बीजिंग घोषणापत्र: महिला अधिकारों के लिए सबसे 'महत्वाकाँक्षी घोषणापत्र'
चीन की राजधानी बीजिंग में वर्ष 1995 में देशों ने एक साथ आकर एक घोषणापत्र – बीजिंग प्लैटफ़ॉर्म – को पारित किया था, जिसे महिला अधिकारों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है. इस पड़ाव के 30 वर्ष पूरे होने के अवसर पर, न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में महिला सशक्तिकरण के विषय पर एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया.
यूएन महासभा के 80वें सत्र के लिए अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, जनरल असेम्बली के इतिहास में इस पद पर केवल पाँचवी महिला अध्यक्ष हैं.
उन्होंने सोमवार को अपने सम्बोधन में उन सभी कार्यकर्ताओं, उनके साहस की सराहना की, जिन्होंने बीजिंग प्लैटफ़ॉर्म दस्तावेज़ में हर एक शब्द के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी.
इस कार्यक्रम में, देशों, नागरिक समाज संगठनों, शिक्षा जगत, और निजी सैक्टर के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और इस दस्तावेज़ के अहम बिन्दुओं को तेज़ी से अमल में लाने पर चर्चा की.
महासभा प्रमुख ने कहा कि इस कक्ष में उपस्थिति हममें में से बहुत के लिए, ऐसे पदों पर हैं, जिनके बारे में अपनी युवावस्था में सोच पाना कठिन था. लेकिन अगली पीढ़ी के लिए यह एक तरह से सामान्य बात हो चुकी है.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि संयुक्त राज्य अमेरिकी की तत्कालीन प्रथम महिला, हिलेरी क्लिंटन ने 30 वर्ष पहले, बीजिंग में नारा दिया था: महिला अधिकार, मानवाधिकार हैं.
ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि बीजिंग घोषणापत्र, महिला अधिकारों, संसाधनों और प्रतिनिधित्व की दिशा में एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी, लेकिन 30 वर्ष बाद, यह क्राँति अभी अधूरी है.
महत्वाकाँक्षी संकल्प
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस घोषणापत्र को महिला अधिकारों के विषय में अब तक का सबसे महत्वाकाँक्षी राजनैतिक दस्तावेज़ क़रार दिया.
उन्होंने कहा कि इससे विश्व भर में क़ानूनी संरक्षण, राजनैतिक भागेदारी और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने में मदद मिली है.
महिला सशक्तिकरण मामलों के लिए यूएन संस्था (UN Women) की कार्यकारी निदेशक सीमा बहाउस ने कहा कि लड़कियों द्वारा स्कूली पढ़ाई पूरी करने की संभावना, इतिहास में पहले किसी समय की तुलना में आज कहीं अधिक है.
संसद में महिलाओं की संख्या क़रीब दोगुनी हो चुकी है और पिछले पाँच वर्षों में दुनिया भर में लगभग 100 भेदभावपूर्ण क़ानूनों को ख़त्म कर दिया गया है.
“आगे बढ़ाए हर एक क़दम ने यही सच्चाई साबित की है: लैंगिक समानता कारगर है. लेकिन प्रगति तेज़ रफ़्तार से नहीं हुई है.”
‘बस और वादे नहीं’
इसी महीने, संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का यह निष्कर्ष था कि सतत विकास एजेंडा में लैंगिक समानता से जुड़ा कोई भी लक्ष्य साकार होने के रास्ते पर नहीं है. 67.6 करोड़ महिलाएँ व लड़कियाँ घातक हिंसक टकराव की परछाई में जीवन गुज़ार रही हैं. 1990 के दशक के बाद से यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है.
यूएन की ‘स्पॉटलाइट’ पहल एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसे महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा का अन्त करने के लिए तैयार किया गया है.
इस पहल की वैश्विक पैरोकार, मैक्सिको की अभिनेत्री सिसिलिया सुआरेज़ ने भरोसा जताया कि इस लड़ाई में सकारात्मक और ठोस नतीजों को हासिल किया जा सकता है.
“इसके लिए हमें यहाँ जुट रहे लोगों से नेतृत्व की आवश्यकता है. नेतृत्व, जोकि सुधारों को प्रोत्साहन देता हो.”
यज़ीदी समुदाय की नादिया मुराद, एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जो आइसिल आतंकी संगठन के यौन तस्करों का शिकार हो गईं थी.
उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि महिला अधिकारों के लिए प्रयासरत संगठनों को वित्तीय समर्थन दिया जाना होगा, शान्ति व सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर महिलाओं की भागेदारी सुनिश्चित करनी होगी और दोषियों की जवाबदेही भी.
उनके अनुसार, महिलाओं व लड़कियों की अगली पीढ़ी विरासत में केवल वादे पाने के लिए हक़दार नहीं हैं, बल्कि उन्हें न्याय, समानता व गरिमा की वास्तविकता देनी होगी.