इसराइली हमलों से 'ग़ाज़ा सिटी का व्यवस्थित विनाश जारी'
इसराइली सेना ने हाल के दिनों में, ग़ाज़ा सिटी में हमले बढ़ा दिए हैं और कथित तौर पर पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में लेने का फ़ैसला किया है. इन हमलों में बड़ी संख्या में आम लोग हताहत भी हुए हैं और नागरिक सम्पत्तियों को भी भारी नुक़सान हुआ है.
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय – OHCHR ने बुधवार को बताया कि अज़ ज़ायतून क्षेत्र में हाल के इसराइली हमले, विशेष रूप से विनाशकारी रहे हैं, जहाँ हवाई हमले, तोपों की गोलाबारी और बन्दूकों से की गई गोलीबारी लगातार और तीव्र हो रही है.
इन हमलों में बड़ी संख्या में आम हताहत हुए हैं और आवासीय भवनों व सार्वजनिक सुविधाओं को बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुँचा है.
यूएन मानवाधिकार कार्यालय ने, 8 अगस्त से, ग़ाज़ा शहर में आवासीय भवनों और सम्पूर्ण प्रखंडों पर 54 हमले दर्ज किए हैं, जिनमें 87 फ़लस्तीनी लोग मारे गए हैं. उनमें कम से कम 25 बच्चे और पूरे परिवार शामिल हैं.
कार्यालय ने, आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों के लिए तम्बुओं व स्कूलों सहित आश्रयों पर भी हमले दर्ज किए गए हैं, जिनमें कम से कम 14 लोग मारे गए.
मानवाधिकार कार्यालय के वक्तव्य में कहा गया है कि हताहतों की ये संख्या "इंगित करती है कि ग़ाज़ा शहर का व्यवस्थित विनाश पहले से ही जारी है."
हालाँकि, ये विनाशकारी आँकड़े वास्तविक मृतक संख्या का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं, क्योंकि ऐसी विकट परिस्थितियों में भी कम संख्या में मामले दर्ज हुए हैं.
लोग जबरन बेघर
इसराइल के हालिया हमलों के परिणामस्वरूप, सैकड़ों परिवारों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, और ग़ाज़ा पट्टी में विकट मानवीय परिस्थितियों के बीच उनके पास सुरक्षित ठिकाना नहीं है.
दूसरी तरफ़ जो लोग अब भी हमलों वाले इलाक़ों में फँसे हुए हैं, उन तक भोजन, पानी और चिकित्सा सामग्री नहीं पहुँच पा रही हैं.
OHCHR ने ज़ोर देकर कहा कि "इसराइल द्वारा ग़ाज़ा शहर पर पूर्ण नियंत्रण करने और उसकी आबादी को जबरन विस्थापित करने के कथित निर्णय से, आम लोगों की सामूहिक हत्याएँ होंगी और आबादी के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे का विनाश होगा."
मानवाधिकार कार्यालय ने अपनी निगरानी के सहारे कहा है कि इसराइली सेना युद्ध के उन्हीं तरीक़ों को दोहरा रही है जिनके कारण, उत्तरी ग़ाज़ा और रफ़ाह में पिछले सैन्य अभियानों में सामूहिक हत्याएँ, गम्भीर घाव, जबरन विस्थापन, लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने, भुखमरी और व्यापक विनाश हुआ था.
इसराइली सेना ने कथित तौर पर हमले की तैयारी के लिए, फ़लस्तीनी लोगों को, अल मवासी जाने का बार-बार आहवान किया है, जोकि ख़ान यूनिस के पश्चिम में स्थित है.
इसराइल ने अलबत्ता, अल मवासी में विस्थापितों के तम्बुओं पर बार-बार हमले किए हैं, जहाँ लोग भोजन, पानी और अन्य आवश्यक वस्तुओं के बिना ही जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की अनदेखी
अन्तरराष्ट्रीय क़ानून कहता है कि इसराइल को नागरिक सम्पत्ति को तब तक नष्ट नहीं करना चाहिए जब तक कि सैन्य अभियानों द्वारा ऐसा करना आवश्यक नहीं हो. फिर भी, ग़ाज़ा शहर में आवासीय भवनों के व्यापक विनाश को एक अनिवार्य सैन्य आवश्यकता नहीं माना जाता है.
यूएन मानवाधिकार कार्यालय ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा है कि ग़ाज़ा शहर की पूरी आबादी और उत्तरी ग़ाज़ा में बचे लोगों को बिना किसी आश्रय, भोजन या चिकित्सा व्यवस्था के बिना, विस्थापन के लिए मजबूर किया जाना, चौथे जिनीवा कन्वेंशन का गम्भीर उल्लंघन है. इसमें इन विस्थापित लोगों को, भविष्य में अपने घरों को लौटने की अनुमति देने के कोई संकेत भी नज़र नहीं आते हैं.
OHCHR ने, जिनीवा कन्वेंशन के पक्षकार देशों से आग्रह किया है कि वे अपने दायित्व का पालन करें "इस आक्रमण को तुरन्त रोकने के लिए इसराइल पर अधिकतम दबाव डालें, जिससे एक अभूतपूर्व, जानलेवा मानवीय संकट पैदा होने और ग़ाज़ा के सबसे बड़े शहरी क्षेत्र में फ़लस्तीनी उपस्थिति को स्थाई रूप से समाप्त करने का जोखिम है."
अकाल जैसे हालात
इस बीच, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने जापान द्वारा 50 करोड़ येन (33 लाख डॉलर) के जीवन रक्षक योगदान का स्वागत किया है, जो फ़लस्तीनी लोगों को आपातकालीन खाद्य और पोषण सहायता प्रदान करने के लिए दिया जा रहा है. फ़लस्तीनी लोग इस समय गम्भीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, जिससे अकाल जैसे हालात उत्पन्न हो गए हैं.
फलस्तीन में विश्व खाद्य कार्यक्रम के प्रतिनिधि और देश निदेशक एंटोनी रेनार्ड ने कहा है, "मैं ऐसे परिवारों से मिलता हूँ जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया है और ले यह नहीं जानते कि उनका अगला भोजन कहाँ से आएगा."
लेकिन जापान से मिली इस सहायता की बदौलत, "विश्व खाद्य कार्यक्रम जीवन रक्षक खाद्य सहायता प्राप्त करना जारी रख सकता है, लेकिन हमें सबसे ज़्यादा जोखिम वाले लोगों तक पहुँचने और पूर्ण अकाल को रोकने के लिए तत्काल युद्धविराम और ज़रूरतमन्द लोगों तक निरन्तर पहुँच की आवश्यकता है."