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युद्ध से सम्बन्धित यौन हिंसा में वृद्धि, मगर संसाधनों की भारी कमी

संघर्ष में यौन हिंसा पर महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पट्टन ने महिलाओं, शांति और सुरक्षा पर एक बैठक के दौरान सुरक्षा परिषद को जानकारी दी।
UN Photo/Eskinder Debebe यौन हिंसा पर विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पट्टेन

युद्ध से सम्बन्धित यौन हिंसा में वृद्धि, मगर संसाधनों की भारी कमी

महिलाएँ

युद्धग्रस्त क्षेत्रों में यौन हिंसा पर विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने, सुरक्षा परिषद की एक बैठक में कहा है कि यह संकट गहराता जा रहा है, जो वैश्विक स्तर पर युद्ध की व्यापकता को दर्शाता है. उन्होंने इस मुद्दे पर, महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की और युद्ध क्षेत्रों में रहने वाले भुक्तभोगियों का सहयोग करने की आवश्यकता पर बल दिया, जहाँ धन की भारी कमी के कारण, ज़रूरी सेवाएँ पहुँच से लगातार बाहर हो रही हैं.

वर्ष 2024 में, युद्ध से सम्बन्धित यौन हिंसा के 4 हज़ार 600 से अधिक मामले दर्ज हुए, जो 2023 की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक हैं. 

यह आँकड़ा केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा पुष्ट मामलों को दर्शाता है, लेकिन यह वास्तविक स्थिति का सिर्फ़ एक छोटा-सा हिस्सा है.

इसके अलावा, पिछले वर्ष बच्चों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा में 35 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई, जिसमें कुछ भुक्तभोगियों की आयु, केवल एक वर्ष भी थी.

यह रिपोर्ट 21 चिन्ताजनक स्थितियों को शामिल करती है, जिनमें सबसे अधिक मामले मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), हेती, सोमालिया और दक्षिण सूडान में दर्ज किए गए हैं.

यह संकट मुख्य रूप से महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है, जो हर साल लगभग 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में प्रभावित पाई जाती हैं. इस साल यह आँकड़ा 92 फ़ीसदी रहा.

रिपोर्ट की मुख्य बातें

विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने रिपोर्ट में पाए गए कई चिन्ताजनक रुझान उजागर किए. ये कुछ इस प्रकार हैं:

  • विस्थापित और शरणार्थी महिलाएँ व लड़कियाँ यौन हिंसा के अधिक ख़तरे में हैं, जिससे उनकी सुरक्षित वापसी मुश्किल हो जाती है.

  • खाद्य असुरक्षा भी यौन हिंसा का जोखिम बढ़ाती है क्योंकि युद्धरत पक्ष, मानवीय सहायता की पहुँच को सीमित करते हैं.

  • हथियारबन्द समूह यौन हिंसा का उपयोग क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण मज़बूत करने और लड़ाकों की भर्ती को बढ़ावा देने के लिए करते हैं.

  • यह हिंसा दुनिया भर में औपचारिक और अनौपचारिक हिरासत केन्द्रों में भी जारी है.

धन की कमी होने के कारण, संयुक्त राष्ट्र के शान्ति मिशन कार्यों की क्षमता कम हो गई है, जिससे भुक्तभोगियों तक मदद पहुँचाना मुश्किल हो गया है.

हैती में लैंगिक हिंसा में अचानक हुई वृद्धि के मद्देनजर चलाए जा रहे मानवीय सहायता अभियान के दौरान एक महिला अस्थायी आश्रय में बैठी हुई दिखाई दे रही है। उसे पीछे से देखा जा रहा है।
© PAHO/WHO/David Lorens Mentor

कम संसाधन… 

विश्व में, केवल 24 घंटे में होने वाला सैन्य ख़र्च उस राशि से भी अधिक है, जो एक पूरे साल में युद्ध से सम्बन्धित यौन हिंसा (CRSV) से निपटने के लिए आवंटित की जाती है.

विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने कहा कि ज़रूरतें लगातार बढ़ रही हैं…महिला प्रधान संस्थाओं को अब भी या तो बहुत कम धन सहायता मिल रही है या बिल्कुल भी नहीं प्राप्त हो रही है.

संयुक्त राष्ट्र के शान्ति मिशनों की क्षमताओं में कमी के अलावा, धन-कटौती के कारण भुक्तभोगियों के लिए आश्रय बन्द हो गए हैं, बलात्कार पीड़ितों के लिए चिकित्सा आपूर्ति रुक गई है और दुनिया भर में क्लीनिक बन्द करने पड़े हैं.

उन्होंने कहा, सूडान, यूक्रेन, इथियोपिया और ग़ाज़ा जैसे बड़े युद्धग्रस्त क्षेत्रों में स्वास्थ्य प्रणालियाँ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, वहाँ “मानवीय संगठन कम संसाधनों में, लगातार अधिक काम करने के लिए मजबूर हैं.”

प्रमिला पैटन ने आगाह किया, “अगर हम शान्ति के प्रति गम्भीर हैं, तो हमें उन संस्थाओं को धन मुहैया कराना कराना होगा जो शान्ति सम्भव बनाती हैं."

"अगर हम सुरक्षा के प्रति गम्भीर हैं, तो हमें क़ानून के शासन की पुष्टि करनी होगी और उन लोगों को जवाबदेह ठहराना होगा, जो गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों को अंजाम देते हैं, उनके आदेश देते हैं या ऐसा होने देते हैं… जिसमें युद्ध से सम्बन्धित यौन हिंसा जैसी भयावह घटनाएँ भी शामिल हैं.”

कार्रवाई की योजना

प्रमिला पैटन ने बताया कि उनका कार्य तीन प्रमुख पहलुओं पर केन्द्रित है: नियमों का पालन सुनिश्चित करना, सेवाओं की आपूर्ति को मज़बूत करना और अपराध की सजा नहीं देने के ख़िलाफ़ मज़बूत कार्य योजना तैयार करना.

उन्होंने कहा कि युद्ध में यौन हिंसा के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र कार्रवाई नैटवर्क ने 18 युद्धरत क्षेत्रों में हज़ारों भुक्तभोगियों तक मदद पहुँचाकर अहम बदलाव लाने का काम किया है.

उन्होंने चेतावनी दी कि निवेश बनाए रखने में असफलता या स्थापित मानदंडों से पीछे हटना, न केवल पीड़ितों के साथ विश्वासघात होगा, बल्कि अपराधियों को और साहसी बना देगा.