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दक्षिण सूडान में आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों के शिविर में महिलाओं के लिए एक सुरक्षित स्थान.

लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने के 30 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य की राह

© UNOCHA/Alioune Ndiaye दक्षिण सूडान में आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों के शिविर में महिलाओं के लिए एक सुरक्षित स्थान.

लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने के 30 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य की राह

महिलाएँ

महिलाओं के अधिकारों पर ऐतिहासिक बीजिंग घोषणा-पत्र को अपनाए हुए तीन दशक बीत चुके हैं. इस दौरान काफ़ी प्रगति हुई हैलेकिन महिलाएँ और लड़कियाँ आज भी अस्वीकार्य स्तर पर हिंसा और भेदभाव का सामना कर रही हैं. इस साल महासभा में, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों ने, अब तक की उपलब्धियों की समीक्षा की है और उस विशाल कार्यभार के प्रति आगाह भी किया है, जो अभी पूरा किया जाना बाक़ी है.

लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की ज़िम्मेदारी सम्भालने वाली संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था (UN Women) और संयुक्त राष्ट्र का आर्थिक एवं सामाजिक मामलों का विभाग (DESA) ने, सोमवार 22 सितम्बर को हुए इस आयोजन से पहले चेतावनी दी कि लैंगिक समानता से जुड़े कोई भी लक्ष्य पटरी पर नहीं हैं.

उनकी संयुक्त रिपोर्ट 2025 Gender Snapshot में बताया गया है कि 10 प्रतिशत महिलाएँ चरम निर्धनता में जी रही हैं और वर्ष 2030 तक 35.1 करोड़ महिलाएँ और लड़कियाँ इसमें फँसी रह सकती हैं.

लगभग 70.8 करोड़ महिलाएँ बिना वेतन वाले देखभाल कामकाज के कारण श्रम बाज़ार से बाहर हैं. जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उन्हें कम वेतन वाले रोज़गारों में सीमित कर दिया जाता है. 

महिलाओं को ज़मीन के स्वामित्व, वित्तीय सेवाओं और सम्मानजनक रोज़गार से वंचित रखा जाता है, यानि उन्हें प्रगति के लिए ज़रूरी साधनों तक पहुँच से वंचित किया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा अब भी जारी है: हर तीन में से एक महिला अपने जीवनकाल में शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती है. 

इसके साथ ही, 67.6 करोड़ महिलाएँ संघर्ष क्षेत्रों से सिर्फ़ 50 किलोमीटर की दूरी पर रह रही हैं - यह संख्या 1990 के दशक के बाद से सबसे अधिक है.

कुछ देशों में महिलाओं के अधिकारों पर तीखी प्रतिक्रिया और नागरिक स्थानों के सिकुड़ने से, बड़ी मुश्किलों से हासिल की गई प्रगति अब गम्भीर ख़तरे में है.

फिर भी, यह याद रखना ज़रूरी है कि 1995 में बीजिंग में हुआ चौथा विश्व महिला सम्मेलन एक ऐतिहासिक मोड़ था, जिसे लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है.

इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप बीजिंग घोषणा-पत्र और कार्रवाई योजना अपनाई गई, जिसमें ग़रीबी, शिक्षा, हिंसा, सशस्त्र संघर्षों में महिलाओं की स्थिति और सत्ता में उनकी भागेदारी जैसे अहम क्षेत्रों पर ठोस क़दम तय किए गए.

189 देशों की सरकारों ने सर्वसम्मति से घोषणा की कि महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता मानवाधिकार का विषय है, सामाजिक न्याय के लिए अनिवार्य शर्त है और विकास व शान्ति के लिए आवश्यक एवं बुनियादी ज़रूरत है.

आज महिलाओं और लड़कियों के लिए क़ानूनी सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मज़बूत है. 193 देशों में लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए 1,583 क़ानून बनाए जा चुके हैं, जबकि 1995 में ऐसे क़ानून केवल 12 देशों में थे. 

100 से अधिक देशों में हिंसा पीड़ितों की मदद के लिए पुलिस को प्रशिक्षित किया गया है.

कार्यस्थल पर अब लैंगिक भेदभाव रोकने वाले क़ानूनों की संख्या बढ़ी है, जिससे महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण के अवसर मिले हैं. बिना वेतन वाले देखभाल कार्यों का बोझ घटाने के लिए नई सेवाएँ शुरू हुई हैं, और शिक्षा के सभी स्तरों पर लैंगिक अन्तर धीरे-धीरे कम हो रहा है.

शान्तिरक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है. 2010 में जहाँ केवल 19 राष्ट्रीय कार्य योजनाएँ थीं, आज दुनिया भर में महिलाओं, शान्ति एवं सुरक्षा पर 112 राष्ट्रीय कार्य योजनाएँ लागू हैं.

कम्बोडिया में एक माध्यमिक विद्यालय के छात्र.
© UNICEF

प्रगति की क़ीमत

सोमवार के उच्च-स्तरीय कार्यक्रम में सदस्य देशों, नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थान और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर चर्चा की है कि बीजिंग घोषणा-पत्र को तेज़ी से कैसे लागू किया जाए और इसके लिए आवश्यक संसाधन किस तरह जुटाए जाएँ.

यूएन वीमेन का कहना है कि महिलाओं में निवेश करना पूरे समाज में निवेश करने जैसा है. अगर सरकारें अभी क़दम उठाएँ, तो 2050 तक महिलाओं के बीच चरम ग़रीबी 9.2 प्रतिशत से घटकर 2.7 प्रतिशत रह जाएगी, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को 342 ट्रिलियन डॉलर का लाभ हो सकता है.

हालाँकि, समानता हासिल करने के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की अपील ऐसे समय में की जा रही है जब देश न केवल इन पहलों, बल्कि आँकड़े जुटाने के काम के लिए भी धनराशि में कटौती कर रहे हैं. महिलाओं के मंत्रालयों और लैंगिक समानता संस्थानों में से केवल आधे के पास ही पर्याप्त संसाधन हैं.

यूएन वीमेन की सारा हेंड्रिक्स के अनुसार, यह असल में राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी का नतीजा है, जहाँ व्यवस्था अधिकारों और समानता के बजाय युद्ध को प्राथमिकता देती है. 

उन्होंने कहा, “हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ हर साल 2.7 ट्रिलियन डॉलर हथियारों पर ख़र्च होते हैं, लेकिन महिलाओं के अधिकारों व लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी 320 अरब डॉलर नहीं जुटाए जाते.”

महिला स्थिति आयोग में शामिल प्रतिभागी.
UN Photo/Manuel Elias

असमानता की एक और सदी

उच्च-स्तरीय सप्ताह के अन्त में, एनालेना बेयरबॉक उस चुनाव की अध्यक्षता करेंगी, जिसमें यह तय होगा कि 2027 से संयुक्त राष्ट्र महासचिव का पद कौन सम्भालेगा. लगातार बढ़ते दबाव के बावजूद, अब तक इस पद पर कोई महिला नहीं पहुँची है.

वैश्विक स्तर पर महिलाएँ अब भी सत्ता और निर्णयात्मक भूमिकाओं से वंचित हैं. वे केवल 27 प्रतिशत संसदीय सीटों और 30 प्रतिशत नेतृत्व पदों पर हैं. 

दुनिया के 113 देशों में आज तक कोई महिला राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनी. अगर प्रगति की यही रफ़्तार रही, तो नेतृत्व में लैंगिक समानता हासिल करने में एक और सदी लग जाएगी.