दक्षिण-दक्षिण सहयोग: टिकाऊ विकास और बहुपक्षवाद के लिए नए अवसर व समाधान
विकासशील देशों के समक्ष मौजूद कठिनाइयों और चुनौतियों के बावजूद, उनके बीच पारस्परिक सहयोग से समस्याओं के समाधान तलाश किए जा सकते हैं और वैश्विक विकास से जुड़े लक्ष्यों को साकार करने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है. इस दिशा में दक्षिण-दक्षिण सहयोग पहल की अहम भूमिका है.
व्यावहारिक अर्थों में, दक्षिण-दक्षिण सहयोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके ज़रिए दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित विकासशील देश (Global South), विकास लक्ष्यों को हासिल करने के इरादे से ज्ञान, कौशल व संसाधनों का आदान-प्रदान करते हैं, सरकारों, क्षेत्रीय संगठनों, नागरिक समाज, शिक्षा जगत व निजी सैकटर की साझेदारी में.
यह सहयोग मुख्य रूप से कृषि विकास, नवीकरणीय ऊर्जा, शहरीकरण, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर केन्द्रित है.
संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के तहत, अन्तरराष्ट्रीय मंच पर इन प्रयासों को समर्थन देने के इरादे से, यूएन महासभा ने दक्षिण-दक्षिण सहयोग कार्यालय (UNOSSC) भी स्थापित किया है. यूएन विकास कार्यक्रम 1974 से इसकी मेज़बानी कर रहा है.
UNOSSC द्वारा नीतियाँ तैयार व उन्हें लागू करने, क्षमताओं को मज़बूत करने, और विकास कोष की देखरेख करने में सहायता प्रदान की जाती है, जिसे मोटे तौर पर वैश्विक दक्षिण (Global South) के देश वित्तीय संसाधन मुहैया कराते हैं.
South-South Galaxy नामक ऑनलाइन मंच के ज़रिए ज्ञान, टैक्नॉलॉजी, नए समाधानों और सर्वोत्तम तौर-तरीक़ों का आदान-प्रदान किया जाता है.
यह कार्यालय एक ऐसा वैश्विक केन्द्र है, जहाँ देश, साझीदार और समुदाय एक साथ आकर समाधान साझा करते हैं और टिकाऊ विकास लक्ष्यों को साकार करने के लिए साझेदारी गढ़ते हैं.
अवसरों का वादा
यूएन कार्यालय की निदेशक दीमा ख़तीब ने यूएन न्यूज़ के साथ एक विशेष बातचीत में बताया कि वैश्विक दक्षिण में स्थित देशों में, विकास को आगे बढ़ाने के लिए अपार क्षमताएँ हैं.
इन देशों में विश्व की 80 प्रतिशत आबादी बसती है और ये देश सहनसक्षमता, नवाचार, मानव व प्राकृतिक संसाधनों के अहम स्रोत हैं.
“हम हमेशा कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है. हमारा विश्वास है कि ग्लोबल साउथ में देशों के पास केवल चुनौतियाँ ही नहीं हैं, बल्कि समाधान व नवाचार भी हैं और इन क्षेत्रों में उनकी अग्रणी भूमिका को हमें समर्थन देना होगा, और प्रोत्साहित करना होगा.”
विकास के लिए वित्त पोषण
भूराजनैतिक तनाव, ऋण का बोझ, गहरी डिजिटल दरार, और सामाजिक जटिलताएँ. वैश्विक दक्षिण में स्थित विकासशील देश ऐसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जोकि आपस में गुंथी हुई हैं. वहीं, विकास कार्यों और मानवीय सहायता प्रयासों के लिए विकसित देशों से प्राप्त होने वाली धनराशि में निरन्तर गिरावट आ रही है.
दीमा ख़तीब ने बताया कि इन बदलती वास्तविकताओं में, पिछले कुछ समय में विकासशील देशों ने सहयोग के लिए एक दूसरे का रुख़ किया है, जोकि विकास के लिए वित्तीय संसाधन मुहैया कराने के लिए एक अहम माध्यम है.
उनके अनुसार, जैसे-जैसे आधिकारिक विकास सहायता में गिरावट आएगी और ये देश अपने विकास को पोषित करने के लिए कारगर विकल्प ढूंढेंगे, इस रुझान में और तेज़ी आएगी.
“दक्षिण-दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग इस सन्दर्भ में एक बहुत प्रभावी तरीक़ा साबित हुआ है.”
त्रिकोणीय सहयोग में तीन पक्षों की भूमिका होती है. दो दक्षिण से और एक उत्तर से, और यह एक अन्तरराष्ट्रीय संगठन भी हो सकता है.
इसके तहत उत्तर में स्थित पक्ष, वित्तीय संसाधन प्रदान करता है ताकि दक्षिण के देश किसी ख़ास विषय पर तकनीकी सहयोग का आदान-प्रदान कर सकें.
सफल उदाहरण
यूएन की वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हाल के समय में अनेक अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं, जिनके अनुसार दक्षिण-दक्षिण सहयोग में रोज़गार अवसर सृजित करने, स्थानीय क्षमता निर्माण करने और आर्थिक स्थिति को बदलने की सम्भावना है. इथियोपिया, पैराग्वे, रवांडा समेत अन्य देशों में यह नज़र आया है.
मध्य पूर्व क्षेत्र में इस पहल के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल बदलाव और जलवायु अनुकूलन समेत अन्य क्षेत्रों में बदलाव लाया जा रहा है.
मोरक्को में विशाल सौर ऊर्जा फॉर्म की स्थापना का अनुभव, अब सब-सहारा अफ़्रीका के कुछ हिस्सों में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं का एक मॉडल है.
दीमा ख़तीब के अनुसार, खाड़ी देश न केवल संकट के समय में वित्तीय समर्थन प्रदान कर रहे हैं, बल्कि अपनी विशेषज्ञता को साझा करने में भी आगे हैं.
उदाहरणस्वरूप, सऊदी अरब के पास समुद्री जल के शुद्धिकरण में अपार अनुभव है, और इस ज्ञान को सूखे से जूझ रहे देशों के साथ साझा किया जा रहा है.
इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात में मसदर सिटी में ऐसे प्रयोग, शोध व क्षमताओं को निर्माण किया जा रहा है, जिससे वैश्विक साउथ में देशों को लाभ मिल सकता है.
बहुपक्षवाद के समर्थन में
UNOSSC कार्यालय प्रमुख दीमा ख़तीब ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में पसरे तनाव के बीच, दक्षिण-दक्षिण सहयोग बहुपक्षवाद में नए प्राण फूंकने और उसे मज़बूती देने के लिए एक अहम शक्ति साबित हो सकता है.
हालांकि, उनके अनुसार, यह सभी देशों के बीच सहयोग का स्थान कभी नहीं ले सकता है.
दीमा ख़तीब ने कहा कि ग्लोबल साउथ में देश एक साथ आ रहे हैं और अगुवाई करने की अपनी क्षमता को दर्शा रहे हैं, जिनमें ‘भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष’ (India-UN Development Partnership Fund) और ‘भारत-ब्राज़ील-दक्षिण अफ़्रीका कोष’ प्रमुख हैं.
उनके अनुसार, यह सामूहिक कार्रवाई की शक्ति को दर्शाता है और एक मज़बूत सन्देश है कि सीमा-पार सहयोग, सम्भव भी है और कारगर भी है.
यूएन कार्यालय प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा कि ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ मे स्थित देशों के बीच कोई दरार नहीं हो सकती है, बल्कि हमें पुल निर्माण करने होंगे. इस विषय में, संयुक्त राष्ट्र अपना दायित्व निभाने के लिए तैयार है, एक ऐसे फ़्रेमवर्क के तहत जिसमें सभी देशों को समान दृष्टि से देखा जाता है.