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ईरान पर प्रतिबन्धों की वापसी, ढील को आगे बढ़ाने वाला प्रस्ताव मसौदा नाकाम

सुरक्षा परिषद की बैठक.
UN Photo/Laura Jarriel
सुरक्षा परिषद की बैठक.

ईरान पर प्रतिबन्धों की वापसी, ढील को आगे बढ़ाने वाला प्रस्ताव मसौदा नाकाम

शान्ति और सुरक्षा

ईरान को, 2015 के परमाणु समझौते के तहत प्रतिबन्धों से मिली राहत को आगे बढ़ाने की पेशकश करने वाला एक प्रस्ताव शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पारित नहीं हो सका है.

चीन और रूस ने इस प्रस्ताव का मसौदा पेश किया था, जिसके पक्ष में चार और विपक्ष में नौ वोट पड़े. दो देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में समझौते को, संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) नाम से भी जाना जाता है.

शुक्रवार को प्रस्तुत किए गए इस प्रस्ताव के मसौदे में, ईरान परमाणु समझौते को अप्रैल 2026 तक बढ़ाने की मांग की गई थी.

मसौदे में साथ ही ईरान परमाणु समझौते को स्वीकृत करने वाले, सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 (2015) को भी शामिल किया गया था. इस प्रस्ताव ने, ईरान और अन्तरराषट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बीच निरन्तर सहयोग को भी प्रोत्साहित किया.

प्रतिबन्धों की 'वापसी'

इस प्रस्ताव के नाकाम होने का मतलब है कि इस समझौते के तहत, ईरान पर से हटाए गए प्रतिबन्ध, शनिवार (26 सितम्बर) की शाम से फिर लागू हो जाएँगे.

क़रीब एक महीने पहले तीन यूरोपीय देशों - फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम - ने सुरक्षा परिषद को, ईरान द्वारा शर्तों पर अमल नहीं करने और नियमों व शर्तों के उल्लंघनों के बारे में सूचित किया था, जिससे प्रतिबन्ध फिर से लागू होने की प्रक्रिया शुरू हो रही है.

चीन के प्रतिनिधि ने इस प्रस्ताव को पारित नहीं किए जाने पर गहरा खेद व्यक्त किया और क्षेत्रीय शान्ति व स्थिरता बनाए रखने का आहवान किया.

उन्होंने कहा, "ईरानी परमाणु मुद्दे में किसी भी तरह की विफलता, एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा संकट को जन्म दे सकती है जो अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के साझा हितों के विपरीत है."

ब्रिटेन की राजदूत बारबरा वुडवर्ड ने, इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान नहीं करने का कारण बताते हुए कहा, "जैसा कि यह परिषद जानती है, ईरान वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था की अवहेलना कर रहा है."

इसके अलावा, पिछले छह वर्षों में, IAEA की 60 से अधिक रिपोर्टों में, ईरान के परमाणु प्रसार में वृद्धि का विस्तृत विवरण दिया गया है.

उन्होंने कहा, "ईरान के कार्यों का अर्थ है कि IAEA यह पुष्टि करने में असमर्थ है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शान्तिपूर्ण है."

ईरान के मध्यवर्ती इलाक़े - इसफ़ाहान में भी परमाणु कार्यक्रम की सुविधाएँ बताई गई हैं.
© Unsplash/Sina Bahar

ईरान का रुख़

ईरान के विदेश मंत्री सईद अब्बास अराघची ने, इस प्रस्ताव को "कूटनीति और संवाद के द्वार खुले रखने का एक सच्चा प्रयास" बताते हुए, अपने देश का समर्थन करने वाले देशों का धन्यवाद किया. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उनका देश 1970 से परमाणु अप्रसार सन्धि – NPT का एक पक्ष रहा है और शान्तिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के अपने अधिकारों का पालन करता रहा है.

उन्होंने कहा कि आज की स्थिति JCPOA से, संयुक्त राज्य अमेरिका के हटने और तीन योरोपीय देशों - E3 द्वारा अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं करने का "प्रत्यक्ष परिणाम" है.

ईरानी विदेश मंत्री ने कहा, "संयुक्त राज्य अमेरिका ने कूटनीति के साथ विश्वासघात किया है, लेकिन तीन योरोपीय देशों - E3 ने ही इसे दफ़ना दिया है."

उन्होंने आगे कहा कि उनका देश "परमाणु हथियारों सहित सामूहिक विनाश के हथियारों को अस्वीकार करता है" क्योंकि ये "इस्लामी शिक्षाओं" और "हमारे रक्षा सिद्धान्त" के विपरीत हैं.

ईरानी परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों और वैज्ञानिकों की हत्याओं के बावजूद, उनके देश ने एक रचनात्मक क़दम उठाया और अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसू - IAEA के साथ एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.

उन्होंने अमेरिका और E3 पर कूटनीति में बाधा डालने और प्रतिबन्धों में राहत को ख़त्म करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया, जिसे ईरान "क़ानूनी रूप से अमान्य, राजनैतिक रूप से लापरवाह और प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण" मानता है.

उन्होंने कहा कि प्रस्ताव 2231 (2015) के तहत प्रतिबन्धों को, फिर से लागू करने के प्रयास "अमान्य और निरर्थक" हैं.

उन्होंने कहा, "अगर समझौते अपनी मर्ज़ी से तोड़े जा सकते हैं, तो कोई भी देश अन्तरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं पर भरोसा नहीं कर सकता."

देशों के रुख़

बारबरा वुडवर्ड ने कहा, "ईरान द्वारा उठाए गए क़दमों में उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार जमा करना भी शामिल है, जिसका कोई विश्वसनीय सिविल औचित्य नहीं है और किसी ऐसे देश के लिए अभूतपूर्व है जिसका कोई परमाणु हथियार कार्यक्रम नहीं हो."

संयुक्त राज्य अमेरिका की उप-प्रतिनिधि डोरोथी शीया इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि सुरक्षा परिषद ने "रूसी संघ और चीन के इस अन्तिम प्रयास" को अस्वीकार कर दिया, और इस मसौदे को "ईरान को अपनी परमाणु प्रतिबद्धताओं को लगातार पूरा नहीं करने के लिए किसी भी जवाबदेही से मुक्त करने का एक खोखला प्रयास" बताया.

रूस के उप-स्थाई प्रतिनिधि दिमित्री पोलियांस्की ने उन देशों को सम्बोधित किया जिन्होंने इस मसौदे का समर्थन करने से इनकार किया.

उन्होंने कहा, "अब, निश्चित रूप से कोई भ्रम नहीं है. इन देशों ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कर दिया है कि इतने वर्षों से ईरानी परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर राजनयिक समाधान पर ध्यान केन्द्रित करने के उनके सभी आश्वास केवल शोर-शराबा थे."