‘मुझे वहाँ होना ही था’: DRC में WHO के एक डॉक्टर का पेशेवर साहस
काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) के गोमा शहर पर विद्रोही गुटों का क़ब्ज़ा होने से ठीक पहले के दिनों में, डॉक्टर थीर्नो बाल्डे अपने बिस्तर के पास हेलमेट और बुलेटप्रूफ़ जैकेट रखकर सोते थे. गोलाबारी के धमाकों से उनके होटल की दीवारें थर्रा उठती थीं.
गोलियों की तड़तड़ाहट रात के अँधेरे को चीरती रहती. रात दर रात, गिनी के 44 वर्षीय इस चिकित्सक को उम्मीद थी कि घेराबन्दी झेल रहा शहर किसी तरह इस हमले का मुक़ाबला कर पाएगा..
फिर जनवरी के अन्तिम दिनों की एक सुबह फ़ोन आया: उन्हें और बचे हुए अन्तरराष्ट्रीय कर्मचारियों को तत्काल निकाला जाना था – तत्काल.
डॉक्टर थीर्नो बाल्डे याद करते हैं, “हम आख़िरी विमान उड़ान से बाहर निकले.”
कुछ ही घंटों में, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य के पूर्वी हिस्से में स्थित उत्तरी कीवू की राजधानी गोमा, विद्रोही गुट M23 के कब्ज़े में थी. पड़ोसी रवांडा के समर्थन से संचालित, तुत्सी-नेतृत्व वाला यह विद्रोही गुट, क्षेत्र में अपनी अब तक की सबसे बड़ी सैन्य जीत दर्ज कर चुका था.
अधिकाँश लोगों के लिए कहानी यहीं समाप्त हो जाती - किसी तरह जान बची, मिशन बीच में ही थम गया. लेकिन जैसे ही विमान ने हवाई पट्टी से उड़ान भरी, उन्हें यक़ीन था कि वो वापस लौटेंगे.
बस एक ही सवाल था - कितनी जल्दी?
अनचाहा विराम
डॉक्टर थीर्नो बाल्डे डकार में, पश्चिम और मध्य अफ़्रीका के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आपातकालीन केन्द्र का नेतृत्व करते हैं. डॉक्टर थीर्नो बाल्डे डकार लौटकर बेचैन हो उठे.
उत्तरी कीवू से एक-एक कर नागरिकों के जनसंहार की ख़बरें आती रहीं; हर नई जानकारी उन्हें व्यथित कर रही थी. जिन सहकर्मियों को वे पीछे छोड़ आए थे, उनकी याद उन्हें सताती ररी. हर भयावह रिपोर्ट के साथ उनका यक़ीन और पुख़्ता होता गया कि उन्हें अपने साथियों के साथ वहीं रहना चाहिए था.
उन्हें दो सप्ताह बाद - ठीक अपने 45वें जन्मदिन पर - काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य के पूर्वी हिस्से में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की जवाबी सहायता कार्रवाई का नेतृत्व सौंपा गया.
उन्होंने कोनाक्री में रह रहे अपने माता-पिता को इस मिशन के बारे में नहीं बताया, ताकि वो चिन्तित न हों. उन्होंने संकोच भरे शब्दों में स्वीकार किया, “मैंने उन्हें तभी बताया जब मैं वहाँ पहुँच चुका था.”
उनकी पत्नी और दो बच्चे तो बहुत पहले से इस बात के अभ्यस्त हो चुके थे कि वह दुनिया के सबसे ख़तरनाक संकटों में तैनाती के लिए यूँ अचानक निकल पड़ते हैं.
ख़ंडहरों में वापसी
गोमा पहुँचने में उन्हें पाँच दिन लगे. तब तक हवाई अड्डा बन्द हो चुका था और सड़कों पर जगह-जगह चौकियाँ बन गई थीं.
वापसी पर जो शहर उन्होंने देखा, वह भीतर तक उजड़ चुका था: बिजली की लाइनें गिर चुकी थीं, अस्पताल घायलों से ठसाठस भरे थे, और सड़कों पर शव पड़े होने की बातें सुनाई दे रही थीं. आग के बाद जमने वाली राख की तरह, हर चेहरे पर भय बैठ गया था. “केवल पन्द्रह दिनों में सब कुछ बदल गया था.”
उनकी टीम टूट चुकी थी. थकान से सूखे-सिकुड़े, काँगो के लगभग बीस स्थानीय कर्मचारी, किसी तरह शहर की नाज़ुक स्वास्थ्य-व्यवस्था को सम्भालने की कोशिश कर रहे थे. हर कर्मचारी की सख़्त ज़रूरत होते हुए भी, उन्होंने उनमें से आधों को सँभलने के लिए छुट्टी दे दी - कम-से-कम इतना तो वह कर ही सकते थे.
फिर भी इस उजाड़ में एक राहत भरी बात थी कि अन्य यूएन एजेंसियों की तरह, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के गोदाम लूटे नहीं गए थे. ये गोदाम एक जीवनरेखा बन गए - जहाँ से अस्पतालों के लिए ईंधन, घायलों के लिए सर्जिकल किट और आपातकालीन निकासी के लिए मोबाइल फ़ोन मिल रहे थे.
इसके बावजूद आँकड़े साहस को चुनौती देने वाले थे - शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक़ मृतकों की संख्या 3 हज़ार तक पहुँच गई थी. बीमारी फैलने से पहले शवों का तत्काल निपटान ज़रूरी था.
वे कहते हैं, “हमें बहुत तेज़ी से, एक सख़्त तय समय-सीमा के भीतर, हर किसी को दफ़नाना था.” अन्ततः विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने शवों को एकत्र करने के लिए, धन अदा करके स्थानीय क़ब्र खोदने वालों की मदद ली.
हैज़े का साया
जिस दिन वे गोमा लौटे, उसी दिन एक और बीमारी ने दस्तक दी: हैज़ा. पहले मामलों की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र संगठन स्थिरीकरण मिशन – (MONUSCO) के एक शिविर में हुई, जहाँ काँगो के सैकड़ों निहत्थे सैनिक व उनके परिवार, शहर पर M23 लड़ाकों के का क़ब्ज़ा होने जाने के बाद शरण लिए हुए थे.
संयुक्त राष्ट्र शान्ति मिशन के ठिकाने, मूल रूप से शान्तिरक्षकों के लिए बने थे, वहाँ इतने सारे नागरिकों को रखने की जगह नहीं थी. साफ़-सफ़ाई की बेहद कमी थी, जिससे बीमारी तेज़ी से फैलने लगी.
उस रात डॉक्टर बाल्डे सो नहीं पाए.
अगली सुबह जब वे शिविर में पहुँचे, तो देखा कि मरीज़ ज़मीन पर लेटे थे. वो याद करते हैं, “बीस–तीस लोग थे और केवल एक डॉक्टर.” उनमें से दो लोगों की पहले ही मौत हो चुकी थी.
उनकी टीम ने, कई दिनों तक हैज़ा के फैलाव को रोकने के लिए एड़ी–चोटी का ज़ोर लगाया - कीटाणु शोधन के लिए क्लोरीन, सुरक्षात्मक उपकरण, मरीज़ों के वर्गीकरण के लिए व्यवस्था. साथ ही स्थानीय कर्मचारियों को भर्ती करके उन्हें तुरन्त प्रशिक्षण दिया गया. किन्शासा से तत्काल टीके भी मंगवाए गए.
फिर भी शहर में अफ़वाहें फैलती रहीं – लोग कहने लगे, “गोमा में हैज़ा फैल रहा है और WHO उसे सम्भाल नहीं पा रहा है.”
केवल राहत कार्रवाई के लिए यहाँ आए डॉक्टर बाल्डे, अब एक महामारी से जूझ रहे थे. वो बताते हैं, “हमें अपनी पूरी दिशा बदलनी पड़ी.”
मानो एक मुसीबत कम थी कि दूसरी बीमारी ने सिर उठा दिया. - Mpox, जो पहले गोमा के बाहरी इलाक़ों में विस्थापित लोगों के विशाल शिविरों तक सीमित था, वह अब शहर के अन्दर फैल गया.
पूर्वी काँगो में पहले की हिंसा से उजड़े लाखों लोगों के लिए बने वो शिविर, गोमा के पतन की अराजकता में ख़ाली हो गए थे. डॉक्टर बाल्डे बताते हैं, “मरीज़ अब सीधे समुदाय के बीच आ गए थे.”
विद्रोहियों के आमने-सामने
फिर बन्दूकधारी आ पहुँचे. एक दोपहर वे बिना किसी चेतावनी के विश्व स्वास्थ्य संगठन परिसर में धड़धड़ाते हुए घुस आए. क्या वे एम23 (M23) के आदेश पर थे, अपने मन से लड़ रहे बिखरे लड़ाके थे, या महज़ अपराधी?
इससे कोई अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ता था. स्टाफ़ ने उन्हें समझा-बुझाकर वापस लौटने को राज़ी कर लिया. लेकिन इस घटना ने एक बात साफ़ कर दी - वास्तविक नियंत्रण रखने वाले प्रशासन से समझ बनाए बिना, संगठन का काम रातों-रात ख़तरे में पड़ सकता है.
इसीलिए डॉक्टर बाल्डे ने उनसे सीधे सम्पर्क स्थापित करने का निर्णय लिया.
उन्होंने बताया, “हमने हिम्मत जुटाई और उनसे मिलने गए.” उन्होंने विद्रोहियों के नियंत्रण में आए उत्तरी कीवू के गवर्नर कार्यालय में जाकर, WHO का “घटना प्रबन्धक” का अपना पहचान-पत्र मेज़ पर रखा और “मैंने उनसे कहा, इबोला किसी को भी अपने जकड़ में ले सकता है, हैज़ा भी किसी को भी लग सकता है. हम यहाँ इन्हें रोकने के लिए मौजूद हैं.”
संवाद का एक साधन खुल गया - नाज़ुक, मगर पर्याप्त.
परोपकार की क़ीमत
दूसरों की मदद करने की अक्सर बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है. गोमा में दिन एक-दूसरे में घुल जाते थे - घंटों तक तपिश भरी बैठकों का सिलसिला, और शामें होटल में अकेले - जहाँ साथ की मेज़ों पर भारी हथियारों से लैस लोग खाना खा रहे होते.
रमदान के दौरान, जब शहर में कर्फ़्यू होता था, वो हर शाम को, वही सादा भोजन करके रोज़ा खोलते. वहीं बाहर का शहर अनिश्चितता से काँपता होता था.
दो महीने बाद जब वे अन्ततः डकार पहुँचे, तो उनके रक्त परीक्षणों की हालत बिगड़ी हुई थी. वे कहते हैं, “यह सचमुच व्यक्तिगत त्याग था. और मैं तो मानसिक स्वास्थ्य की बात भी नहीं कर रहा. एक मानवीय कार्यकर्ता के तौर पर, अपने ख़ुद का ख़याल रखना भी ज़रूरी है.”
पीड़ा से दुखी
डॉक्टर बाल्डे के लिए आपदा-क्षेत्रों में काम करना कोई नया अनुभव नहीं हैं. गिनी और क्यूबेक में प्रशिक्षित, मॉन्ट्रियल विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर रहे डॉक्टर बाल्डे ने हेती में भूकम्प के बाद कैनेडियन रेड क्रॉस के साथ, और फिर गिनी में इबोला प्रकोप के दौरान काम किया.
उन्होंने वर्ष 2017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ने के बाद से, कोविड-19 सहित कई आपात स्थितियों का सामना किया है.
इसके बावजूद, वे मानते हैं, गोमा ने ऐसी छाप छोड़ी जो बहुत कम संकटों ने छोड़ी होगी. वे कहते हैं, “मैं वापस जाने के लिए जो कुछ कर सकता था, किया. लेकिन उसकी बड़ी क़ीमत चुकाई.”
सेनेगल की राजधानी (डकार) में उनका परिवार भी यह क़ीमत चुकाता रहा है. उनके बच्चे जानते हैं कि उनके पिता अक्सर उन जगहों पर चले जाते हैं जहाँ दुनिया छिन्न-भिन्न हो रही होती है. उनकी पत्नी ने इस अनुपस्थिति के साथ जीना सीख लिया है.
फिर भी, जब वे, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) के पूर्वी हिस्से में बिताए उन बुख़ार भरे हफ़्तों का ज़िक्र करते हैं, एक वाक्य बार-बार- अडिग और अटल रूप से उनके ज़ेहन में लौट ही आता है - “मुझे वहाँ होना ही था.”