SDG-1: दुनिया अमीर-ग़रीब में क्यों है विभाजित, कैसे दूर होगी निर्धनता?
कभी आपने कभी सोचा है कि दुनिया विकसित देशों, विकासशील देशों और अल्प विकसित देशों में क्यों बँटी हुई है? और देशों के भीतर भी कोई व्यक्ति तो देश या क्षेत्र के सबसे धनी हैं मगर एक बड़ी आबादी को, अच्छा स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा और जीवन का आनन्द लेने के लिए अन्य साधन उपलब्ध होने की बात तो दूर है, जीने के लिए भरपेट भोजन भी मयस्सर नहीं है. यानि ये समस्या है निर्धनता की जिसे दूर करने के लिए सतत विकास लक्ष्य-1 हमें कुछ राहत महसूस कराता है.
संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने 10 साल पहले मिलकर 2030 तक, एक ऐसी दुनिया की कल्पना की, जहाँ कोई भी इनसान चरम निर्धनता में नहीं हो.
मगर अफ़्रीका के किसी सूखाग्रस्त गाँव में पानी के लिए घंटों पैदल चलने वाली एक किशोरी, या एशिया के किसी झुग्गी इलाके़ में दिन में एक बार खाने का इन्तेज़ार करते परिवार, उनके लिए ऐसी दुनिया का सपना, आज भी दूर की कौड़ी है.
सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के लिए 10 साल यानि दो तिहाई अवधि पहले ही बीत चुकी है और केवल पाँच साल बाक़ी हैं.
लेकिन हाल में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक प्रगति चिन्ताजनक रूप से असंतोषजनक है, जिसमें केवल 17 प्रतिशत लक्ष्य ही, प्राप्ति के रास्ते पर सही दिशा में हैं.
चरम निर्धनता क्या है?
संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में सतत विकास लक्ष्य (SDGs) तय किए थे, जिनका पहला लक्ष्य था, “2030 तक हर जगह, हर व्यक्ति के लिए चरम निर्धनता की समाप्ति.”
चरम निर्धनता का मतलब है, ऐसी स्थिति जिसमें एक व्यक्ति रोज़ाना तीन अमेरिकी डॉलर से कम रक़म ख़र्च पर गुज़ारा करे.
बीते दशकों में इसमें कुछ सुधार तो हुआ था, मगर अब हालात फिर से चिन्ताजनक हो रहे हैं.
80.8 करोड़ लोग… और गिनती जारी
नई रिपोर्ट के मुताबिक़, 2025 में दुनिया के 80 करोड़ 80 लाख लोग, यानि हर दस में से एक व्यक्ति, चरम निर्धनता में जीवन बिताने को मजबूर हैं.
अगर यही रुझान जारी रहा, तो 2030 में भी दुनिया की 8.9 प्रतिशत आबादी निर्धनता के अँधेरे से बाहर नहीं निकल पाएगी.
निर्धनता के साथ-साथ भूख का संकट भी गहरा रहा है. भूख का स्तर अब 2005 के स्तर पर लौट आया है.
वहीं, 2015 से 2019 के बीच जितने देशों में खाद्य महंगाई थी, आज उससे भी ज़्यादा देशों में खाने-पीने की चीज़ों की क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं.
यह दोहरी मार ग़रीब लोगों के जीवन को और भी मुश्किल बना रही है.
केवल धन की कमी नहीं है निर्धनता
अक्सर लोग निर्धनता को केवल कम धन या आय की कमी से जोड़ते हैं, लेकिन इसके पीछे बेरोज़गारी, सामाजिक बहिष्कार, आपदाओं और बीमारियों जैसी कई वजहें होती हैं, जो लाखों लोगों को स्थिर और उत्पादक काम करने से रोकती हैं.
शायद आप सोचें, “दूसरों की आर्थिक हालत से मेरा क्या लेना-देना?”
लेकिन सच यह है कि एक इनसान की भलाई दूसरे से जुड़ी हुई है. बढ़ती असमानता, अर्थव्यवस्था को धीमा करती है, समाज को बाँटती है और राजनैतिक तनाव बढ़ाती है. कई बार यही तनाव युद्ध और अशान्ति में बदल जाता है.
कोविड-19 ने यह स्पष्ट कर दिया कि मज़बूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र, लोगों को निर्धनता की खाई में गिरने से बचा सकता है.
महामारी के दौरान कई देशों ने ऐसे उपाय बढ़ाए, लेकिन 2023 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी यानि क़रीब 3 अरब 80 करोड़ लोग, पूरी तरह असुरक्षित थे. इनमें 1 अरब 40 करोड़ बच्चे भी हैं.
वर्ष 2022-23 में 105 देशों ने, लगभग 350 सामाजिक सुरक्षा क़दम उठाए, लेकिन इनमें से 80 प्रतिशत सिर्फ़ अस्थाई थे.
समाधान क्या है?
निर्धनता ख़त्म करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र, विज्ञान-तकनीक और नागरिक, चारों की भूमिका बेहद अहम है.
सरकारों को निर्धन और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए रोज़गार और आर्थिक अवसर पैदा करने चाहिए, जबकि निजी क्षेत्र समावेशी विकास को बढ़ावा देकर इस बदलाव में तेज़ी ला सकता है.
विज्ञान और तकनीक स्वच्छ पानी, बेहतर स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से, पहले भी ग़रीबी उन्मूलन में योगदान कर चुके हैं और भविष्य में भी ऐसा कर सकते हैं.
जबकि, आम लोग, नीतियों में सक्रिय भागेदारी करके, यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनकी आवाज़ सुनी जाए और उनके अधिकार सुरक्षित रहें.
साथ ही, संवाद और कूटनीति के माध्यम से युद्धों का समाधान करना और खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल सम्पर्क जैसे क्षेत्रों में विशाल निवेश और साझेदारी बढ़ाना भी बेहद ज़रूरी है.
इसके अलावा, यूएन रिपोर्ट में विकास के लिए वित्तीय संसाधनों की तत्काल ज़रूरत पर भी बल दिया गया है, जिसमें विकासशील देशों में हर साल 4 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की कमी है.
संयुक्त राष्ट्र का नारा है, “किसी को पीछे नहीं छोड़ना.” लेकिन इसके लिए तेज़ और लक्षित निवेश, शिक्षा का विस्तार, और सभी लोगों को सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित किया जाना ज़रूरी है.
वरना 2030 तक निर्धनता दूर करने का सपना केवल, आँकड़ों और भाषणों में ही सिमटकर रह जाएगा.