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एना रील महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाली एक प्रमुख कार्यकर्ता हैं और UN Women के नागरिक समाज परामर्श समूह की सदस्य भी हैं.

कज़ाख़स्तान में घरेलू हिंसा की रोकथाम में, पीड़ा से उम्मीद तक का सफ़र

© UN Women/Roman Gussak
एना रील महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाली एक प्रमुख कार्यकर्ता हैं और UN Women के नागरिक समाज परामर्श समूह की सदस्य भी हैं.

कज़ाख़स्तान में घरेलू हिंसा की रोकथाम में, पीड़ा से उम्मीद तक का सफ़र

महिलाएँ

कज़ाख़स्तान में वर्षों की पैरोकारी और UN Women के सहयोग से, घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ नए क़ानून लागू किए गए हैं - जिससे पीड़ितों को बेहतर समर्थन और पुलिस को अधिक प्रभावी कार्रवाई के अधिकार मिले हैं.

दमिरा* (28) की ज़िन्दगी उस दिन बदल गई, जब उनके साथी ने हिंसा की हद पार कर दी. उन्होंने बताया, “यह समझना बहुत ज़रूरी था कि मैं अकेली नहीं हूँ.” इसलिए उन्होंने हिम्मत करके पुलिस को फ़ोन कर दिया. 

तुरन्त पुलिस कार्रवाई हुई, हमलावर गिरफ़्तार हुआ, और दमिरा को संकट केन्द्र भेजा गया, जहाँ उन्हें वकील व मनोवैज्ञानिक की मदद मिली. उन्होंने कहा, “मुझे वो मदद मिली, जो कुछ साल पहले शायद मुमकिन नहीं थी.”

आज दमिरा जैसी महिलाओं को मिल रही मदद, कज़ाख़स्तान में, 2024 के घरेलू हिंसा क़ानूनों में बदलाव की बदौलत सम्भव हो पाई है. 

ये बदलाव UN Women, सरकार, संयुक्त राष्ट्र के साझीदारों और नागरिक समाज की वर्षों की मेहनत और जनता की न्याय की पुकार का नतीजा है.

पुरानी व्यवस्था

कुछ संकट केन्द्रों में महिलाओं के लिए नए कौशल सीखने की जगह होती है, और बच्चों के लिए खेलने व कलात्मक गतिविधियों में भाग लेने की सुविधा भी दी जाती है.
© UN Women/Roman Gussak

2017 में, कज़ाख़स्तान में घरेलू हिंसा को अपराध की श्रेणी से हटाकर प्रशासनिक उल्लंघन में डाल दिया गया था. इसका असर ये हुआ कि पीड़ितों की सुरक्षा लगभग ख़त्म हो गई. मारपीट और हल्की शारीरिक चोटों को अपराध नहीं माना गया. 

कई मामलों में तो पुलिस, पीड़ित महिलाओं को वापस सुलह करने की सलाह देती थी और केस दर्ज करने के लिए स्वयं पीड़ित महिलाओं को ही गवाह और सबूत जुटाने पड़ते थे.

रैइख़ान* (45) को इस व्यवस्था ने बुरी तरह निराश किया. “मेरे पति कई वर्षों तक मुझे पीटते रहे. जब मैं पुलिस के पास गई, तो उन्होंने कहा, ‘यह आपका निजी मामला है. सुलह कर लीजिए.’ मैंने शिकायत दर्ज नहीं कराई, इसलिए मुझे कोई मदद नहीं मिली.”

यह क़ानूनी कमज़ोरी धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले चुकी थी:

• 16.5% महिलाएँ (18–75 वर्ष) अपने जीवन में कभी न कभी अपने साथी द्वारा की गई शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार हुईं.
• (साल 2023 में) घरेलू हिंसा की रोज़ाना 300 शिकायतें पुलिस तक पहुँचती थीं.
• हर साल औसतन 80 महिलाएँ अपने ही जीवनसाथी के हाथों मारी जाती थीं.

'उसके पास कोई सुरक्षित जगह नहीं थी'

UN Women की नागरिक समाज परामर्श समूह की सदस्य ऐना रील पिछले 16 वर्षों से घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए शरण स्थल चला रही हैं. 

वह बताती हैं, “हमने पहला आश्रय तब शुरू किया जब मैंने देखा कि एक महिला के पास, अपनी सुरक्षा की ख़ातिर कहीं और जाने के लिए कोई जगह नहीं थी. मैंने शहर के बाहर तीन कमरों का एक घर लिया और उसे शरण स्थल में बदल दिया. ना कोई धन, न कोई टीम - बस मदद करने का जज़्बा था.”

ऐना रील हिंसा के बीच पिस रहे बच्चों की पीड़ा को भी उतना ही गम्भीर मानती हैं. वह कहती हैं, “वे सूटकेस लेकर भाग नहीं सकते. उन्हें अपने पिता की हिंसा और माँ का दर्द झेलना पड़ता है. ये दर्द अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है”

जन आक्रोश से परिवर्तन की शुरुआत

2023 में सल्तनत नुक़ेनोवा की, उनके पति द्वारा हत्या ने पूरे कज़ाख़स्तान को झकझोर दिया. इसके बाद देश-विदेश में हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे.

UN Women की अन्तरिम प्रमुख दीना अमरीशेवा कहती हैं, “घरेलू हिंसा को जैसे ही, अपराध की श्रेणी से हटाया गया, हमें तुरन्त क़ानूनी सुरक्षा की ज़रूरत महसूस हुई.”

जन दबाव और पैरोकारी के फलस्वरूप, घरेलू हिंसा को मानवाधिकार हनन मानते हुए, अप्रैल 2024 में नया क़ानून पास किया गया - जिसमें घरेलू हिंसा को फिर से आपराधिक अपराध घोषित किया गया.

पुलिस की भूमिका में बदलाव

नए क़ानून के बाद, पुलिस की भूमिका भी बदली है. अब घरेलू हिंसा की कॉल पर विशेष टीम भेजी जाती है – जिसमें पुलिस अधिकारी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं.

अब पुलिस को केस शुरू करने के लिए पीड़िता की औपचारिक शिकायत की ज़रूरत नहीं होती. वीडियो रिकॉर्डिंग, पड़ोसियों की रिपोर्ट जैसे सबूतों के आधार पर भी कार्रवाई हो सकती है. 

हमलावरों की गिरफ़्तारी की अवधि बढ़ाई गई है, और दोबारा अपराध करने वालों को सज़ा दी जाती है.

अस्ताना पुलिस की घरेलू हिंसा इकाई की प्रमुख लैफ़्टिनैंट कर्नल गुलमीरा श्राख़मेतोवा कहती हैं: “अब हमारी भूमिका केवल सज़ा देने तक सीमित नहीं है. हम पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा को भी उतनी ही अहमियत देते हैं.”

लैफ़्टिनेंट कर्नल श्राख़मेतोवा की ज़िम्मेदारियों में घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं और गवाहों से सीधे मुलाक़ात करना, उनकी शिकायत दर्ज करना और उन्हें ज़रूरी सहायता सेवाओं से जोड़ना शामिल है.
© UN Women/Roman Gussak

उम्मीद व जवाबदेही का नया युग

जुलाई 2025 में राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव ने एक नया क़ानून पास किया, जिसमें किसी महिला का पीछा करना और जबरन शादी को अपराध माना गया.

लैफ़्टिनैंट कर्नल श्राख़मेतोवा बताती हैं कि 2025 की शुरुआत में अस्ताना में घरेलू हिंसा के दोहराए गए मामलों में 27% की कमी आई. “क़ानून ज़रूरी है, लेकिन असली बदलाव उसे सही तरह से लागू करने से आता है.”

घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ अभी लम्बा सफ़र तय किया जाना है - लेकिन दमिरा जैसी महिलाओं के लिए अब एक रास्ता है: सुरक्षा, न्याय और एक नई ज़िन्दगी.

(*पहचान गुप्त रखने के लिए नाम बदल दिया गया.)

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.