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अफ़ग़ानिस्तान: तालेबान शासन के 4 साल, महिला अधिकार बदतर

अफ़ग़ानिस्तान में, कई दशकों से लगातार जारी संकट ने, आर्थिक हालात बहुत ख़राब कर दिए हैंं.
© UNICEF/Osman Khayyam
अफ़ग़ानिस्तान में, कई दशकों से लगातार जारी संकट ने, आर्थिक हालात बहुत ख़राब कर दिए हैंं.

अफ़ग़ानिस्तान: तालेबान शासन के 4 साल, महिला अधिकार बदतर

मानवाधिकार

अफ़ग़ानिस्तान में शासन पर, अगस्त 2021 में तालेबान का क़ब्ज़ा होने के चार साल बाद, महिलाओं और लड़कियों के शिक्षा, काम, स्वतंत्र आवाजाही और सार्वजनिक जीवन में भागेदारी के अधिकार लगभग समाप्त हो चुके हैं.

यूएन वीमेन की एक नवीनतम रिपोर्ट कहती है, 2 करोड़ 10 लाख अफ़ग़ान महिलाएँ ऐसे माहौल में जीवन जी रही हैं, जहाँ उनके अधिकार लगातार छीने जा रहे हैं. सबसे गम्भीर बात है कि यह स्थिति सामान्य बात बनती जा रही है.

इस रिपोर्ट में 10 अहम तथ्य बताए गए हैं, जो इस संकट की गहराई को उजागर करते हैं.

शिक्षा पर रोक: 13 साल की उम्र के बाद लड़कियों को स्कूल जाने पर पाबन्दी है और महिलाओं को विश्वविद्यालयों में प्रवेश पर प्रतिबन्ध है. इसका परिणाम ये है कि 18 से 29 वर्ष की लगभग 80 प्रतिशत युवा महिलाएँ, न तो शिक्षा प्राप्ति, कामकाज और प्रशिक्षण के क्षेत्र से ग़ायब हो चुकी हैं.

रोज़गार में भारी असमानता: केवल चार में से एक महिला काम कर रही है या काम की तलाश में है, जबकि पुरुषों का यह आँकड़ा 90 प्रतिशत है. लोक सेवा, एनजीओ और ब्यूटी सैलून जैसे क्षेत्रों में महिलाओं के काम करने पर रोक है.

अफ़ग़ानिस्तान में बहुत सी किशोर वय लड़कियों को, तालेबान ने, प्राथमिक स्कूली शिक्षा के बाद शिक्षा हासिल करने से रोक दिया है.
© UNICEF/Amin Meerzad

स्वास्थ्य संकट: शिक्षा और रोज़गार पर रोक से, बाल विवाह में 25 प्रतिशत और किशोरावस्था में गर्भधारण में 45 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है. मातृ मृत्यु दर में 50 फ़ीसदी तक बढ़ोतरी की आशंका है. इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ भी तेज़ी से बढ़ रही हैं.

राजनैतिक भागेदारी ख़त्म: तालेबान सरकार की कैबिनेट और स्थानीय नेतृत्व में एक भी महिला नहीं है.

सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिबन्ध: महिलाओं को पार्क, जिम और खेल क्लब जाने की इजाज़त नहीं.

लैंगिक हिंसा का ख़तरा बढ़ा: हिंसा से बचाव की सेवाएँ कम हो गई हैं, महिला मामलों का मंत्रालय और हिंसा विरोधी क़ानून समाप्त कर दिए गए हैं.

सुरक्षा की कमी: युद्ध ख़त्म होने के बावजूद महिलाएँ अपने समुदायों में सुरक्षित महसूस नहीं करतीं.

"नैतिकता क़ानून" का दबाव: अगस्त 2024 में लागू क़ानून के तहत महिलाएँ सार्वजनिक जगह पर अपनी बात भी भी नहीं रख सकतीं. परिवार और समुदाय भी इन पाबन्दियों को लागू कर रहे हैं.

शरणार्थी संकट: इस साल ईरान और पाकिस्तान से, 17 लाख से अधिक अफ़ग़ान नागरिक वापिस लौटे हैं, जिनमें से लगभग आधी महिलाएँ हैं. उन्हें निर्धनता, जबरन शादी और हिंसा का ख़तरा अधिक है.

महिला संगठनों पर असर: अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता में कमी की वजह से लगभग 40 प्रतिशत महिला संगठनों की परियोजनाएँ रुक गई हैं, जिससे ज़मीनी स्तर पर मदद और अधिकारों की निगरानी मुश्किल हो गई है.

रिपोर्ट बताती है कि अफ़ग़ान महिलाएँ, इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद छोटे-छोटे व्यवसाय चला रही हैं, ज़रूरतमन्द महिलाओं को सेवाएँ दे रही हैं, और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को दर्ज कर रही हैं.

उनकी यह दृढ़ता बताती है कि उन्होंने हार नहीं मानी है और वे दुनिया से भी हार नहीं मानने की अपील कर रही हैं.