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दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण पर क़ाबू चाहती है, जिनीवा में वार्ता

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के नागराकाटा स्थित एसडब्ल्यूएम इकाई में श्रमिक जैव-अपघटनीय कचरे से प्लास्टिक को अलग कर रहे हैं।
© UNICEF/Subrata Biswas एकत्रित कचरे से प्लास्टिक अलग करते सफ़ाईकर्मी.

दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण पर क़ाबू चाहती है, जिनीवा में वार्ता

जलवायु और पर्यावरण

दुनिया को दरअसल प्लास्टिक पर क़ाबू पाने के लिए एक कारगर सन्धि की ज़रूरत है क्योंकि यह संकट अब हाथ से निकलता जा रहा है, और लोगों में बहुत क्षोभ नज़र आ रहा है. यह कहना है यूएन पर्यावरण संगठन – UNEP की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐंडरसन का,जो इस मुद्दे पर जिनीवा में चल रही बातचीत का नेतृत्व कर रही हैं.

प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी सन्धि पर सहमति बनाने के लिए, मंगलवार को जिनीवा में उच्च स्तरीय वार्ता शुरू हुई, जिसमें लगभग 180 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया.

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इन्गेर ऐंडरसन ने कहा, "हम जानते हैं कि हमें प्लास्टिक की आदत पड़ चुकी है, यह हमारे महासागरों में है, और हाँ, हमारे शरीर में भी... यह निश्चित है कि कोई भी, प्लास्टिक प्रदूषण के साथ नहीं रहना चाहते."

बेक़ाबू होता दैत्य

यूनेप के अनुसार, जब तक कोई अन्तरराष्ट्रीय समझौता नहीं हो जाता, प्लास्टिक उत्पादन और अपशिष्ट, वर्ष 2060 तक तीन गुना बढ़ने का अनुमान है, जिससे बहुत बड़ा नुक़सान होगा, जिसमें हमारे स्वास्थ्य को हानि भी शामिल है.

स्विट्ज़रलैंड की शीर्ष पर्यावरण अधिकारी कैटरीन श्नीबर्गर ने भी, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी सन्धि की मांग दोहराई और ज़ोर देकर कहा कि प्लास्टिक कचरा, "हमारी झीलों का गला घोंट रहा है, वन्यजीवों को नुक़सान पहुँचा रहा है और मानव स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बन रहा है.”

“यह केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि एक वैश्विक चुनौती है जिसके लिए तुरन्त और सामूहिक कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है."

स्विस पर्यावरण कार्यालय की निदेशक कैटरीन श्नीबर्गर ने, सन्धि वार्ता के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए ज़ोर देकर कहा कि प्लास्टिक के उत्पादक देशों ने "उत्पादन सीमा तय करने का कोई आहवान नहीं किया".

समझौते की भावना?

उन्होंने कहा, "[प्लास्टिक] के उत्पादन और प्रयोग, दोनों पक्षों पर उपायों की आवश्यकता पर एक साझा समझ बनने से, वार्ता को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है."

समझौते के समर्थकों ने इसके महत्व के सन्दर्भ में इसकी तुलना पेरिस जलवायु समझौते से की है. उन्होंने पैट्रोलियम देशों द्वारा इस समझौते के ख़िलाफ़ कथित तौर पर डाले जा रहे दबाव की ओर भी इशारा किया है, जिनके कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस, प्लास्टिक के निर्माण में सहायक होते हैं.

यूनेप की मुखिया इन्गेर ऐंडरसन का कहना है, "हम प्लास्टिक प्रदूषण संकट से बाहर निकलने के लिए रीसायकलिंग नहीं करेंगे: हमें एक चक्रीय अर्थव्यवस्था में बदलाव करने के लिए एक व्यवस्थित परिवर्तन की आवश्यकता है."

उत्पादन से लेकर निपटान तक

प्लास्टिक पर क़ाबू पाने के लिए किसी सम्भावित सन्धि पर यह बातचीत, जिनीवा में 10 दिनों तक चलने वाली है. समझौते के समर्थकों  को उम्मीद है कि यह समझौता, प्लास्टिक के पूरे जीवन चक्र, डिज़ाइन से लेकर उत्पादन और निपटान तक, सभी स्तरों को शामिल करेगा.

मसौदा आलेख के अनुसार किसी भी समझौते को, "प्लास्टिक की रीसायकलिंग को बढ़ावा देना चाहिए और पर्यावरण में प्लास्टिक के प्रवेश को रोकना" चाहिए.

इन्गेर ऐंडरसन ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें वर्ष 2022 में पाकिस्तान में आई घातक बाढ़ के बाद, देश का अपना दौरा याद आया जिस दौरान उन्होंने देखा था कि मलबा और प्लास्टिक "समस्या का एक बड़ा हिस्सा हैं; और इसलिए हम इस मंच पर एकत्र हैं, ताकि किसी को पीछे नहीं छोड़ते हुए और आर्थिक पहिए की गति सुनिश्चित करते हुए, इसका समाधान खोजा जा सके."