UN Women का AI स्कूल: महिलाओं के लिए डिजिटल नेतृत्व की राह
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तेज़ी से दुनिया को बदल रही है, और UN Women यह सुनिश्चित कर रहा है कि इस बदलाव में, महिलाएँ पीछे नहीं रह जाएँ. UN Women के एशिया-प्रशान्त क्षेत्रीय कार्यालय ने, इसी मक़सद से हाल ही में एआई स्कूल शुरू किया है. यह अभिनव ऑनलाइन कार्यक्रम, लैंगिक समानता के कार्यकर्ताओं को सामाजिक बदलाव, पैरोकारी एवं संगठनात्मक परिवर्तन में AI का प्रभावी उपयोग करने के गुर सिखाता है.
AI स्कूल कार्यक्रम को तैयार करने और उसका नेतृत्व करने वाले UN Women के पैरोकारी, अभियान और नवाचार समन्वयक इमाद करीम ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में इस कार्यक्रम के बारे में विस्तार से जानकारी दी है.
उन्होंने कहा, “यह पहल इस ज़रूरत से शुरू हुई कि महिलाएँ और लड़कियाँ पीछे नहीं रह जाएँ. हमारा लक्ष्य एशिया-प्रशान्त को लैंगिक समानता के लिए AI साक्षरता और नवाचार में अग्रणी बनाना है - महिलाओं को केवल उपयोगकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि डिज़ाइनर, योगदानकर्ता एवं समावेशी, सुरक्षित व ज़िम्मेदार AI ढाँचे की निर्माता के रूप में.”
इमाद करीम ने इस क्षेत्र में बड़ी कमी की ओर इशारा करते हुए कहा, “हमने 130 से ज़्यादा राष्ट्रीय AI नीतियों को देखा, लेकिन केवल 24 में ही लैंगिक मुद्दे का ज़िक्र है. इस क्षेत्र में महिलाएँ और लड़कियां लगभग नज़र ही नहीं आतीं.”
यह स्कूल इस स्थिति को बदलने के लिए प्रतिभागियों को नीति निर्माण में शामिल करने, लैंगिक-समावेशी AI डिज़ाइन करने और पूर्वाग्रह तथा तकनीक-आधारित हिंसा जैसे मुद्दों से निपटने के लिए तैयार करता है.
एआई साक्षरता पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रम में AI की मूल बातें, ज़िम्मेदार डिज़ाइन, और संचार, आपदा जोखिम न्यूनीकरण व जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष मॉड्यूल शामिल हैं.
इमाद करीम कहते हैं, “हम बताते हैं कि AI कब कारगर है, कब नहीं, और ग़ैर-लाभकारी व विकास कार्यों में इसे कैसे अनुकूल बनाया जाए. यह केवल उपकरणों व साधनों को जानने की बात नहीं है, बल्कि जोखिम, गोपनीयता, कॉपीराइट, भरोसा और यह समझने की भी मुद्दा है कि मानव द्वारा कही गई कहानी कब अधिक प्रभावी होती है.”
लेकिन AI में पूर्वाग्रह एक गम्भीर चिन्ता बनकर उभरी है. इमाद करीम बताते हैं, “133 AI प्रणालियों के विश्लेषण में 44% में लैंगिक पूर्वाग्रह मिला. इसका कारण वह डेटा है जिस पर AI को प्रशिक्षित किया जाता है - और हमारा इंटरनैट पहले से ही पूर्वाग्रही है."
"अधिकाँश AI डिज़ाइनर पुरुष हैं, जिसके कारण महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की अनदेखी होती है. हम डीप फ़ेक, रिवेंज पोर्न, स्टॉकिंग जैसी तकनीक-आधारित हिंसा में बढ़ोतरी देख रहे हैं - और इनकी अधिकाँश शिकार महिलाएँ होती हैं.”
इमाद करीम इसमें फिर भी अवसर देखते हैं. वह कहते हैं, “AI महिलाओं को पारम्परिक बाधाओं से आगे बढ़ने में मदद कर सकती है. अब वेबसाइट या ऐप बनाने के लिए कम्प्यूटर साइंस की डिग्री होनी ज़रूरी नहीं है. यदि सभी को समान पहुँच मिले, तो AI शिक्षा, उद्यमिता और पैरोकारी में बराबरी का अवसर प्रदान कर सकती है.”
व्यापक दायरा
इस कार्यक्रम का दायरा व्यापक है और इसके तहत नारीवादी नेताओं, जलवायु न्याय कार्यकर्ताओं, उद्यमियों, शिक्षाविदों और वंचित समुदायों के पेशेवरों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
इमाद करीम कहते हैं, “हम चाहते हैं कि महिलाएँ और लड़कियाँ, नीति निर्माण की मेज़ पर, डिज़ाइन कमरों में और उन सभी चर्चाओं में शामिल हों, जो AI की अर्थव्यवस्था को दिशा देती हैं.
प्रभाव स्पष्ट नज़र आ रहा है. प्रतिभागियों की कहानियाँ डर से सशक्तिकरण की ओर बदलाव को दर्शाती हैं. जो पहले AI को ख़तरे के रूप में देखते थे, अब वही लैंगिक-समावेशी नवाचार विकसित कर रहे हैं.
इमाद करीम एक उदाहरण पेश करते हैं, “एक प्रतिभागी AI से बेहद डरी हुई थीं और मानती थीं कि यह दुनिया को बर्बाद कर देगी. लेकिन प्रशिक्षण के बाद, उन्होंने इसे अपनी परियोजनाओं में अपनाया और काम पूरा करने का समय सप्ताहों से घटाकर घंटों में कर लिया."
"साथ ही, अब वे नीति-निर्माण की चर्चाओं में सक्रिय भाग लेने लगी हैं. उनके शब्दों में, यह उनके लिए आँखें खोल देने वाला अनुभव था.”
यह स्कूल जैसे-जैसे भारत सहित अन्य देशों में विस्तार कर रहा है, इमाद करीम लचीलापन बनाए रखने पर जोर देते हैं. “हम हर देश के लिए सामग्री को उसकी AI तैयारी, लैंगिक खाई और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार अनुकूलित करते हैं."
"हमारा लक्ष्य हमेशा एक ही रहता है - जहाँ AI का भविष्य तय हो रहा है, वहाँ अधिक से अधिक महिलाएँ व लड़कियाँ शामिल हों.”
AI युग में महिलाओं के लिए इमाद करीम की सलाह यही है - “AI-साक्षर बनें, क्योंकि यह नई साक्षरता है. मॉडल, उनकी ख़ूबियाँ और जोखिम समझें. AI पर न आँख मूंदकर भरोसा करें, न पूरी तरह ठुकराएँ. इसका भविष्य हमारे हाथ में है..."
"हम चाहें तो इसे समानता, न्याय और गरिमा का साधन बना सकते हैं, या फिर इसे उन खाइयों को और गहरा करने दे सकते हैं जिन्हें हम भरने की कोशिश कर रहे हैं.”