युद्धग्रस्त क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मी और सहायता कर्मी बन रहे हैं निशाना
ग़ाज़ा से लेकर सूडान तक, और यूक्रेन से लेकर हेती व डीआरसी तक, दुनिया भर के युद्ध अब केवल सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा के लिए बनाई गई स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ भी निशाने बन रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र की प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी - UNFPA की एक नवीन रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पतालों, स्वास्थ्यकर्मियों, एम्बुलेंस और स्वास्थ्य केन्द्रों पर हमलों में भयावह वृद्धि हुई है.
रिपोर्ट बताती है कि 2023 और 2024 के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमले दोगुने हो गए और केवल साल 2024 में ही, 900 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों की मौत हुई.
वर्ष 2024 में, मानवीय सहायता कर्मियों की भी रिकॉर्ड संख्या में मौतें दर्ज की गईं, लेकिन, 2025 की शुरुआत इन आँकड़ों को भी पीछे छोड़ती नज़र आ रही है.
वहीं, मानवीय सहायता के लिए वित्तीय सहायता लगातार घट रही है और दशकों से बनी सहायता सेवाएँ बमुश्किल चल पा रही हैं.
ग़ाज़ा में ढहता स्वास्थ्य तंत्र
क़रीब दो साल से जारी युद्ध ने ग़ाज़ा की स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है. अल-शिफ़ा चिकित्सा परिसर की स्पेशल सर्जरी इमारत, मलबे में तब्दील हो चुकी है.
यहाँ कुपोषण और अकाल की स्थिति में गर्भपात, समय से पहले जन्म और नवजात बच्चों की मौतों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.
ग़ाज़ा के उत्तरी हिस्से में एक वरिष्ठ दाई आयदा ने बताया, “क्योंकि डिलीवरी रूम गोलीबारी की चपेट में था, हमें अस्पताल की गलियों में बच्चों को जन्म दिलाना पड़ा. रौशनी के लिए मोबाइल फ़ोन का सहारा लिया गया... पानी और दवाओं की कमी के बावजूद हमारे हाथ रुक नहीं सकते थे. बम धमाके जारी रहे, पर ज़िन्दगी को आगे बढ़ना ही है.”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने गाज़ा में, अक्टूबर 2023 से अब तक स्वास्थ्य सेवाओं पर 720 से अधिक हमले दर्ज किए हैं.
इन हमलों में कम से कम 1 हज़ार 580 स्वास्थ्यकर्मियों की मौत हो चुकी है, जबकि इसराइल द्वारा अनेक स्वास्थ्यकर्मियों को गिरफ़्तार किए जाने और हिरासत में लिए जाने के मामले की ख़बरें भी सामने आई हैं, जिनकी पुष्टि की जानी है.
ऐसे ही लोगों में आयदा भी एक थीं, जो अपनी कहानी बताने के कुछ ही दिनों बाद एक हवाई हमले में मौत की शिकार हो गईं, जिसमें उनके परिवार के 37 अन्य सदस्य भी मारे गए.
सूडान: खंडहरों में स्वास्थ्य सेवाएँ
ख़ारतूम का इब्राहीम मलिक अस्पताल किसी समय आपातकालीन इलाज और मातृ-शिशु सेवाओं का बड़ा केन्द्र था. वो अब खंडहर बन चुका है.
डॉक्टर ख़ालिद बदरेल्दीन कहते हैं, “यहीं मैंने पहली सर्जरी और पहली बार शिशु का जन्म कराया था. अब इसे इस हाल में देखना बेहद दुखद है.”
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, सूडान के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में 80 प्रतिशत से अधिक स्वास्थ्य सुविधाएँ बन्द हैं.
राजधानी ख़ारतूम में, दाइयाँ भारी जोखिम उठाकर घर-घर जाकर महिलाओं तक पहुँच रही हैं.
वहीं अल-फ़शर मातृत्व अस्पताल के कर्मचारियों पर हमले हुए. इस दौरन, एक दाई की, उसके घर पर गोलाबारी में मौत हो गई और एक अन्य दाई का अपहरण कर लिया गया.
हेती: बिगड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था
हेती पिछले 18 महीनों से हिंसा और गैंग युद्ध की चपेट में है. यहाँ अस्पतालों और क्लीनिकों पर जानबूझकर हमले किए जा रहे हैं.
देश का सबसे बड़ा स्टेट यूनिवर्सिटी अस्पताल, दिसम्बर 2024 में, 10 महीने बाद खुला था मगर उसके उद्घाटन समारोह के दौरान हमला हुआ, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई.
उसी महीने, राजधानी पोर्त-ओ-प्रिंस में एक अस्पताल को आग लगाकर ध्वस्त कर दिया गया.
ये गैंग राजधानी पर क़ब्ज़े के लिए हिंसा और यौन शोषण का सहारा ले रहे हैं. अनुमान है कि हेती में लगभग 12 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ लैंगिक आधारित हिंसा से सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता में हैं.
लेकिन, पोर्त-ओ-प्रिंस में UNFPA द्वारा संचालित चार में से तीन सुरक्षित केन्द्रों को, लगातार असुरक्षा की स्थिति के कारण, हाल ही में बन्द करके स्थानान्तरित करना पड़ा.
आपातकालीन सेवाओं तक पहुँच बेहद सीमित होने के कारण, बलात्कार से बचे केवल एक चौथाई भुक्तभोगी ही ऐसे हैं जिन्हें, महत्वपूर्ण 72 घंटे की अवधि में चिकित्सीय देखभाल प्राप्त मिल पाती है.
यूक्रेन: लगातार हमले
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक़, रूस ने जनवरी 2025 से अब तक यूक्रेन में स्वास्थ्य सुविधाओं और कर्मचारियों पर 300 से अधिक हमले किए हैं.
इन परिस्थितियों में महिलाएँ और लड़कियाँ अक्सर मजबूर होती हैं कि वे प्रसव के लिए सुरक्षित स्थान किस तरह खोजें.
स्लोवियान्स्क की अनास्तासिया बताती हैं, “हर दिन तनाव से भरा होता है. भले ही सीधा हमला न हो, लेकिन पास में चल रही लड़ाई की आवाज़ें लगातार सुनाई देती हैं. मुझे अपने बच्चे को जन्म देे से डर लग रहा था, लेकिन ज़िन्दगी चलती रहती है. हमें भी जीना है.”
उनके क्षेत्र में नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) उपलब्ध नहीं है. डॉक्टर बच्चे का जन्म कराने के लिए ऑपरेशन तो कर सकते हैं, लेकिन जटिलताओं की स्थिति में, जच्चा-बच्चा की पूरी देखभाल सम्भव नहीं.
अनास्तासिया ने, अपनी डिलीवरी की तारीख नज़दीक आने पर लगभग 20 किलोमीटर का सफ़र तय किया.
ऐसी महिलाओं की मदद करने वाले राहतकर्मी भी ख़तरों से अछूते नहीं हैं.
UNFPA की सचल मनोसामाजिक सहायता समूह में कार्यरत रोमन का कहना है कि “जब हम हमलों या हिंसा की जगहों पर पहुँचते हैं, तो ठहरने का समय नहीं होता. हमारी अपनी प्रतिक्रियाएँ मानो थम जाती हैं. बाद में, जब पीछे मुड़कर सोचते हैं, तब अहसास होता है कि हालात कितने कठिन थे.”
DRC: मातृत्व सेवाएँ ख़तरे में
काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) के पूर्वी हिस्सों में, अधिकतर मातृ स्वास्थ्य सुविधाएँ या तो बमबारी में तबाह हो गई हैं या लूटपाट की शिकार हो चुकी हैं.
गोमा में, अब केवल एक तिहाई अस्पताल और पाँच में से एक स्वास्थ्य केन्द्र ही कार्यरत हैं. ऐसे हालात में, UNFPA की सचल स्वास्थ्य समूह ही कई महिलाओं का एकमात्र सहारा बनी हुई हैं.
फ़रवरी 2023 से विस्थापित फ़्रांसिन तोयाता ने याद करते हुए बताया कि उन्होंने किस तरह, अपनी माँ के साथ “अँधेरे और अफ़रातफ़री” के बीच लम्बा सफ़र तय कर, UNFPA समर्थित सचल क्लीनिक तक पहुँचकर बच्चे को जन्म दिया.
लेकिन, युद्ध बढ़ने के साथ हालात और बिगड़ रहे हैं. विस्थापितों के शिविर अब बमबारी की चपेट में आ रहे हैं, जबकि सचल स्वास्थ्य क्लीनिक व सहायता केन्द्र भी लूटे गए हैं और नष्ट कर दिए गए हैं.