महिलाएँ, विश्व की आधी आबादी, फिर भी समाचारों में की जाती है अनदेखी
महिलाएँ, वैश्विक आबादी का आधा हिस्सा हैं, लेकिन इसके बावजूद समाचार जगत में उनकी उपस्थिति कम ही है. एक नए वैश्विक अध्ययन के अनुसार, प्रसारण, रेडियो और प्रिंट की ख़बरों में दिखने या सुनाई देने वाली आवाज़ों में केवल एक-चौथाई महिलाएँ हैं. और चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान, इस आँकड़े में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.
अन्तरराष्ट्रीय संचार अधिकार संगठन (WACC) ने 'वैश्विक मीडिया निगरानी परियोजना' के अपने नए संस्करण में ये निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं. इस परियोजना को, महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) का समर्थन प्राप्त है.
मीडिया में लैंगिक प्रतिनिधित्व की स्थिति का आकलन करने पर केन्द्रित यह सबसे बड़ा और सबसे लम्बे समय से जारी अध्ययन है.
नई रिपोर्ट के अनुसार, ख़बरों के विषय या स्रोत के रूप में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 26 प्रतिशत है, जोकि प्रसारण, रेडियो और प्रिंट माध्यमों में उनकी अनुपस्थिति को दर्शाता है.
युवतियों और लड़कियों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिन्ताजनक है, क्योंकि वे मुख्यधारा के मीडिया में स्वयं जैसी छवि को नहीं देख पातीं हैं.
एक चिन्ताजनक तथ्य यह भी है कि लिंग-आधारित हिंसा का मुद्दा, समाचारों में लगभग नदारद है, जबकि दुनिया की आधी आबादी इससे प्रभावित है.
हर 100 में से केवल 2 ख़बरों में ही, महिलाओं पर होने वाले उत्पीड़न या हिंसा पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है.
हर 100 में से केवल 2 रिपोर्ट में ही महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की कवरेज होती है, जबकि कहीं अधिक संख्या में महिलाएँ इससे पीड़ित हैं.
इसके अलावा, हर 100 में से केवल 2 समाचारों में ही रूढ़ियों को चुनौती दी जाती है, यानि मौजूदा पूर्वाग्रहों को फिर से बल मिलता है, और लैंगिक समानता हासिल करने के रास्ते में यह एक बड़ा अवरोध है.
मीडिया निगरानी परियोजना के पिछले तीन दशकों के अनुभव के अनुसार, लैंगिक रूढ़ियों का विरोध करने वाली पत्रकारिता अब अपने न्यूनतम स्तर पर है.
यह एक स्पष्ट संकेत है कि महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों पर हो रही वैश्विक प्रतिक्रिया, अब तक मेहनत से दर्ज की गई प्रगति को पीछे धकेल रही है.
यूएन महिला संस्था की कार्यकारी उप निदेशक किर्सी माडी का कहना है, “मीडिया वास्तविकता को दर्शाता है और लोकतंत्र की नींव है. लेकिन जब महिलाओं की मौजूदगी नहीं होती हैं, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है. यह निष्कर्ष चेतावनी भी है और कार्रवाई की पुकार भी…महिलाओं की आवाज़ के बिना न तो पूरी कहानी सामने आ सकती है, न न्यायपूर्ण लोकतंत्र और न ही साझा भविष्य.”
पारम्परिक रिपोर्टिंग में प्रगति
फिर भी, कुछ क्षेत्रों में प्रगति हुई है. पारम्परिक समाचार रिपोर्टिंग में अब 41 प्रतिशत रिपोर्टर महिलाएँ हैं, जबकि 1995 में यह आँकड़ा 28 प्रतिशत था.
अध्ययन बताता है कि महिला पत्रकारों की ख़बरों में महिलाओं को शामिल करने की सम्भावना (29 प्रतिशत), पुरुष पत्रकारों की तुलना में अधिक (24 प्रतिशत) है. इससे स्पष्ट है कि न्यूज़रूम में लैंगिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने से ख़बरों में सन्तुलन लाया जा सकता है.
हालांकि मीडिया में किसी विषय पर आधिकारिक आवाज़ें, अधिकाँश मामलों में अब भी पुरुषों की ही सुनाई देती हैं. महिलाओं को अक्सर चश्मदीद गवाह के रूप में जगह दी जाती है, न कि विषय विशेषज्ञ के रूप में, भले ही उनके पास योग्यता हो.
यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया सतत विकास लक्ष्यों की अन्तिम पाँच वर्षों की अवधि में प्रवेश कर रही है. और संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र में बीजिंग+30 की समीक्षा हो रही है.
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह है कि विरोध वास्तविक है, प्रगति रुकी हुई है, और जवाबदेही को अब और नहीं टाला जा सकता है.
किर्सी माडी के अनुसार, “महिलाओं और लड़कियों का हक़ है कि वे स्वयं को मीडिया में देखें और उनकी आपबीतियों को मीडिया में स्थान मिले.
अब ज़िम्मेदारी सरकारों, सम्पादकों, मीडिया मंचों और नीति-निर्माताओं की है कि इस समानता को साकार करें. हम तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक हर न्यूज़रूम और हर ख़बर में महिलाओं की आवाज़ नहीं सुनाई देगी.”