वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां
शिखा श्रीकांत अरुणाचल प्रदेश में धान की रोपाई प्रक्रिया के दौरान.

संरक्षण पर संवाद: 'एक स्वस्थ धरती ही समृद्ध समाज की बुनियाद है'

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शिखा श्रीकांत अरुणाचल प्रदेश में धान की रोपाई प्रक्रिया के दौरान.

संरक्षण पर संवाद: 'एक स्वस्थ धरती ही समृद्ध समाज की बुनियाद है'

जलवायु और पर्यावरण

दुर्लभ प्रजातियों को बचाना हो या सतत जीवनशैली को बढ़ावा देना - एक स्वस्थ धरती ही समृद्ध समाज की नींव है. पेड़ लगानासफ़ाई करना या जागरूकता बढ़ाना - हर छोटा क़दम मायने रखता हैऔर जब ये क़दम युवाओं के होंतो असर और भी गहरा होता है. विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस (28 जुलाई) और अन्तरराष्ट्रीय युवा दिवस (12 अगस्त) के अवसर पर, आइए मिलते हैं एक ऐसी युवा कार्यकर्ता शिखा श्रीकान्त सेजो अपने जुनून व अनुभव से धरती की रक्षा में विशेष बदलाव ला रही हैं.

“हम पृथ्वी के मालिक नहीं हैं - हम इसका हिस्सा हैं. हमें इसे वन्यजीवों के साथ साझा करना चाहिए.”

यह मशहूर मिसाल, संरक्षणवादी स्टीव इरविन की है - और शिखा श्रीकान्त के लिए, यही उनकी राह की प्रेरणा है.

असम की रहने वाली शिखा एक वन्यजीव विज्ञानी और संरक्षण कार्यकर्ता हैं. 2012 से वह संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उन्होंने भारत के संरक्षित क्षेत्रों से लेकर सामुदायिक वनों तक, वन विभागों के साथ मिलकर ज़मीन पर काम किया है. 

इस अनुभव ने उन्हें प्रकृति और स्थानीय समुदायों के बीच का गहरा रिश्ता समझने का अवसर दिया.

GEF समर्थित परियोजना के डिज़ाइन चरण के दौरान शिखा ओडिशा में महिलाओं के साथ.
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GEF समर्थित परियोजना के डिज़ाइन चरण के दौरान शिखा ओडिशा में महिलाओं के साथ.

शिखा श्रीकान्त ने मई 2024 में, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) - भारत में, जैवविविधता के लिए यूएन स्वयंसेवक कार्यक्रम अधिकारी के रूप में काम शुरू किया. 

अब वह वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) द्वारा समर्थित परियोजनाओं पर काम कर रही हैं, जो भारत के 30x30 जैवविविधता लक्ष्य और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैवविविधता रूपरेखा को आगे बढ़ाते हैं.

शिखा का काम विज्ञान, नीति और समुदायों को जोड़ता है - ताकि उन पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा हो सके, जिन पर लोगों की आजीविका निर्भर है. शिखा यह भी सुनिश्चित करती हैं कि नीतियों में ज़मीनी अनुभव और आदिवासी ज्ञान को जगह मिले.

शिखा के पास भारत के संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों से लेकर सामुदायिक वनों तक का दस साल का ज़मीनी अनुभव है.
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शिखा, UNDP के साथ जुड़ने से पहले, डस्टी फ़ुट फ़ाउंडेशन के साथ पूर्वोत्तर भारत जैव-सांस्कृतिक संरक्षण पहल की परियोजना समन्वयक थीं. इस पहल में उन्होंने देखा कि स्थानीय समुदाय किस तरह, परम्परा और विज्ञान को साथ लेकर जैवविविधता की रक्षा करते हैं. 

उन्होंने इस अनुभव का प्रयोग किया, एक ऐसे क्षेत्र में जहाँ जीवन और संस्कृति, दोनों प्रकृति से गहराई से जुड़े हैं.

शिखा, यूएन स्वयंसेवक के रूप में, लैंगिक समानता से जुड़े मुद्दों पर सम्पर्क व्यक्ति की भूमिका भी निभा रही हैं - यह सुनिश्चित करते हुए कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े फ़ैसलों में महिलाओं की बराबर भागेदारी हो.

वो कहती हैं, “संचार और समावेशन - यही मेरी सबसे बड़ी सीख रही है. संरक्षण एक ऐसा मिशन है जो जुनून और आत्म-प्रेरणा से चलता है. यह असल में प्रकृति की सेवा है.”

शिखा, राजस्थान में महिलाओं के साथ सम्वाद के दौरान.
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शिखा, राजस्थान में महिलाओं के साथ सम्वाद के दौरान.

UNDP इंडिया में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की प्रमुख डॉक्टर रुचि पन्त कहती हैं, “हम मानते हैं कि युवजन, बदलाव के सशक्त वाहक हैं. 

शिखा जैसे स्वयंसेवक ज़मीनी स्तर पर संरक्षण और सतत विकास को आगे बढ़ा रहे हैं. वह भारत के जैव-सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उत्तर-पूर्वी क्षेत्र से आती हैं - जो वैश्विक जैवविविधता हॉटस्पॉट में शामिल है.”

शिखा का योगदान जलवायु कार्रवाई (SDG 13), समुद्री जीवन (SDG 14), भूमि पर जीवन (SDG 15) और लक्ष्यों के लिए साझेदारी (SDG 17) जैसे सतत विकास लक्ष्यों को साकार करने में अहम भूमिका निभा रहा है.

उनका मानना है, “स्वयंसेवा समाज की भलाई और सन्तुलन के लिए निष्ठा से सेवा देने का एक सुन्दर उदाहरण है.”

मणिपुर में स्कूली छात्रों के साथ जैवविविधता संरक्षण जागरूकता सत्र के दौरान शिखा.
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मणिपुर में स्कूली छात्रों के साथ जैवविविधता संरक्षण जागरूकता सत्र के दौरान शिखा.

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