है, जो लगभग 7,770 वर्ग किलोमीटर में फैला है.

‘जहाँ विचरण करते हैं हिम तेन्दुए’: भारत के हिम रेगिस्तान को वैश्विक मान्यता

जलवायु और पर्यावरण

ये बात है उन प्राचीन घाटियों की, जहाँ हिम तेन्दुए विचरण करते हैं और बौद्ध भिक्षुओं की हज़ारों वर्षों पुरानी ज्ञान-परम्परा अब भी जीवित है, भारत के एक ऐसे ही बेहद कठिन वन्य परिदृश्य को, अब यूनेस्को से वैश्विक मान्यता मिली है.

भारत उत्तरी क्षेत्र में स्थित हिमालय क्षेत्र में, हवा बहुत महीन हो जाती है और कड़ाके की ठंड पड़ती है. वहाँ पृथ्वी का एक अनोखा पारिस्थितिक तंत्र मौजूद है. 

हिमनदी घाटियों और ऊँचे पठारों वाले, इस सूखे विस्तार वाले “Cold Dessert” यानि शीत मरुस्थलीय क्षेत्र को, यूनेस्को ने नया बायोस्फ़ियर रिज़र्व घोषित किया है. यह भारतीय हिमालय में संरक्षण के लिए एक बड़ा क़दम है.

उच्च शीत मरुस्थलीय (Cold Dessert) बायोस्फ़ियर रिज़र्व, हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति ज़िले में, लगभग 7 हज़ार 770 वर्ग किलोमीटर में फैला है.

इसमें तेज़ हवा वाले पठार, हिमनदी घाटियाँ, अल्पाइन झीलें और ऊँचाई वाले कठोर मरुस्थल शामिल हैं. इसे यूनेस्को के विश्व बायोस्फ़ियर रिज़र्व नैटवर्क के सबसे ठंडे और सबसे शुष्क पारिस्थितिक तंत्रों में गिना जाता है.

3,300 से 6,600 मीटर की ऊँचाई वाले इस इलाक़े में, पिन वैली नेशनल पार्क, किब्बर अभयारण्य और चन्द्रताल अभयारण्य भी शामिल हैं.

यहाँ छोटे-छोटे गाँवों में लगभग 12 हज़ार लोग बसे हुए हैं. वे याक-बकरी पालते हैं, जौ और मटर उगाते हैं, और तिब्बती दवा पद्धति अपनाते हैं. 

इन नाज़ुक पहाड़ी संसाधनों का संचालन, बौद्ध मठ और गाँव की परिषदें मिलकर करती हैं, ताकि परम्पराएँ व प्रकृति दोनों सुरक्षित रहें.

स्पिटी घाटी का एक मनोरम दृश्य, भारत का पहला उच्च-ऊंचाई वाले ठंडे रेगिस्तान बायोस्फीयर रिजर्व, जिसमें रंगीन पर्वत श्रृंखलाएं और बादलों के साथ एक उज्ज्वल नीले आकाश के नीचे एक घुमावदार नदी दिखाई देती है।
© UNESCO/Spiti Wildlife Division Kasa

जीवित प्रयोगशालाएँ

यूनेस्को के बायोस्फ़ियर रिज़र्व “सतत विकास की जीवित प्रयोगशालाएँ” हैं. यहाँ संरक्षण और लोगों की दैनिक जीवन की गतिविधियाँ, प्रकृति को अलग करके नहीं, बल्कि साथ-साथ चलती हैं. 

यही सोच “हिम रेगिस्तान” में साफ़ नज़र आती है, जहाँ पुरानी, परखी हुई स्थानीय शासन प्रणालियों से स्पष्ट होता है कि समुदाय, पर्यावरण की रक्षा करते हुए भी समृद्ध रह सकते हैं.

इस ठंडे रेगिस्तानी इलाक़े में कठोर अल्पाइन घासें, औषधीय जड़ी-बूटियाँ और कुछ दुर्लभ पेड़-झाड़ियाँ उगती हैं, जैसेकि विलो-लीव्ड सी-बकथॉर्न, हिमालयी बर्च और पर्शियन जुनिपर.

रिज़र्व में 732 तरह के पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं. इनमें 30 केवल यहीं पाए जाते हैं और 157 प्रजातियाँ, ज़्यादातर भारतीय हिमालय में मिलती हैं.

हिमालय की बर्फीली, पथरीली ढलान पर एक लाल लोमड़ी सतर्क खड़ी है।
© UNESCO/Spiti Wildlife Division Kasa

वन्यजीवों में यहाँ हिम तेन्दुआ, हिमालयी आइबेक्स, नीलभेड़ और दुर्लभ हिमालयी भेड़िये पाए जाते हैं. आसमान में हिमालयी हिम कॉक और गोल्डन ईगल जैसे कई पक्षी दिखाई देते हैं.

ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु और जैव विविधता के बढ़ते संकटों से जूझ रही है, तब यूनेस्को के बायोस्फ़ियर रिज़र्व चर्चा में कम, मगर सशक्त समाधान पेश करते हैं. 

ये केवल संरक्षित भूमि नहीं, बल्कि “जीवित प्रयोगशालाएँ” हैं, जहाँ समुदाय, वैज्ञानिक और सरकारें मिलकर प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीने के टिकाऊ रास्ते खोजते हैं.

भारत में, कोल्ड डेज़र्ट को दर्जा मिलने के बाद भारत, यूनेस्को बायोस्फ़ियर रिज़र्व की संख्या 13 हो गई है, जहाँ 1 करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं. 

ये रिज़र्व दिखाते हैं कि सरकारें, वैज्ञानिक और स्थानीय आदिवासी समुदाय मिलकर, किस तरह प्रकृति और विकास का सह-प्रबंधन कर सकते हैं - जलवायु सहनसक्षमता व जोखिम घटाने से लेकर प्रकृति-आधारित आजीविकाओं, शिक्षा एवं विज्ञान तक.

स्पीति घाटी में एक विशाल, रंगीन बुद्ध प्रतिमा एक चबूतरे पर विराजमान है, जिसके पृष्ठभूमि में एक विशाल पर्वतीय परिदृश्य दिखाई देता है।
© UNESCO/Spiti Wildlife Division Kasa

दुनिया के बायोस्फ़ियर रिज़र्व नैटवर्क में अब 136 देशों के 785 रिज़र्व शामिल हैं. ये क़रीब 74 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले हैं और लगभग 27.5 करोड़ लोगों का घर हैं. 

ख़ास बात यह है कि यूनेस्को के 70% सदस्य देशों के पास कम-से-कम एक बायोस्फ़ियर रिज़र्व है, जो सतत विकास के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता दर्शाता है.

यह घोषणा, सितम्बर के अन्त में चीन के हांगझोउ में आयोजित विश्व बायोस्फ़ियर रिज़र्व कांग्रेस में की गई. 

यह बैठक हर 10 साल में एक बार होती है और इसमें 2 हज़ार से अधिक वैज्ञानिक, नीति-निर्माता, समुदाय के नेता, उद्यमी और प्रकृति की रक्षा करने वाले लोग एकजुट होते हैं. 

वो साथ मिलकर, अगले 10 वर्षों की योजना और लक्ष्य तय करते हैं, जिसका एक अहम मक़सद यह होता है कि हर यूनेस्को सदस्य देश में कम-से-कम एक बायोस्फ़ियर रिज़र्व हो.