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सूडान में युद्ध ने पलक झपकते राहतकर्मी से बनाया शरणार्थी, आपबीती

सूडान के ख़ारतूम में फेडल अस्पताल के बाहर तबाह वाहन.
© Avaaz/Giles Clarke सूडान के ख़ारतूम में फेडल अस्पताल के बाहर तबाह वाहन.

सूडान में युद्ध ने पलक झपकते राहतकर्मी से बनाया शरणार्थी, आपबीती

शान्ति और सुरक्षा

सूडान में जारी युद्ध ने लाखों ज़िन्दगियों को तहस-नहस कर दिया है. इन्हीं में से एक हैं ऐ़डम इब्राहिम, जो संयुक्त राष्ट्र की मानवीय संस्था OCHA के साथ काम कर रहे थे. वर्ष 2023 में जब प्रतिद्वंद्वी लड़ाका गुटों के बीच युद्ध भड़का, तो ऐ़डम को भी अपने परिवार के साथ शरणार्थी बनना पड़ा. 

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, सूडान आज दुनिया का सबसे जटिल मानवीय संकट है. यहाँ 3 करोड़ 4 लाख लोग, यानि आधी से ज़्यादा आबादी मानवीय सहायता पर निर्भर है.

लेकिन 2025 के लिए बनाई गई सूडान मानवीय ज़रूरत और सहायता योजना को अब तक केवल 13.3 प्रतिशत धन ही मिल पाया है.

बेघर होने की पीड़ा

ऐडम इब्राहीम ने, विश्व मानवतावादी दिवस (19 अगस्त) के मौक़े पर अपनी जीवन यात्रा के बारे में बात की... एक राहतकर्मी से शरणार्थी बनने और फिर दोबारा सूडान लौट आने तक की.

ऐ़डम याद करते हैं कि 2023 में वे अपनी बेटी को परीक्षा की तैयारी करवा रहे थे, तभी राजधानी ज़ालिंगेई में गोलियों की आवाज़ गूँजने लगी, और हालात बिगड़ते चले गए... शहर देखते ही देखते, युद्धभूमि में तब्दील हो गया.

यूगांडा में अपने दो बेटियों के साथ ऐडम.
© UNOCHA/Adam Ibrahim

उन्होंने अफ़रा-तफ़री के बीच भी, बिजली और इंटरनैट की कमी के बावजूद, रोज़ाना OCHA को नवीन जानकारी भेजी.

उनके परिवार ने 39 दिन तक किसी तरह गुज़ारा किया और फिर मजबूरन घर छोड़ना पड़ा.

उनकी 23 दिन लम्बी यात्रा, उन्हें दारफू़र से होते हुए दक्षिण सूडान और फिर युगांडा तक ले गई.

ऐ़डम कहते हैं, “जब हमें शरणार्थी कार्ड मिला, तभी पहली बार चैन की साँस ली. लेकिन यह कड़वी सच्चाई थी कि मैं, जो कभी दूसरों की मदद करता था, अब खु़द मदद का मोहताज बन गया.”

परिवार से दूर, फिर लौटे सूडान

कुछ महीने बाद ऐ़डम ने कठिन फै़सला लिया. उन्होंने परिवार को युगांडा में सुरक्षित छोड़ा और ख़ुद सूडान लौट आए.

ज़ालिंगेई लौटने पर उन्होंने अपना घर टूटा-फूटा और लूटा हुआ पाया. गोलियों से छलनी दीवारें और ग़ायब दस्तावेज़ उनके लिए गहरी चोट थे. 

हर किसी के हाथ में हथियार था, यहाँ तक कि 15 साल तक के बच्चे भी हथियार के साथ थे. लोग तनावग्रस्त और आघात में थे, हमेशा हिंसा की अगली लहर के लिए ख़ुद को तैयार करने की कोशिश कर रहे थे.

इसके बाद उन्हें एल जेनेइना (पश्चिम दारफू़र) भेजा गया, जहाँ हालात और भी भयावह थे.

सड़कें जली हुई हालत में, सैन्य गाड़ियों से पटी थीं, हथियारबन्द लोग खुलेआम गश्त कर रहे थे. लोग भोजन, दवा, पानी और आश्रय तक से वंचित थे.

उन्होंने कहा, "मानवीय ज़रूरतें बेहद विशाल थीं. लोगों के पास भोजन, आश्रय, घरेलू आवश्यकताएँ, स्वास्थ्य सेवाएँ, साफ़ पानी और सुरक्षा की कमी थी, लेकिन हमारे पास उन्हें पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन कभी नहीं थे."

उम्मीद की किरण

OCHA और सहयोगी संस्थाओं ने, धन की भारी कटौतियों के बावजूद, 2023 से 2025 के बीच 8 लाख से अधिक विस्थापित लोगों तक ज़रूरी सहायता पहुँचाई.

ऐ़डम ने चाड सीमा से मानवीय क़ाफ़िले भेजने का भी समन्वय किया, जो दारफ़ूर के फँसे लोगों के लिए जीवनरेखा साबित हुए.

आज ऐ़डम फिर सूडान में हैं, जबकि उनका परिवार युगांडा में है. 

वे साल में सिर्फ़ एक बार ही अपने बच्चों से मिल पाते हैं. फिर भी वे मानते हैं कि यह बलिदान ज़रूरी है.

ऐ़डम का कहना है, “मैंने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए दूरी चुनी. मेरी दायित्व है कि उन लोगों की मदद करूँ, जो अब भी उसी संकट में फँसे हैं, जिससे मैं गुज़रा हूँ.”