अफ़ग़ानिस्तान: महिला सहायताकर्मियों पर पाबन्दी से, जीवनरक्षक सेवाओं पर गहरा असर
अफ़ग़ानिस्तान में आए भयावह भूकम्प से प्रभावित समुदायों तक राहत पहुँचाने के लिए मानवीय सहायता प्रयास जारी हैं, मगर संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों को कुछ अति-आवश्यक सेवाएँ रोकने के लिए भी मजबूर होना पड़ा है. देश में सत्तारूढ़ तालेबान प्रशासन द्वारा महिला यूएन कर्मचारियों पर पाबन्दी थोपे जाने की वजह से यह निर्णय लिया गया है.
यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के प्रतिनिधि अराफ़ात जमाल ने कहा कि हम सभी संयुक्त राष्ट्र में हमारे साथ सेवारत महिलाओं पर फिर से थोपी गई पाबन्दियों को झेल रहे हैं. उनके बिना कार्य कर पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है.
यूएन एजेंसियों ने एक दिन पहले ही आगाह किया था कि सत्तारूढ़ तालेबान प्रशासन के प्रतिबन्धों की वजह से लाखों लोगों के लिए जीवनरक्षक सहायता पर असर हुआ है.
अफ़ग़ानिस्तान में यूएन मिशन (UNAMA) ने गुरूवार को अपने एक वक्तव्य में बताया कि इन प्रतिबन्धों के तहत, संयुक्त राष्ट्र की अफ़ग़ान महिला कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्टर को राजधानी काबुल में यूएन परिसर में प्रवेश करने पर रोक लगा दी गई है.
इस वजह से, यूएन शरणार्थी एजेंसी ने समाज के निर्बल तबके तक नक़दी व समर्थन पहुँचा रहे केन्द्रों को अस्थाई रूप से बन्द कर दिया है. ये केन्द्र सीमावर्ती व उन इलाक़ों में स्थित है, जहाँ इस वर्ष की शुरुआत से अब तक ईरान और पाकिस्तान से लौट रहे लोगों ने शरण ली है.
वापिस लौट रहे लोगों की पंजीकरण प्रक्रिया के तहत बायोमीट्रिक डेटा एकत्र किया जाता है, जानकारी की समीक्षा व इंटरव्यू किया जाता है. UNHCR के अनुसार, अफ़ग़ान महिला कर्मचारियों के बिना इस ज़िम्मेदारी को पूरा कर पाना सम्भव नहीं है.
यूएन एजेंसी के प्रतिनिधि अराफ़ात जमाल ने कहा कि यह प्रक्रिया और कामकाज संचालन से जुड़ा हुआ निर्णय है. यह किसी को दंडित करने या कुछ सिद्ध करने के लिए नहीं है, लेकिन सरल शब्दों में बात यह है कि कुछ परिस्थितियों में हम महिला कर्मचारियों के बिना काम नहीं कर सकते हैं.
वर्ष 2025 की शुरुआत से अब तक, 26 लाख अफ़ग़ान, पड़ोसी देशों से अपने वतन लौट चुके हैं और बड़ी संख्या में लोगों ने यह क़दम अपनी इच्छा से नहीं उठाया है.
अराफात जमाल के अनुसार, वापिस लौटने वाले लोगों की संख्या अब भी बढ़ रही है और सितम्बर महीने के पहले सप्ताह में, क़रीब एक लाख लोगों ने पाकिस्तान की सीमा पार करके अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश किया है.
इससे यूएन एजेंसियों की सहायता प्रदान करने की क्षमता पर दबाव बढ़ा है और देश के लिए भी चुनौती उपजी है.
भूकम्प के बाद के झटके
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने भी आगाह किया है कि अफ़ग़ानिस्तान अब भी रिक्टर पैमाने पर 6.0 की तीव्रता वाले भूकम्प की बर्बादी से जूझ रहा है. 31 अगस्त को आई इस आपदा से कुनार और नांगरहार प्रान्त में जान-माल की हानि हुई और उसके बाद भी कई झटके महसूस किए जा चुके हैं.
यूनीसेफ़ प्रतिनिधि डॉक्टर तजुदीन ओयेवले ने बताया कि कम से कम 1,172 बच्चे मारे गए हैं, जोकि कुल मृतक आँकड़े का 50 फ़ीसदी है.
उन्होंने शुक्रवार को वीडियो लिन्क के ज़रिए जिनीवा में पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा कि नांगरहार में उनकी बाल पीड़ितों से मुलाक़ात हुई. तीन लड़कियों और एक लड़के को इस आपदा में बचा लिया गया था.
“वे खोए हुए थे. उन्होंने अपने परिवारों को खो दिया है, उनके घर बर्बाद हो गए हैं. परिवार के मवेशी मर चुके हैं. और इन युवा लड़कियों और उस लड़के के लिए भविष्य पूरी तरह से अन्धकारमय है.”
भीषण भूकम्प से प्रभावित इलाक़े अफ़ग़ानिस्तान के पर्वतीय क्षेत्र में दुर्गम इलाक़ों में स्थित है, जहाँ मानवीय सहायताकर्मियों के लिए पहुँच पाना सरल नहीं है. इस आपदा के शुरुआती दिनों में यूएन राहतकर्मियों ने कई घंटे पैदल चलकर ज़रूरतमन्दों तक राहत पहुँचाई है.
बदहाल सड़कें
संयुक्त राष्ट्र मानवीय सहायताकर्मियों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में पहले से ही मौजूद समस्याओं की वजह से भूकम्प के बाद राहत प्रयासों में जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है.
दुर्गम, ऊँचे इलाक़ो में लम्बी दूरियाँ तय करनी पड़ रही हैं. साढ़े तीन घंटे की यात्रा में से 40 मिनट सड़क पर कटे, जबकि शेष यात्रा मिट्टी, गारे से सनी सड़क पर तय करनी पड़ी.
घुमावदार सड़कों पर वाहनों की वजह से अक्सर जाम लग रहा है और पहाड़ों से चट्टानों के गिर जाने का ख़तरा भी है.
भूकम्प में अब तक 2,164 लोगों की मौत होने की ख़बर है, 3,428 से अधिक घायल हुए हैं और साढ़े छह हज़ार से अधिक घरों को नुसान पहुँचा है.