‘लैंगिक समानता के मोर्चे पर दुनिया एक अहम मोड़ पर’– UN Women
2030 तक सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की समय सीमा पूरी होने में अब केवल पाँच वर्ष शेष हैं. यूएन वीमैन एशिया-प्रशान्त की निदेशक क्रिस्टीन अरब ने यूएन न्यूज़ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा है कि वैसे तो लैंगिक समानता की दिशा में शिक्षा और स्वास्थ्य में कुछ उल्लेखनीय सुधार हुए हैं, लेकिन प्रगति अब भी बेहद धीमी है और बढ़ते जोखिम इसे दीगर कमज़ोर कर रहे हैं. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हालात बदलने के लिए मज़बूत राजनैतिक इच्छाशक्ति और लक्षित निवेश की तत्काल ज़रूरत है.
यूएन वीमैन एशिया-प्रशान्त की क्षेत्रीय निदेशक क्रिस्टीन अरब, 8–11 सितम्बर 2025 के बीच भारत की यात्रा पर थीं.
क्रिस्टीन अरब ने अपनी भारत यात्रा के दौरान गुजरात प्रदेश में STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) क्षेत्रों में महिलाओं को सशक्त बनाने वाली एक परियोजना का दौरा किया और महिलाओं के आर्थिक भविष्य पर केन्द्रित एक उच्चस्तरीय गोलमेज़ बैठक को सम्बोधित किया.
यह यात्रा ऐसे समय पर हुई जब भारत बीजिंग+30 प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा रहा है, हाल ही में ऐतिहासिक महिला आरक्षण क़ानून लागू किया है और G20 अध्यक्षता के दौरान महिला-नेतृत्व वाले विकास को राष्ट्रीय एजेंडे के केन्द्र में रखा है. यूएन न्यूज़ के साथ क्रिस्टीन अरब की बातचीत के कुछ प्रमुख अंश -
(इस साक्षात्कार को स्पष्टता के लिए सम्पादित किया गया है.)
यूएन न्यूज़ - Gender Snapshot 2025 रिपोर्ट दिखाती है कि दुनिया एक चौराहे पर खड़ी है. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की समयसीमा पूरी होने में अब केवल पाँच वर्ष शेष हैं. लेकिन कोई भी लैंगिक समानता लक्ष्य अभी तक पटरी पर नहीं है. प्रगति को तेज़ करने के लिए कौन से तात्कालिक क़दम आवश्यक हैं. और आपको सबसे अधिक प्रभाव डालने के अवसर कहाँ दिखाई देते हैं.
क्रिस्टीन अरब- आज जारी Gender Snapshot 2025 रिपोर्ट से स्पष्ट है कि दुनिया लैंगिक समानता के मामले में एक अहम मोड़ पर है. अब पहले से ज़्यादा लड़कियाँ स्कूल पूरी कर रही हैं और 2000 से 2023 के बीच मातृ मृत्यु दर में 40% की कमी आई है. फिर भी यह प्रगति पर्याप्त नहीं है. जिन देशों में लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए मज़बूत क़ानून और संस्थान हैं, वहाँ अंतरंग साथी से होने वाली हिंसा की दर ढाई गुना कम पाई गई है.
पिछले पाँच वर्षों में जलवायु वार्ताओं में महिलाओं की भागेदारी दोगुनी हो गई है. इस दौरान 99 नए या बदले गए क़ानूनों ने भेदभाव को ख़त्म करने में मदद की है. माना जाता है कि डिजिटल लैंगिक अन्तर को पाटने से 34 करोड़ 35 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ लाभ उठा सकती हैं और 30 करोड़ ग़रीबी से बाहर निकल सकती हैं.
फिर भी, ये उपलब्धियाँ बड़े ख़तरे में हैं. महिलाओं के अधिकारों पर बढ़ती प्रतिक्रिया, नागरिक स्थानों में कमी और लैंगिक समानता कार्यक्रमों के लिए घटता वित्तीय सहयोग अब तक की प्रगति को कमज़ोर कर रहा है. अगर यही हाल रहा तो 2030 तक 35 करोड़ 10 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ अब भी चरम ग़रीबी में होंगी.
इस समय 67.6 करोड़ महिलाएँ ऐसे इलाक़ों में रह रही हैं जहाँ घातक संघर्ष का ख़तरा है - यह संख्या 1990 के दशक के बाद सबसे ज़्यादा है. साथ ही, 2024 में पुरुषों की तुलना में 6.4 करोड़ अधिक महिलाएँ मध्यम या गम्भीर खाद्य असुरक्षा से जूझ रही थीं.
ये आँकड़े दिखाते हैं कि दुनिया लैंगिक समानता के मामले में पीछे जा रही है. लेकिन यह भी स्पष्ट है कि निवेश और मज़बूत राजनैतिक इच्छाशक्ति से हालात बदले जा सकते हैं.
2030 एजेंडा को हासिल करने के लिए अब केवल पाँच साल बचे हैं. इस समय में शिक्षा, देखभाल, हरित अर्थव्यवस्था, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में तुरन्त और केन्द्रित निवेश करना ज़रूरी है, जिसका असर दूरगामी और बड़ा होगा.
यूएन न्यूज़ - भारत को अक्सर एक क्षेत्रीय मानक माना जाता है. क्या आपको लगता है कि भारत के लैंगिक आँकड़े, संयुक्त राष्ट्र महासभा में नीति संवादों को आकार देने और एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में लैंगिक समानता की प्राथमिकताओं को प्रभावित करने में मदद कर सकते हैं?
क्रिस्टीन अरब - भारत यह दिखाने में हमेशा क्षेत्र में आगे रहा है, कि सतत विकास लक्ष्य महिलाओं और लड़कियों की प्रगति के बिना पूरे नहीं हो सकते. इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, लैंगिक समानता से जुड़े मुद्दों के लिए बजट आवंटन, जहाँ बहुत कम सरकारों ने इतने लम्बे समय तक राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई है. पिछले दशक में ही भारत के केन्द्रीय स्तर पर लैंगिक मुद्दों के लिए बजट आवंटन चार गुना बढ़ गए हैं.
महिलाओं की राजनैतिक भागेदारी के प्रति भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. 1990 के दशक में लागू किए गए विशेष अस्थाई उपायों और स्थानीय पहलों के माध्यम से अब तक 14 लाख महिलाएँ स्थानीय स्तर पर निर्वाचित हुई हैं. आने वाले वर्षों में महिला आरक्षण विधेयक के लागू होने के साथ, भारत अन्य सदस्य देशों के लिए एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसे अपनाया और दोहराया जा सकता है.
यूएन न्यूज़ - जैसे-जैसे देश बीजिंग+30 की तैयारी कर रहे हैं, ज़मीनी स्तर के महिला समूहों को इन प्रक्रियाओं में किस तरह शामिल किया जा रहा है. विशेष रूप से, श्रीलंका जैसे नाज़ुक लोकतंत्रों में, जहाँ नागरिक क्षेत्र पर दबाव रहा है, वहाँ कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है कि महिलाओं की आवाज़ें नज़रअन्दाज़ नहीं हों?
क्रिस्टीन अरब - श्रीलंका में हमारे बहुत सकारात्मक अनुभव रहे हैं, जहाँ सरकार ने महिलाओं के नागरिक समाज के लिए स्थान बनाया है, जो मज़बूत और बेहद सक्षम है. विशेष रूप से शासन में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करने के प्रयासों में, इस क्षेत्र के कुछ प्रमुख लैंगिक विशेषज्ञ श्रीलंका से हैं.
वर्ष 2024 में, ESCAP और यूएन वीमैन ने क्षेत्र की सबसे बड़ी सभाओं में से एक का आयोजन किया, जिसमें 500 से अधिक नागरिक समाज प्रतिनिधियों ने भाग लिया और उनमें से लगभग आधे युवा थे. इस बैठक की एक उल्लेखनीय विशेषता थी उन समूहों का बेहतर समावेशन, जिन्हें पहले अक्सर बाहर रखा जाता था - जैसकि विकलांग महिलाएँ, LGBTQ समुदाय और युवा कार्यकर्ता. यह समावेशन पहले से अधिक स्वाभाविक लगा, ख़ासतौर पर प्रशान्त क्षेत्र में, जहाँ प्रगतिशील सरकारों के समर्थन से LGBTQ और विकलांग अधिकारों को सहजता से अपनाया गया.
यूएन न्यूज़ - अफ़ग़ानिस्तान आज महिलाओं के लिए सबसे कठिन परिस्थितियों वाले देशों में गिना जाता है. लैंगिक प्रतिबंध मानवीय एजेंसियों की राहत पहुँचाने की क्षमता को कैसे प्रभावित कर रहे हैं और लड़कियों की शिक्षा व महिलाओं की आजीविका की रक्षा के लिए यूएन वीमैन कौन सी ठोस रणनीतियाँ अपना रहा है?
क्रिस्टीन अरब - अफ़ग़ानिस्तान आज दुनिया में महिलाओं पर सबसे घोर दमन का प्रतीक है. संयुक्त राष्ट्र के लिए चुनौती दोहरी है: प्रतिबन्ध केवल उन महिलाओं को ही प्रभावित नहीं करते जिनकी हम सेवा करते हैं, बल्कि हमारी अपनी महिला कर्मचारियों को भी भी प्रभावित करते हैं. बढ़ते प्रतिबन्ध हमारी सहायता कार्रवाई क्षमता को बेहद सीमित कर देते हैं, जबकि हाल के भूकम्पों जैसे संकटों में महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं.
ऐसे माहौल में महिला-नेतृत्व वाले संगठन मानवीय प्रतिक्रिया की रीढ़ हैं. वे असाधारण साहस दिखा रहे हैं, भारी दबाव में भी जगह बनाए हुए हैं और यह सुनिश्चित कर रही हैं कि महिलाएँ भोजन, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा तक पहुँच बनाए रखें. मानवीय कार्यकर्ताओं को प्रभावित समुदायों तक पहुँचने के लिए कई बार तो दो से तीन घंटे पैदल चलना पड़ता है. उनके बिना बुनियादी सेवाएँ ध्वस्त हो जाएँगी.
संरचनात्मक चुनौतियाँ, बजट कटौती और लौटने वाले विस्थापितों की बड़ी संख्या स्थिति को और कठिन बना देती है. फिर भी हमारी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि हम अफ़ग़ान महिलाओं के साथ खड़े रह पाए हैं, जो असम्भव परिस्थितियों में भी सेवाएँ देती रही हैं. जहाँ भी सम्भव होता है, हम इस पर ज़ोर देते हैं कि महिलाओं और उनके बच्चों के लिए मानवीय सेवाओं तक सुरक्षित पहुँच के लिए अलग स्थान सुनिश्चित किए जाएँ.
हाल ही में मैंने अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी प्रान्तों में पुरुषों से मुलाक़ात की. उनकी व्यावहारिक सोच ने मुझे प्रभावित किया. उनकी कोई बड़ी माँगे नहीं थीं - वे चाहते थे कि महिलाओं द्वारा बनाए गए क़ालीनों को निर्यात करने में मदद मिले, बाज़ारों तक पहुँच मिले, आजीविका जीवित रहे. औ हमारे सर्वेक्षण बताते हैं प्रतिबन्धों के बावजूद, 90 प्रतिशत से अधिक अफ़ग़ान - महिलाएँ और पुरुष दोनों - अब भी चाहते हैं कि उनकी बेटियाँ शिक्षित हों. यह दृढ़ता असाधारण है और हमें उम्मीद देती है.
यूएन न्यूज़ - हमने हाल ही में इस क्षेत्र में अस्थिरता देखी है - बांग्लादेश, इंडोनेशिया और अब नेपाल में. ये देश जलवायु दबावों का भी सामना कर रहे हैं. आपके विचार में महिलाएँ राजनैतिक स्थिरता और जलवायु सहनसक्षमता सुनिश्चित करने में क्या भूमिका निभा सकती हैं?
क्रिस्टीन अरब - जलवायु परिवर्तन सीमाओं का सम्मान नहीं करता, इसलिए हमारी प्रतिक्रिया भी सीमाओं से परे होनी चाहिए. हम स्वीडन, जर्मनी, न्यूज़ीलैंड और स्विट्ज़रलैंड द्वारा समर्थित हमारे क्षेत्रीय ‘Empower’ कार्यक्रम के माध्यम से, रोकथाम और सहनसक्षमता, दोनों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं.
जब मैंने बाढ़ के बाद बांग्लादेश का दौरा किया, तो महिलाओं ने बार-बार कहा: मानवीय सहायता अच्छी है, लेकिन हमें वास्तव में सहनसक्षमता बढ़ाने की ज़रूरत है - क्योंकि बाढ़ अगले वर्ष फिर लौटेगी. यही हमारे काम का सार है: लैंगिक दृष्टि से उत्तरदाई आपदा जोखिम न्यूनीकरण का निर्माण करना, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की तकनीकी विशेषज्ञता के साथ साझेदारी में, और यह सुनिश्चित करना कि योजना और पुनर्बहाली में महिलाएँ केन्द्र में हों.
प्रशान्त क्षेत्र इस मामले में अग्रणी रहा है कि महिला-नेतृत्व वाली, सामुदायिक-आधारित पहलें किस तरह स्थाई सहनसक्षमता बनाती हैं. और प्रमाण स्पष्ट हैं - जब भी सामुदायिक स्तर पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण मज़बूत होता है, तो यह इसलिए होता है क्योंकि उसमें महिलाएँ सक्रिय रूप से शामिल होती हैं.
इस वर्ष पूरे क्षेत्र में बाढ़ विशेष रूप से गम्भीर रही है - पाकिस्तान और बांग्लादेश से लेकर म्याँमार और थाईलैंड तक. सरकारों और महिला-नेतृत्व वाले संगठनों के साथ मिलकर काम करने से तैयारी में सुधार हुआ है. चुनौती तब आती है जब प्राकृतिक आपदाएँ मौजूदा मानवीय संकटों के साथ एक ही समय पर टकराती हैं, जैसा कि हमने म्याँमार में भूकम्पों और अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष और विस्थापन के मामलों में देखा है.
यूएन न्यूज़ - क्या आपको लैंगिक दृष्टि से उत्तरदाई जलवायु सहनसक्षमता पर क्षेत्रीय सहयोग के अवसर दिखाई देते हैं?
क्रिस्टीन अरब - हमें क्षेत्रीय स्तर पर लैंगिक दृष्टि से उत्तरदाई जलवायु सहनसक्षमता में गहरी रुचि दिखाई दे रही है. विशेष रूप से हमारे UNEP के साथ संयुक्त कार्यक्रम के तहत एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में पहले ही 10 करोड़ डॉलर से अधिक का जलवायु वित्त जुटाया जा चुका है. यह निवेश UNEP की प्रमुख ताक़तों में से एक है और इसने सरकारों तथा महिला-नेतृत्व वाले संगठनों को ठोस कार्रवाई के लिए ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराए हैं.
जब हम सदस्य देशों को साथ लाते हैं, तो मंत्रालय लगातार वही सवाल पूछते हैं: और कहाँ क्या सफल हुआ है, और उन अनुभवों को अपने देश में कैसे लागू किया जा सकता है? वानुआतु और सोलोमन द्वीप से लेकर थाईलैंड, कम्बोडिया, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक, सभी की यही इच्छा रहती है कि सफल मॉडलों से सीखा जाए और उन्हें अपनाया जाए.
दक्षिण एशिया में महिला-नेतृत्व वाले संगठन - श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत भी इस आदान-प्रदान का हिस्सा बनने के इच्छुक हैं. अब प्राथमिकता यह है कि अफ़ग़ान महिलाओं के ग़ैर-सरकारी संगठनों को भी इन नैटवर्कों में शामिल करने के रास्ते खोजे जाएँ. अक्सर वे अलग-थलग कर दिए जाते हैं, लेकिन उनकी भागेदारी आवश्यक है और इससे कई साझा सबक़ सीखे जा सकते हैं जो पूरे क्षेत्र में सहनसक्षमता मज़बूत कर सकते हैं.