'दक्षिण-दक्षिण व त्रिकोणीय सहयोग' प्रगति के इंजिन, गुटेरेश
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस वर्ष के दक्षिण-दक्षिण सहयोग दिवस पर कहा है कि आज की एक बहुध्रुवीय दुनिया में विकासशील देश, न केवल संकटों का सामना करने में, बल्कि परिवर्तन को गति देने में भी महत्वपूर्ण सहनशीलता व सरलता का प्रदर्शन कर रहे हैं. ऐसे में दक्षिण-दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग प्रगति के इंजिन हैं और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण हैं.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके ज़रिए दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित विकासशील देश (Global South), विकास लक्ष्यों को हासिल करने के इरादे से ज्ञान, कौशल व संसाधनों का आदान-प्रदान करते हैं. यह सहयोग सरकारों, क्षेत्रीय संगठनों, नागरिक समाज, शिक्षा जगत व निजी सैक्टर की साझेदारी में होता है.
वहीं, त्रिकोणीय सहयोग में तीन पक्षों की भूमिका होती है. दो दक्षिण से और एक वैश्विक उत्तर यानि विकसित दुनिया के देशों से, और यह एक अन्तरराष्ट्रीय संगठन भी हो सकता है. इसके तहत उत्तर में स्थित पक्ष, वित्तीय संसाधन प्रदान करता है ताकि दक्षिण के देश किसी ख़ास विषय पर तकनीकी सहयोग का आदान-प्रदान कर सकें.
महासचिव ने 12 सितम्बर को विश्व दक्षिण-दक्षिण सहयोग दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि इस दिन “हम वैश्विक दक्षिण में अवसर, नवाचार और एकजुटता की बढ़ती गति का जश्न मनाते हैं.”
यूएन प्रमुख ने कहा कि विकासशील देश, साहसिक, घरेलू समाधान तैयार कर रहे हैं और उन्हें सीमाओं के पार साझा कर रहे हैं, जैसे कि जलवायु-अनुकूल कृषि, हरित प्रौद्योगिकी, डिजिटल वित्त और स्वास्थ्य सम्बन्धी सफलताएँ. ये समाधान आपसी सम्मान, साझा सीख और समान उद्देश्य पर आधारित हैं.
उन्होंने कहा, “साथ ही, हम बढ़ती असमानताओं को दूर करने और सतत विकास को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए, विकसित देशों की ज़िम्मेदारियों को भी स्वीकार करते हैं.”
एंतोनियो गुटेरेश ने इस महत्वपूर्ण दिवस की अहमियत की तरफ़ ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, “आइए दक्षिण-दक्षिण सहयोग को पुनर्जीवित बहुपक्षवाद और सभी के लिए एक अधिक समावेशी, समतापूर्ण विश्व के निर्माण के उत्प्रेरक के रूप में मनाएँ.”
दक्षिण-दक्षिण सहयोग के उदाहरण
यूएन महासभा के 80वें सत्र की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने, इस समारोह को अपने सम्बोधन की शुरुआत, वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच सहयोग के कुछ उदाहरणों के साथ की.
उन्होंने कहा कि फिजी में, भारत द्वारा समर्थित सौर पैनलों द्वारा स्थानीय समुदायों को बिजली मुहैया कराई जा रही है.
किरगिस्तान में, चीन के साथ सहयोग से, नई माताओं को डॉक्टरों से जोड़ने के लिए टैलीमेडिसिन का उपयोग किया जा रहा है.
और बांग्लादेश, बोस्निया एंड हर्ज़ेगोविना तथा उत्तरी मैसेडोनिया में, पुलिस बल, डिजिटल क्षेत्र में लिंग-आधारित हिंसा से निपटने के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा कर रहे हैं.
ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि ये उदाहरण दिखाते हैं कि दक्षिण-दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग किस तरह नए अवसरों और नवाचारों का लाभ उठाने और इन विकास गतिविधियों से उत्पन्न अन्तर्निहित चुनौतियों का समाधान करने के लिए बढ़ रहा है.
उन्होंने कहा, “और ये उदाहरण हमें, वास्तव में, संयुक्त राष्ट्र के मूल स्वरूप को प्रकट करते हैं, जो एक-दूसरे की यथासम्भव और सर्वोत्तम तरीक़े से मदद करने व एक-दूसरे से सीखने के बारे में है.
नए दौर की चुनौतियाँ
यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि जैसे-जैसे हम 21वीं सदी में गहराई तक पहुँच रहे हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से लेकर जुड़ने और संवाद करने के नए तरीक़ों तक, तेज़ी से हो रही प्रगति से हमारी दुनिया का स्वरूप बदल रहा है.
उन्होंने कहा, “हमारे लिए यह ज़रूरी है कि हम इन उपकरणों का लाभ उठा सकें और साथ ही दीर्घकालिक चुनौतियों का समाधान करने के लिए इनका उपयोग कर सकें.”
महासचिव की UN80 पहल और भविष्य के लिए समझौते पर अमल का, इस पर प्रभाव पड़ने की सम्भावना है कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग कैसे और कहाँ किया जाता है.
उन्होंने कहा कि “हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सीखे गए सबक़ साझा किए जाएँ, और जो भी बदलाव हों, वे दक्षिण-दक्षिण सहयोग को कमज़ोर करने के बजाय उसे मज़बूत बनाएँ.”
इसमें इस बात की पुष्टि भी शामिल है कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग, विकास का एक महत्वपूर्ण तत्व है, जिसके निर्धनता उन्मूलन, असमानताओं से निपटने और प्रत्येक सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में साबित परिणाम हैं.
उन्होंने कहा, “मैंने दो दिन पहले ही 80वें सत्र की शुरुआत हम सभी से - उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम - को एक साथ आने और बेहतर सहयोग करने की अपील के साथ की है.”
यदि महासभा विश्व मंच पर इसकी शाब्दिक अभिव्यक्ति है, जो संवाद और कूटनीति के लिए जगह प्रदान करती है, तो दक्षिण-दक्षिण सहयोग उसी भावना की स्थानीय और क्षेत्रीय अभिव्यक्ति है.
यह लोगों और समुदायों के साझाकरण, समस्या-समाधान और साझा चुनौतियों से निपटने के लिए एकजुट होने के बारे में है.
"और क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों को ऑनलाइन नफ़रत और दुर्व्यवहार को पहचानने और उससे बचाव करने का तरीक़ा सिखाने के बारे में."
ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा, “मुझे पूरा विश्वास है कि हम हर लिहाज़ से, साथ मिलकर बेहतर हैं. मैं आने वाले सत्र में आप सभी के साथ मिलकर यह बात समझाने के लिए उत्सुक हूँ कि हम साथ मिलकर वाक़ई बेहतर हैं.”
संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद (ECOSOC) के अध्यक्ष लोकबहादुर थापा ने कहा कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग, समावेशी विकास को आगार देने, परस्पर सीख को मज़बूत करने, और पूरे वैश्विक दक्षिण क्षेत्र में, नवाचार को आगे बढ़ाने के लिए बहुत अहम है.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग में भारत का योगदान
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि राजदूत पी हरीश ने, इस दिवस समारोह में अपने सम्बोधन में कहा कि भारत ने अपनी ओर से एक अग्रणी पहल करते हुए वर्ष 2017 में, भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष की स्थापना की है.
यह कोष, मांग-आधारित, स्थानीय स्तर पर संचालित दृष्टिकोण के साथ, और अल्प विकसित देशों (LDC) तथा लघु द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए, वैश्विक दक्षिण के देशों की सहायता करने में भारत की प्रतिबद्धता का उदाहरण है.
यह कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र दक्षिण-दक्षिण सहयोग कार्यालय (UNOSSC) की सहायता से और संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं तथा राष्ट्रीय सरकारों के ज़रिए लागू किया जाता है.
यह कोष सामान्य और राष्ट्रमंडल क्षेत्रों में कार्य करता है और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के अनुरूप परियोजनाओं को पूरा करता है.
भारतीय राजदूत पी हरीश ने कहा कि इस वर्ष का विषय, "दक्षिण-दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग के माध्यम से नए अवसर और नवाचार", प्रतिबद्धताओं को वास्तविकताओं में बदलने पर केन्द्रित है."
"यह विषय हमारी राष्ट्रीय सोच से निकटता से मेल खाता है क्योंकि भारत ने डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता, पूर्व चेतावनी प्रणाली, स्वास्थ्य और निर्धनता उन्मूलन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है.”
भारतीय राजदूत ने कहा, “हम अपने प्रयासों में वसुधैव कुटुम्बकम, अर्थात विश्व एक परिवार है, के अपने सभ्यतागत सिद्धान्त से प्रेरित हैं. व्यवहार में, इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पीछे नहीं छूटे.”
उन्होंने बताया कि भारत, संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष के अलावा, दो अन्य प्रमुख साझीदार देशों, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है, और उसने IBSA निर्धनता और भुखमरी उन्मूलन ट्रस्ट, का गठन किया है. तीनों देश, लोकतांत्रिक मूल्यों के साझे सूत्र से जुड़कर, विकासोन्मुखी आर्थिक मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं.
राजदूत पी हरीश ने बताया कि 2017 में अपनी स्थापना के बाद से, भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष के अन्तर्गत, 7 करोड़ 30 लाख अमेरिकी डॉलर के बजटीय ख़र्च के साथ, 63 देशों में 87 परियोजनाएँ शुरू की गई हैं.
इसी प्रकार भारत ने IBSA कोष के अन्तर्गत, संयुक्त रूप से 40 देशों में, साढ़े 5 करोड़ अमेरिकी डॉलर के बजट के साथ, 49 परियोजनाएँ शुरू की हैं.
भारतीय राजदूत ने कहा कि 65 करोड़ से ज़्यादा लोग अब भी अत्यधिक निर्धनता में जीवन जी रहे हैं, और जलवायु परिवर्तन, ऋण संकट, डिजिटल असमानता, खाद्य असुरक्षा और महामारी के बाद असमान आर्थिक सुधार आदि जैसे कई बड़े मुद्दे हमारे सामने हैं.
उन्होंने कहा कि भारत ने, इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, 25 करोड़ लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर लाकर उनके जीवन में सुधार किया है. ऐसे उदाहरण आशा, प्रतिबद्धता और उज्ज्वल भविष्य का वादा करते हैं.
“हम ग़रीबी के विरुद्ध लड़ाई में वैश्विक दक्षिण के देशों की सहायता करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं.”