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SDG-2: वर्ष 2030 तक भूख-मुक्त दुनिया का लक्ष्य, आसान या मुश्किल?

भारत में प्रवासी मज़दूर खाना पकाते हुए.
World Bank/Curt Carnemark भारत में प्रवासी मज़दूर खाना पकाते हुए.

SDG-2: वर्ष 2030 तक भूख-मुक्त दुनिया का लक्ष्य, आसान या मुश्किल?

एसडीजी

ये बहुत सोचने वाली बात है कि 21वीं सदी में भी करोड़ों लोग भूखे क्यों जीवन गुज़ारते हैं? जबकि हर दिन लगभग एक अरब भोजन थालियों के बराबर खाद्य सामग्री बर्बाद कर दी जाती है. यह एक कड़वी सच्चाई है कि जब दुनिया तकनीक, अन्तरिक्ष यात्रा और कृत्रिम बुद्धिमता (AI) के साथ नई ऊँचाइयों को छू रही है, तब भी करोड़ों लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है. सतत विकास लक्ष्य - 2 इसी समस्या पर नज़र टिकाता है.

वैश्विक स्तर पर भूख यानि भरपेट भोजन नहीं मिलने की स्थिति और खाद्य असुरक्षा लगातार बढ़ रही है.

आँकड़े बताते हैं कि 2023 में लगभग 75 करोड़ लोग भूख से पीड़ित थे, जबकि 2 अरब 33 करोड़ लोगों को नियमित और पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा था.

यह संख्या वर्ष 2019 की तुलना में 38 करोड़ 30 लाख अधिक है. कोविड-19 महामारी, जलवायु परिवर्तन, युद्ध, असमानताएँ और महँगाई ने भूख संकट को और गहरा कर दिया है.

2015 से अब तक की अवधि के दौरान, भूख का स्तर, 2005 के हालात पर वापस पहुँच चुका है और खाद्य पदार्थों की क़ीमतें भी अधिकतर देशों में लगातार ऊँची बनी हुई हैं.

अफ़्रीका की स्थिति सबसे गम्भीर मानी जा रही है. यहाँ भूख बढ़ने के तीनों बड़े कारण, युद्ध, जलवायु चरम घटनाएँ और आर्थिक गिरावट, एक साथ सक्रिय रूप से बने हुए हैं.

पश्चिम एशिया, कैरेबियाई क्षेत्र और लैटिन अमेरिका के कई हिस्सों में भी हालात बिगड़े हैं. इसके उलट एशिया में भूख का स्तर लगभग स्थिर रहा है, लेकिन यहाँ भी दुनिया की आधी से अधिक भूखी आबादी रहती है.

भोजन सहायता की कमी से, बहुत से बच्चों को भूखे पेट भी रहना पड़ रहा है.
UN News

बच्चे ज़्यादा प्रभावित

भूख का सबसे भयावह असर बच्चों पर दिखाई देता है. वर्ष 2024 में पाँच साल से कम उम्र के 6.6 प्रतिशत बच्चे गम्भीर कुपोषण (wasting) से और 23.2 प्रतिशत बच्चे नाटेपन (stunting) से प्रभावित पाए गए.

इसका मतलब है कि एक पूरी पीढ़ी, शारीरिक और मानसिक विकास में पीछे छूट रही है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि कुपोषित बच्चे कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण, बीमारियों के शिकार होते हैं और जीवन भर, आर्थिक व्यवस्था में भरपूर योगदान नहीं कर पाते. इसका सीधा असर समाज और अर्थव्यवस्था, दोनों पर पड़ता है.

भूख क्यों है बड़ी बाधा?

भूख केवल पेट भरने का सवाल नहीं है. यह विकास की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है, और लोगों को निर्धनता के चक्र में फँसा देती है

भूखे और कुपोषित लोग अक्सर बीमार पड़ते हैं. उनकी उत्पादकता कम हो जाती है और वे अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी सुधारने में असमर्थ रहते हैं.

अनुमान है कि 2030 तक, 60 करोड़ लोग भूख से जूझ रहे होंगे, यानि अगर तुरन्त और संगठित क़दम नहीं उठाए गए, तो “Zero Hunger” का सपना अधूरा रह जाएगा.

यही वजह है कि जब तक भूख की स्थिति को समाप्त नहीं किया जाता, तब तक शिक्षा, स्वास्थ्य और लैंगिक समानता जैसे दूसरे सतत विकास लक्ष्य भी पूरे नहीं हो सकते.

दुनिया भर में करोड़ों लोगों को स्वस्थ जीवन जीने के लिए ज़रूरी भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है, जबकि हर दिन सैकड़ों टन भोजन बर्बाद भी कर दिया जाता है.
© UNICEF/Mohammed Nateel

तो समाधान क्या है?

इस चुनौती से निपटने के लिए कृषि में निवेश को प्राथमिकता देना ज़रूरी है, ताकि निर्धनता कम जा सके और रोज़गार के अवसर बढ़ें.

साथ ही, खाद्य प्रणालियों में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार और वैश्विक स्तर पर समान नीतियाँ लागू करना भी अहम है.

यह केवल सरकारों और अन्तरराष्ट्रीय संगठनों का काम नहीं है. हम और आप भी बदलाव ला सकते हैं…स्थानीय किसानों से सामान ख़रीद कर, भोजन की बर्बादी रोककर, भोजन के पौष्टिक और टिकाऊ विकल्प चुनकर और उपभोक्ता तथा वोटर के रूप में सरकार और कम्पनियों से बेहतर नीतियों की माँग करके.

एक यूएन रिपोर्ट के अनुसार, केवल नीतियाँ और क़ानून बनाने से समस्या हल नहीं होगी. इसके लिए निवेश और धन उपलब्धता की ज़रूरत है, ताकि टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिले, ग़रीब समुदायों तक सामाजिक सुरक्षा पहुँचे और खाद्य प्रणालियाँ अधिक समावेशी व लचीली बन सकें.

भूख को समाप्त करना, सिर्फ़ मानवीय दायित्व नहीं बल्कि भविष्य में निवेश भी है.

भूख-मुक्त दुनिया केवल एक लक्ष्य भर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य की बुनियाद है.