छोटे शहरों से बड़ी उड़ान, 'Start-Up Hub' तक पहुँचने की मिसालें
भारत की स्टार्टअप कहानी अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है. छोटे शहरों और गाँवों में युवा नवप्रवर्तक भी, अब मासिक धर्म स्वच्छता और प्लास्टिक कचरे जैसी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं और सफलता का नई मिसालें क़ायम कर रहे हैं.
इस बदलाव की अगुवाई कर रही है Youth Co:Lab - UNDP, Citi Foundation और अटल इनोवेशन मिशन की एक साझा पहल, जिसे 2019 में शुरू किया गया था.
Youth Co:Lab पहल के तहत युवाओं को एसडीजी से जुड़े समाधान, नवाचारों के लिए वित्तीय सहायता के साथ मार्गदर्शन, नैटवर्क और संसाधन उपलब्ध करवाए जाते हैं.
2019 से अब तक इस पहल के ज़रिए 280 से ज़्यादा स्टार्टअप्स यानि नए कारोबारों को सहायता उपलब्ध करवाई गई है. कुछ लोगों ने सरकारी साझेदारी या नई धनराशि से अपने व्यवसाय का विस्तार किया, जबकि कुछ अपने समुदायों में स्थिर रूप से आगे बढ़ते रहे.
इस पहल का ध्यान उन क्षेत्रों पर है जिन्हें अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है - जैसेकि स्वास्थ्य, कचरा प्रबन्धन, समावेशिता, जलवायु और शिक्षा.
प्रोजेक्ट बाला: ताकि लड़कियों की पढ़ाई न छूटे
सौम्या डबरीवाल ने, घाना और भारत के स्कूलों में स्वयंसेवा करने के दौरान देखा कि कई लड़कियाँ मासिक धर्म की वजह से स्कूल नहीं आ पाती थीं. उन्होंने 21 साल की उम्र में ख़ुद ऐसे स्वच्छता पैड सिलना शुरू किया जिन्हें मासिक धर्म के दौरान साफ़-सफ़ाई के लिए एक से अधिक बार प्रयोग किया जा सकता था. इसके साथ ही वो, वंचित इलाक़ों में जागरूकता फैलाने में सक्रिय हो गईं.
सौम्या ने, LinkedIn पर Youth Co:Lab के बारे में जानकर आवेदन किया, और वहाँ से प्राप्त मार्गदर्शन ने उन्हें एक मज़बूत व विस्तार योग्य मॉडल बनाने में मदद की.
कार्यक्रम के समर्थन से Project Baala ने दक्षिण एशिया और अफ़्रीका में विस्तार किया, जहाँ यह टिकाऊ उत्पादों, जागरूकता एवं नीति स्तर पर काम करके, मासिक धर्म से जुड़ी असमानताओं को दूर करने में सक्रिय है.
यह पहल अब तक भारत, नेपाल, घाना और तंज़ानिया सहित छह देशों में 10 लाख से अधिक महिलाओं और लड़कियों तक पहुँच चुकी है. इसके तहत 35 लाख से अधिक टिकाऊ सैनिटरी पैड वितरित किए जा चुके हैं और 15 हज़ार से अधिक जागरूकता कार्यशालाएँ आयोजित की गई हैं.
सौम्या का लक्ष्य साहसिक लेकिन सीधा है, "2026 तक हम 20 लाख महिलाओं और लड़कियों तक पहुँचना चाहते हैं. माहवारी कभी भी शिक्षा, सम्मान या अवसर के रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए."
Dump in Bin: कचरे से अवसर की ओर
इंजीनियर ऋषभ पटेल और नितिन यादव ने Dump in Bin की शुरुआत सिर्फ़ प्लास्टिक इकट्ठा करने के लिए नहीं, बल्कि उसे री-सायकिल करके, बड़े पैमाने पर फिर से इस्तेमाल करने के लिए की. उनका समाधान था - प्लास्टिक कचरे को सीमेंट-रहित, पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री में बदलना.
उनका यह विचार, Youth Co:Lab के सहयोग से एक ऐसा मॉडल बन गया जिसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है. ऋषभ पटेल बताते हैं, “YCL ने मेरे विचार को केवल मान्यता ही नहीं दी, बल्कि उसे असल ज़रूरतों के हिसाब से एक कामयाब व्यवसाय में बदलने में मदद की.”
अब तक यह नया कारोबार यानि स्टार्टअप, 700 टन से ज़्यादा प्लास्टिक कचरे को री-सायकिल कर चुका है और एक पायलट निर्माण सुविधा भी स्थापित कर चुका है.
नितिन यादव बताते हैं, “अब हम एक Material Recovery Facility (MRF) बना रहे हैं, जो 30 से ज़्यादा वंचित महिलाओं को हरित रोज़गार के अवसर प्रदान करेगी.”
DigiSwasthya Foundation: अब स्वास्थ्य सेवा और क़रीब
सन्दीप कुमार ने, बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में देखा कि लोग दूरी, ख़र्च और जानकारी की कमी के कारण, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से वंचित रह जाते हैं.
उन्होंने, इसी कमी को दूर करने के लिए, DigiSwasthya की शुरुआत की - एक ऐसा मॉडल जो टैलीमेडिसिन यानि फ़ोन या वीडियो कॉल के माध्यम से चिकित्सा परामर्श सुविधा को स्थानीय समुदायों से जोड़ता है.
उन्होंने, सोशल मीडिया के ज़रिए Youth Co:Lab के बारे में जानने के बाद, कार्यक्रम के बूट कैम्प में भाग लिया. यहाँ उन्हें अपने मॉडल को बेहतर बनाने और विस्तार के लिए तैयार करने में मदद मिली. आज DigiSwasthya छह प्रान्तों में सक्रिय है और अब तक 80 हज़ार से अधिक टैली-परामर्श दे चुका है.
सन्दीप अब, स्थानीय सरकारों और UNDP नैटवर्क के समर्थन से, इस मॉडल को पाँच नए आकांक्षी ज़िलों में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि ज़रूरतमन्दों को अपने समीप ही स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो सके.
NEMA AI: तकनीक और संवेदना का संगम
निधि और समर्थ गर्ग ने देखा कि हर विचार या चीज़ को भिन्न नज़रिए से देखने वाली स्वास्थ्य परिस्थितियों वाले यानि neurodiversity वाले लोगों की स्थिति का या तो निदान नहीं हो पाता, या फिर उनका ग़लत निदान होता है, जिससे उन्हें सही मदद नहीं मिल पाती.
उन्होंने, इस चुनौती का समाधान खोजते हुए शुरू किया NEMA AI - एक ऐसा मंच जो तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) व कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मिलाकर आसान, सटीक और समावेशी निदान उपकरण तैयार करता है.
उन्होंने अटल नवाचार मिशन और LinkedIn से Youth Co:Lab के बारे में जानकर, 2024-25 की राष्ट्रीय नवाचार चुनौती में हिस्सा लिया. यहाँ मिली मदद की बदौलत, वे सिर्फ़ सार्वजनिक स्क्रीनिंग तक सीमित न रहकर, स्वास्थ्य केन्द्रों व अस्पतालों में निदान सेवाएँ शुरू करने में सफल हुए.
दिसम्बर 2026 तक यह मंच पूर्ण रूप में शुरू होने की तैयारी में है, जिसका लक्ष्य है हर महीने 1,000 मरीज़ों की सेवा करना.
समर्थ गर्ग कहते हैं, “हम अलग-अलग दृष्टिकोणों से सीखते हैं और चाहते हैं कि हमारे समाधान पूरी तरह सुलभ, भरोसेमन्द व उपयोगी साबित हों.”
अगली चुनौती
Youth Co:Lab ने, अब तक के सात संस्करणों में उन युवा उद्यमियों के लिए रास्ते खोले हैं, जो पारम्परिक व्यवसाय जगत से दूर थे. लेकिन किसी नए कारोबार या कम्पनी की शुरुआत करना ही पर्याप्त नहीं होता.
असली चुनौती है इन पहलों को सफल और टिकाऊ बनाना - ताकि उन्हें निरन्तर धनराशि, मज़बूत नैटवर्क और बाज़ार तक स्थाई पहुँच मिल सके.
स्वास्थ्य से लेकर सततता तक, YCL के प्रतिभागी दिखा रहे हैं कि भारत के अगले बड़े उद्यमी, देश के किसी भी कोने से उभर सकते हैं.
यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.