कचरे से अवसर की ओर: युवजन और नवाचार के साथ रोज़गार की नई राह
दक्षिण एशिया में क़रीब 40 फ़ीसदी कार्यबल, कृषि क्षेत्र में सक्रिय है. इसके बावजूद, 30 प्रतिशत से अधिक खाद्य उत्पादन नष्ट या बर्बाद हो जाता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर गहरा असर होता है. इसके मद्देनज़र, भोजन की बर्बादी को घटाने के लिए एक नई पहल शुरू की गई है, जिससे रोज़गार सृजित करने, बेहतर पोषण व जलवायु सहनसक्षमता निर्माण में भी मदद मिलेगी.
भारत में जब क्रिस्टिन कागेत्सु ने ‘साथी’ की स्थापना की, तो यह उनके लिए केवल एक उत्पाद नहीं बल्कि एक आन्दोलन था. केले के रेशों से बायोडिग्रेडेबल सैनेटरी पैड बनाकर उनकी कम्पनी ने प्लास्टिक प्रदूषण, ग्रामीण बेरोज़गारी और माहवारी की अवधि में समस्या - तीनों चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत किया.
ये पैड छह महीने में नष्ट हो जाते हैं, केले के किसानों के लिए नई आय का स्रोत बनते हैं और ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार उपलब्ध कराते हैं.
खाद्य हानि और बर्बादी: एक क्षेत्रीय चुनौती
दक्षिण एशिया में उत्पादित भोजन का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो जाता है. इससे किसानों की आमदनी कम होती है, खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ता है और जलवायु जोखिम बढ़ता है. यही वजह है कि इस चुनौती को कम करना, रोज़गार सृजन एवं मज़बूत खाद्य प्रणालियाँ बनाने का एक अहम रास्ता माना जा रहा है.
युवाओं के नेतृत्व में नवाचारी उपायों के ज़रिए, कृषि के पारम्परिक तौर-तरीक़ों से खाद्य प्रणालियों में बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं.
इसी उद्देश्य से विश्व बैंक ने गेट्स फ़ाउंडेशन व अन्य साझेदारों के सहयोग से सैपलिंग (SAPLING – South Asian Policy Leadership for Improved Nutrition and Growth) नामक क्षेत्रीय मंच बनाया है.
हाल ही में कोलम्बो में हुए उच्च-स्तरीय सम्वाद में नेताओं ने स्पष्ट कहा कि मज़बूत खाद्य प्रणालियों के लिए समन्वय, नवाचार और समावेशन बेहद ज़रूरी हैं.
बदलाव की अगुवाई करते युवजन
दक्षिण एशिया में युवा उद्यमी नए-नए नवाचार कर रहे हैं. नेपाल की सोफ़िया तामांग ने ‘मैजिक बैग’ बनाए हैं, जो फल और सब्ज़ियों के उपयोग की अवधि बढ़ाते हैं और किसानों को शहरी बाज़ारों तक पहुँचने में मदद करते हैं.
भारत के नरायण लाल गुर्जर ने फलों के छिलकों से बायोडिग्रेडेबल पॉलिमर तैयार किया है, जो मिट्टी की नमी बनाए रखता है और उपज बढ़ाता है.
वहीं भारत के सोम नारायण की कम्पनी ‘कार्बनलाइट्स,’ जैविक अपशिष्ट को स्वच्छ ऊर्जा और बायोफर्टिलाइज़र में बदल रही है. इससे लैंडफिल पर शहरों की निर्भरता कम होती है और किसानों को सस्ते व टिकाऊ संसाधन मिलते हैं.
ये नवाचार केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय हैं- किसानों, ख़ासतौर पर युवाओं व महिलाओं की वास्तविक ज़रूरतों को पूरा करते हैं, जो अक्सर कृषि वैल्यू चेन में पीछे छूट जाते हैं.
जैसेकि सोफ़िया तामांग कहती हैं, “अगर हमारे पास कोल्ड स्टोरेज उपलब्ध भी हो, तब भी हमारे पास कोल्ड-स्टोरेज लायक़ उत्पाद नहीं थे.” उनका उद्यम किसानों की ज़रूरतों के अनुसार सस्ती तकनीकें उपलब्ध कराता है और यह साबित करता है कि नवाचार व सहानुभूति साथ-साथ चल सकते हैं.
समावेशन आवश्यक
अब दक्षिण एशिया के देश इन नवाचारों को नीतियों से जोड़ने लगे हैं. श्रीलंका, छोटे किसानों को शहरी बाज़ारों से जोड़ने के लिए, डिजिटल लॉजिस्टिक्स में निवेश कर रहा है.
भारत का ओपन नैटवर्क फ़ॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) किसान उत्पादक संगठनों को सीधे ई-कॉमर्स से जोड़ रहा है.
वहीं इंडोनेशिया ने 2030 तक भोजन की हानि और बर्बादी को 50 प्रतिशत तक घटाने के लिए एक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार किया है, जो दक्षिण एशिया के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है.
सैपलिंग के नवाचार मेले में ‘ईकोसेंस’ जैसी पहलें सामने आईं हैं. यह पहल, फ़सल अवशेष को ईंधन पैलेट्स में बदलकर प्रदूषण घटाती है और ग्रामीण महिलाओं के लिए नए रोज़गार के अवसर पैदा करती है.
दक्षिण एशिया का भविष्य तीन स्तम्भों पर टिका है - नवाचार, समन्वय और समावेशन. इन्हीं रास्तों से अपशिष्ट को अवसर, हाशिये को मुख्यधारा और असुरक्षा को मज़बूती में बदला जा सकता है.
इस लेख का विस्तृत संस्करण पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.