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LLDC3: 'भूमिबद्ध देशों के भूगोल को अवसर में बदलने की ज़रूरत पर ज़ोर

अज़रबैजान भी एक भुमिबद्ध देश है.
© ADB/Daro Sulakauri
अज़रबैजान भी एक भुमिबद्ध देश है.

LLDC3: 'भूमिबद्ध देशों के भूगोल को अवसर में बदलने की ज़रूरत पर ज़ोर

आर्थिक विकास

दुनिया के भूमिबद्ध विकासशील देशों (LLDC) के लिए, उनकी भौगोलिक स्थिति न केवल एक चुनौती है, बल्कि व्यापार के लिए एक महंगी बाधा भी है. तुर्कमेनिस्तान के अवाज़ा में चल रहे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (LLDC3) में, इस परिदृश्य को बदलने की सम्भावनाओं पर पुरज़ोर चर्चा हो रही है.

इन देशों को, समुद्र तक सीधी पहुँच नहीं होने के कारण, भारी परिवहन लागत, धीमी गति से आपूर्ति  और सीमा प्रक्रियाओं की उलझनों का सामना करना पड़ता है. ये स्थितियाँ इन देशों की आर्थिक प्रगति को धीमा कर देती हैं.

उससे भी आगे, जलवायु परिवर्तन इन देशों की समस्या को और भी जटिल बना रहा है - सड़कों को नुक़सान पहुँचा रहा है, आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर रहा है, और बाढ़, सूखे व चरम मौसम के कारण पहले से ही कमज़ोर बुनियादी ढाँचे को ख़तरे में डाल रहा है.

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इन वैश्विक चर्चाओँ के बीच, तुर्कमेनिस्तान में चल रहा एक संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (LLDC3) इस परिदृश्य को बदलने के लक्ष्य पर नज़रें टिकाए हुए है. 

इस सम्मेलन में, बेहतर और अधिक जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचे, सुव्यवस्थित रसद और मज़बूत क्षेत्रीय सम्बन्धों के माध्यम से, भूमिबद्ध विकासशील देशों को, ‘भूमि के ज़रिए दुनिया के साथ जुड़े देशों में तब्दील करने में मदद करने पर चर्चा हो रही है.

बुधवार को, भूमिबद्ध विकासशील देशों (LLDC3) पर तीसरे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दूसरे दिन की शुरुआत होते ही, आवाज़ा कांग्रेस केन्द्र का माहौल बदल गया.

मंगलवार के उद्घाटन समारोह के बाद, देशों के राष्ट्रपतियों और शासनाध्यक्षों के चले जाने के बाद, सुरक्षा उपाय कुछ नरम कर दिए गए, जिससे प्रतिनिधियों के लिए कार्यक्रम स्थल पर टहलना – सैर करना आसान हो गया.

लेकिन सम्मेलन की गति धीमी नहीं हुई. बैठक कक्ष खचाखच भरे रहे, प्रदर्शनी स्थल गतिविधियों से गुलज़ार रहे, और प्रतिभागी लगातार कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए सफ़ेद क़ालीन वाले लम्बे गलियारों में घूमते रहे.

बहुभाषी युवा स्वयंसेवकों की एक बड़ी टीम ने, विशाल परिसर में उपस्थित लोगों को रास्ते दिखाए, जिससे उत्साह बना रहा और व्यवस्था सुचारू बनी रही.

'भूगोल के अन्तर' का असर

दिन की चर्चाएँ भूगोल के कारण होने वाले नुक़सानों को दूर करने पर केन्द्रित रहीं. मुख्य गोलमेज़ सम्मेलन व्यापार पर केन्द्रित था, जो दुनिया के 32 भूमिबद्ध विकासशील देशों के लिए एक गम्भीर मुद्दा है. बन्दरगाहों तक इन देशों की सीधी पहुँच नहीं है. इसके परिणामस्वरूप, उन्हें अन्तरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचने के लिए लम्बे और अधिक जटिल मार्गों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ जाती है और वो प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट जाते हैं.

और भौगोलिक स्थिति ही एकमात्र बाधा नहीं है. इनमें से अनेक देशों में, बुनियादी ढाँचा पुराना और डिजिटल उपकरणों का भी सीमित प्रयोग होता है. इन हालात को आधुनिक बनाने से, इन देशों के परिवहन में लगने वाला समय बेहतर हो सकता है.

ये बाधाएँ न केवल व्यापार में देरी करती हैं – बल्कि ये आर्थिक विकास को भी बाधित करती हैं और एलएलडीसी तथा अन्य विकासशील देशों के बीच की खाई को और चौड़ा बनाती हैं.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश मंगलवार को अवाज़ा में संवाददाताओं से बातचीत में कह चुके हैं कि "भूमि से घिरे विकासशील देशों को स्मार्ट बुनियादी ढाँचे, सुव्यवस्थित प्रणालियों और पारगमन देशों के साथ मज़बूत साझेदारी की आवश्यकता है."

उन्होंने देरी और लागत कम करने के लिए लालफीताशाही को कम करने, सीमा संचालन को डिजिटल बनाने और परिवहन नैवर्क का आधुनिकीकरण किए जाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया.

आँकड़ों से बयान होती वास्तविकता

भूगोल का प्रभाव आँकड़ों में स्पष्ट दिखाई देता है.

ज़मीन से घिरे विकासशील देशों में, दुनिया की आबादी का सात प्रतिशत हिस्सा बसता है, फिर भी 2024 में वैश्विक व्यापारिक व्यापार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ़ 1.2 प्रतिशत रही. यह आँकड़ा, इस बात की एक स्पष्ट याद दिलाता है कि भौतिक बाधाएँ, किस तरह आर्थिक बाधाओं में बदल सकती हैं.

पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाई गई 2024-2034 के लिए अवाज़ा कार्य योजना का उद्देश्य, इस वास्तविकता को बदलना है. लेकिन महत्वाकांक्षा को परिणामों में बदलने के लिए सीमाओं और क्षेत्रों में साहसिक, समन्वित प्रयासों की आवश्यकता होगी.

अवाज़ा कांग्रेस केन्द्र के गलियारों में एक मुहावरा गूंज रहा है, जिसमें ‘भूमि से घिरे हुए देशों को भूमि के ज़रिए जुड़े हुए देशों’ में तब्दील करने के लिए, भौगोलिक असुविधा को अवसर में बदलने की पुकार लगाई जा रही है.

मुश्किल नहीं है मंज़िल

अन्तरराष्ट्रीय सड़क परिवहन संघ (IRU) के महासचिवअम्बर्टो डी प्रैट्टो यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में कहते हैं, "इस बात के प्रमाण हैं कि अगर आप सही नीतियाँ लागू करें... तो आप भूमि से जुड़ सकते हैं... मुझे लगता है कि भूमि से घिरे देशों के लिए, सबसे बड़ी बाधा नज़रिए की है."

1947 में स्थापित आईआरयू, दुनिया भर में टिकाऊ सचलता और आपूर्ति ढाँचे को समर्थन मुहैया कराता है और 100 से ज़्यादा देशों में, 35 लाख से अधिक परिवहन संचालक, इसके साथ जुड़े हुए हैं.

अम्बर्टो डी प्रैट्टो बताते हैं कि दुनिया के 32 भूमिबद्ध विकासशील देशों में से केवल 11 देश ही, संयुक्त राष्ट्र समर्थित टीआईआर प्रणाली में शामिल हुए हैं. यह व्यवस्था, सामान को सीलबन्द डिब्बों में, आपस में मान्यता प्राप्त सीमा शुल्क प्रक्रिया के तहत मूल स्थान से गंतव्य स्थान तक ले जाने को आसान बनाता है.

उन्होंने बताया कि इस प्रणाली संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन – TIR और इसका सबसे बड़ा उपयोगकर्ता उज़बेकिस्तान है, जो ऐसे केवल दो स्थलबद्ध देशों में से एक है जो दो तरफ़ से देशों से घिरे हुए हैं. (दूसरा देश है – लीश्टेंटीन जो योरोप में एक तरफ़ से स्विटज़रलैंड और दूसरी तरफ़ से ऑस्ट्रिया से घिरा हुआ है.)

“इसलिए, इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि यदि आप सही नीतियाँ लागू करें, तो आपका देश भूमिबद्ध नहीं, बल्कि भूमि के ज़रिए जुड़ा हुआ होगा."

LLDC के लिए एक दिन

बुधवार को स्थलबद्ध विकासशील देशों की विशेष आवश्यकताओं पर सूचना के प्रसार के लिए अन्तरराष्ट्रीय दिवस भी मनाया गया, जोकि प्रथम अवसर था.

प्रत्येक भूमिबद्ध विकासशील देश को विकास से सम्बन्धित विशिष्ट चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, साथ ही उनकी प्राथमिकताएँ भी एक जैसी हैं. और इन देशों में लगभग 60 करोड़ लोग रहते हैं, इसलिए साझा समाधान खोजना आवश्यक है.

अवाज़ा सम्मेलन का सन्देश स्पष्ट है: अलग-थलग की स्थिति नियति नहीं है. भूमिबद्ध देश, सही सोच, प्रभावी नीतियों और सार्थक साझेदारियों के साथ, ‘भूमि के ज़रिए जुड़े हुए देश’ बन सकते हैं - और समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं.