SDG-5: लैंगिक असमानता है सामाजिक प्रगति में बड़ी बाधा, कितनी दूर है मंज़िल?
महिलाएँ, दुनिया की आधी आबादी हैं, इसलिए समाज की आधी सम्भावनाएँ भी उन्हीं में निहित हैं. फिर भी, हर जगह लैंगिक असमानता मौजूद है, जो सामाजिक प्रगति को रोकती है. महिलाओं के लिए समानता और उनका सशक्तिकरण केवल 17 सतत विकास लक्ष्यों में से एक नहीं है, बल्कि समावेशी और टिकाऊ विकास के सभी आयामों के लिए भी आवश्यक है. सभी सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का सफल होना, लक्ष्य 5 की प्राप्ति पर निर्भर करता है.
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5) का उद्देश्य है: पुरुषों और महिलाओं के बीच मौजूद लैंगिक खाई को पाटना और सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना.
लैंगिक समानता एक मौलिक मानव अधिकार है. यह ग़रीबी घटाने, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और लड़कों-लड़कियों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
महिलाओं के विकास में, यौन हिंसा और शोषण, घरेलू कार्यों में असमान ज़िम्मेदारी, और सार्वजनिक कार्यालयों में भेदभाव जैसी समस्याएँ बड़ी बाधा हैं.
कितनी प्रगति हुई?
वैसे तो लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयासों में अहम प्रगति दर्ज की गई है. वर्ष 2019 और 2024 के दरम्यान, अनेक देशों में 99 सकारात्मक क़ानूनी सुधार लागू किए गए, जो भेदभावपूर्ण क़ानूनों को हटाने और लैंगिक समानता सुनिश्चित करने में मददगार रहे हैं.
कुछ क्षेत्रों में सुधार भी देखा गया है. उदाहरण के लिए, बाल विवाह और महिला जननांग विकृति (FGM) के मामलों में कमी आई है. साथ ही, राजनैतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागेदारी कुछ बढ़ी है.
फिर भी, एक ऐसी दुनिया का वादा अब भी अधूरा है, जिसमें हर महिला और लड़की को पूर्ण लैंगिक समानता मिले, व सभी क़ानूनी, सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को हटाया जा सके.
कोई ख़ास सुधार नहीं…
हालाँकि, वास्तविकता अभी बहुत चुनौतीपूर्ण नज़र आती है. दरअसल, 49 देशों में महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करने वाला अभी तक कोई क़ानून मौजूद नहीं हैं, जबकि 39 देशों में बेटियों और बेटों के लिए समान उत्तराधिकार के अधिकारों को रोकने वाले नियम मौजूद हैं.
संयुक्त राष्ट्र आँकड़ों के अनुसार, 87 देशों में, 50 वर्ष से कम आयु की हर 5 में से 1 महिला और लड़की ने, पिछले 12 महीनों में अपने साथी से शारीरिक और/या यौन हिंसा का सामना किया है.
जबकि, बाल विवाह जैसी हानिकारक प्रथाएँ, हर साल एक करोड़ 50 लाख लड़कियों की, बचपन की ख़ुशियों को छीन लेती हैं.
वहीं, महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक, बिना आमदनी का घरेलू और देखभाल कार्य करती हैं.
इसके लिए, आर्थिक संसाधनों के समान वितरण के साथ-साथ, बिना आमदनी वाले कार्यों में ज़िम्मेदारी का न्यायसंगत वितरण भी ज़रूरी है.
राजनैतिक क्षेत्र में अधिक महिलाओं के सक्रिय होने के बावजूद, राष्ट्रीय संसदों में उनकी हिस्सेदारी केवल 23.7 प्रतिशत है, जो पूर्ण समानता से बहुत दूर है.
इसके अलावा, निजी क्षेत्र की स्थिति भी कोई ख़ास बेहतर नहीं है, जहाँ वैश्विक स्तर पर महिलाओं की, वरिष्ठ और मध्य प्रबन्धन पदों पर मौजूदगी एक-तिहाई से कम है.
यौन व प्रजनन सम्बन्धी अधिकार अहम
दुनिया की आधी आबादी की प्रगति के लिए, यौन और प्रजनन सम्बन्धी अधिकार भी बेहद महत्वपूर्ण हैं. इन अधिकारों में कमी, अन्य प्रकार के भेदभाव को बढ़ाती है, जिससे महिलाओं से शिक्षा और सम्मानजनक कार्य के अवसर छिन जाते हैं.
इसके बावजूद, केवल 52 प्रतिशत विवाहित या सम्बन्धों में रहने वाली महिलाएँ ही, अपनी यौन गतिविधियों, गर्भ निरोधक उपयोग और स्वास्थ्य देखभाल पर स्वतंत्र निर्णय ले पाती हैं.
दुनिया भर में, 23 करोड़ से अधिक लड़कियों और महिलाओं ने, किसी न किसी रूप में महिला जननांग विकृति (FGM) का सामना किया है, जो लम्बे रक्तस्राव, संक्रमण (जिसमें HIV भी शामिल है), प्रसव सम्बन्धी जटिलताओं, बाँझपन और मृत्यु का उच्च जोखिम उत्पन्न करती है.
जबकि 15–49 वर्ष की आयु की लगभग 35 प्रतिशत महिलाएँ, शारीरिक या यौन हिंसा की शिकार हुई हैं.
यह हिंसा केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि समाज में महिलाओं की सक्रिय भागेदारी और जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है.
कैसे मिले मंज़िल!
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लड़कियों की शिक्षा सबसे अहम है. इसके अलावा, क़ानूनी सुधार, शिक्षा अभियान और महिला जननांग विकृति यानि महिला ख़तना जैसी सांस्कृतिक प्रथाओं को रोकना इस दिशा में महत्वपूर्ण क़दम हैं.
संयुक्त राष्ट्र और योरोपीय संघ की पहल Spotlight Initiative, महिलाओं और लड़कियों ख़िलाफ़ सभी प्रकार की हिंसा को समाप्त करने के लिए वैश्विक स्तर पर कार्य कर रही है.
लैंगिक समानता केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज और विकास की कुंजी है. इसे राष्ट्रीय नीतियों, बजट और संस्थानों में प्राथमिकता देना ज़रूरी है.
महिलाओं और लड़कियों को हर जगह समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए और उन्हें हिंसा व भेदभाव से मुक्त जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए.