फ़लस्तीन मुद्दे पर, यूएन शिखर सम्मेलन से पहले कुछ ज़रूरी तथ्य
ग़ाज़ा में लगभग दो साल से जारी युद्ध के बाद भी वहाँ के निवासियों की पीड़ा कम होने का नाम नहीं ले रही है. इस बीच, इसराइल ने ग़ाज़ा पट्टी के उत्तरी हिस्से में बड़ा ज़मीनी सैन्य अभियान शुरू किया है, जिससे एक बार फिर सबकी उम्मीदें संयुक्त राष्ट्र पर आ टिकी हैं.
न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 22 सितम्बर को, फ़्राँस और सऊदी अरब की पहल पर विश्व नेताओं का शिखर सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. इसका मक़सद है लम्बे समय से अटके “दो-राष्ट्र समाधान” को आगे बढ़ाना UW, ताकि इसराइल और फ़लस्तीन, सुरक्षित एवं मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर, साथ-साथ रह सकें.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने अप्रैल में सुरक्षा परिषद को सम्बोधित करते हुए आगाह किया था कि यह प्रक्रिया “पूरी तरह ख़त्म होने के ख़तरे में है.”
उनका कहना था कि इस लक्ष्य को हासिल करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति अब “पहले से कहीं अधिक दूर” लगती है.
संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने हाल ही में पत्रकारों से बातचीत में सवाल उठाया: “विकल्प क्या है? क्या इसका मतलब एक-राष्ट्र समाधान है, जहाँ या तो फ़लस्तीनियों को निकाल दिया जाए, या फिर उन्हें अपनी ही ज़मीन पर बिना अधिकारों के जीने के लिए मजबूर किया जाए?”
उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी है कि दो-राष्ट्र समाधान को जीवित रखा जाए और उसे वास्तविकता बनाने के लिए ज़रूरी हालात तैयार किए जाएँ.”
किन मुद्दों पर होगी चर्चा?
- यह विचार कि यहूदी और फ़लस्तीनी लोगों के लिए दो अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र हों, जो शान्ति से साथ रहें, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना (1945) से पहले का है. यह अवधारणा कई सुरक्षा परिषद प्रस्तावों, शान्ति वार्ताओं और हाल के महासभा सत्रों में दोहराई जा चुकी है.
- जब फ़लस्तीन पर ब्रिटेन का नियंत्रण समाप्त हुआ, तो "फ़लस्तीन प्रश्न" संयुक्त राष्ट्र को सौंपा गया. संयुक्त राष्ट्र ने फ़लस्तीन को दो देशों - एक यहूदी और एक फ़लस्तीनी अरब - में बाँटने का प्रस्ताव दिया. साथ ही, येरूशलम को अन्तरराष्ट्रीय शहर बनाने की सिफ़ारिश की गई. यही प्रस्ताव दो-राष्ट्र समाधान की आधारशिला बने.
- शान्ति स्थापना के उद्देश्य से एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें इसराइल और अरब देशों तथा इसराइल व फ़लस्तीनियों के बीच दो अलग रास्तों पर सीधी बातचीत शुरू हुई. यह वार्ता सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 242 (1967) और 338 (1973) पर आधारित थी.
- इसराइली प्रधानमंत्री यित्ज़हाक रबीन और फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के प्रमुख यासिर अराफ़ात ने, ओस्लो समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसमें आगे की बातचीत के लिए बुनियादी सिद्धान्त तय किए गए और पश्चिमी तट व ग़ाज़ा में फ़लस्तीनी स्वशासन की नींव रखी गई.
- कई अहम मुद्दों को स्थाई समाधान की बातचीत के लिए आगे बढ़ाया गया, जो 2000 में कैंप डेविड और 2001 में तबा में हुईं. लेकिन इनमें कोई निर्णायक समझौता नहीं हो सका.
- ओस्लो समझौते के तीन दशक बाद भी संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य वही है - इसराइल व फ़लस्तीन के बीच टकराव ख़त्म करना और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून, सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों व द्विपक्षीय समझौतों के आधार पर एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक, टिकाऊ एवं समप्रभु फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना करना. यह फ़लस्तीनी राष्ट्र 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित हो, इसराइल के साथ शान्ति एवं सुरक्षा के साथ सह-अस्तित्व में रहे, और येरूशलम दोनों की राजधानी बने.
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22 सितम्बर के शिखर सम्मेलन से उम्मीदें
यह बैठक महासभा के उच्च-स्तरीय सप्ताह के उद्घाटन दिवस पर होगी, जब हर साल न्यूयॉर्क में विश्व नेता एकत्र होते हैं. यह पहल बेहद चिन्ताजनक माहौल में हो रही है.
7 अक्टूबर 2023 से गाज़ा में इसराइली सैन्य हमलों में 60 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. 22 अगस्त को उत्तरी गाज़ा में अकाल की आधिकारिक पुष्टि हुई. 9 सितम्बर को इसराइल ने क़तर में हमास अधिकारियों पर हमला किया. इसी बीच पश्चिमी तट पर बस्तियों के विस्तार की रफ़्तार और तेज़ हो गई है.
इसके बावजूद, दो-राष्ट्र समाधान पर कूटनैतिक प्रयास तेज़ होते नज़र आ रहे हैं.
12 सितम्बर को महासभा ने भारी बहुमत से 'न्यूयॉर्क घोषणापत्र' को मंज़ूरी दी. यह घोषणा-पत्र फ्राँस और सऊदी अरब द्वारा जुलाई में आयोजित सम्मेलन के बाद आया था. इसमें अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के आधार पर 'न्यायपूर्ण और टिकाऊ शान्ति' व दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया गया."
युद्ध समाप्त करने के लिए घोषणा-पत्र में हमास से ग़ाज़ा में अपनी भूमिका ख़त्म करने और हथियार फ़लस्तीनी प्राधिकरण को सौंपने की अपील की गई. अमेरिका और इसराइल ने जुलाई सम्मेलन का बहिष्कार किया था और उन्होंने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मतदान किया.
22 सितम्बर का यह शिखर सम्मेलन उस गति को और आगे बढ़ा सकता है. माना जा रहा है कि फ्राँस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्राँ फ़लस्तीन देश को मान्यता देने की घोषणा करेंगे.
ब्रिटेन, कैनेडा, बेल्जियम और ऑस्ट्रेलिया समेत कई अन्य पश्चिमी देश भी ऐसा ही करने पर विचार कर रहे हैं.
संक्षेप में, यह शिखर सम्मेलन दो-राष्ट्र समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र के रोडमैप को नई गति व मज़बूती दे सकता है.