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आतंकवाद की रोकथाम के लिए, भुक्तभोगियों की आवाज़ें ‘अहम’’

2008 के आतंकी हमलों के दौरान मुंबई का ताज महल पैलेस होटल.
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2008 के आतंकी हमलों के दौरान मुंबई का ताज महल पैलेस होटल.

आतंकवाद की रोकथाम के लिए, भुक्तभोगियों की आवाज़ें ‘अहम’’

शान्ति और सुरक्षा

दुनिया के अनेक स्थानों पर आतंकवादी हमलों में जीवित बचे कुछ लोगों ने, गुरूवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एकजुट होकर अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने की नीतियों और प्रयासों में उनकी आवाज़ को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए.

आतंकवाद के पीड़ितों की स्मृति और श्रद्धाँजलि के अन्तरराष्ट्रीय दिवस का, यह आठवाँ वर्ष है.

यह दिवस, आतंकवादी घटनाओं में जीवित बचे लोगों को सम्मान देने, उनकी आवाज़ बुलन्द करने, जागरूकता बढ़ाने और वैश्विक एकजुटता दिखाने के लिए मनाया जाता है.

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संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद-निरोध कार्यालय (UNOCT) के प्रमुख व्लादिमीर वोरोनकोव ने इस अवसर पर आयोजित उच्चस्तरीय स्मृति सभा में कहा, “यह अन्तरराष्ट्रीय दिवस केवल याद करने के लिए नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया में भुक्तभोगियों के अधिकारों, गरिमा और उनकी आवाज़ों के लिए हमारी साझा प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर है.”

स्मरण और श्रद्धाँजलि

उन्होंने कहा, "हम उन सभी लोगों को श्रद्धाँजलि अर्पित करते हैं जिनका जीवन आतंकवाद ने छीन लिया, और हम उन लोगों के साथ एकजुटता से खड़े हैं जो आज भी दर्द, क्षति और मानसिक आघात के साथ जी रहे हैं."

इन आयोजनों में, आतंकवाद से प्रभावित लोगों और मारे गए व्यक्तियों के परिजनों ने अपनी आपबीती साझा की.

व्लादिमीर वोरोनकोव ने ज़ोर देते हुए कहा, "सहायता कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक मूल अधिकार है. अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता के अनुरूप ठोस कार्रवाई होनी भी ज़रूरी है."

उम्मीद की डोर से जुड़े

नवम्बर 2014 में केन्या में हुए आतंकी हमले में अपने पिता को खो चुके ख़लीफ़ा म्वारांगी ने कहा, "मैं अपने दर्द को और नहीं छुपा सकता था, इसलिए मैंने उसे एक उद्देश्य में बदलने का निर्णय लिया."

इस वर्ष अप्रैल में, संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद निरोध कार्यालय UNOCT ने, आतंकवाद पीड़ित संघ नैटवर्क VoTAN की शुरुआत की. 

यह वैश्विक पहल इस सशक्त सच्चाई को दर्शाती है कि आतंकवाद के भुक्तभोगियों को केवल सहानुभूति या सहायता के पात्र नहीं, बल्कि परिवर्तन के सक्रिय भागीदार के रूप में देखा जाना चाहिए.

व्लादिमीर वोरोनकोव ने कहा, "जीवितों की आवाज़ें, नीतियों को आकार देने और ऐसे हमलों को रोकने के प्रयासों में केन्द्रीय भूमिका निभाती हैं."

2004 में इंडोनेशिया के जकार्ता स्थित ऑस्ट्रेलियाई दूतावास पर हुए हमले से बची एक पीड़िता नांडा डैनियल ने कहा, "जब आतंक हमें तोड़ने की कोशिश करता है तब पीड़ितों का एकजुट होना हमें मज़बूती देता है."