LLDC3: भूमिबद्ध देशों में 60 करोड़ लोगों के विकास के लिए सांसदों से पुकार
तुर्कमेनिस्तान के अवाज़ा शहर में एक अहम यूएन मंच (LLDC3) में, दुनिया भर के सांसदों से, भूमिबद्ध विकासशील देशों (LLDCs) में रहने वाले 60 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए, ठोस और निर्णायक क़दम उठाने की अपील की गई है.
संयुक्त राष्ट्र के उच्चाधिकारियों ने सोमवार को, इस संसदीय मंच पर कहा कि अगले दस वर्षों के लिए विकास की नई योजना को ज़मीनी हकीक़त में बदलने के लिए, राजनैतिक इच्छाशक्ति और ठोस विधाई कार्रवाई बेहद ज़रूरी है.
दुनिया में ऐसे 32 देश हैं, जो समुद्र से नहीं जुड़े हुए हैं जिनमें लगभग 50 करोड़ आबादी बसती है, और इनमें से कई देश, दुनिया के सबसे कम विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं.
ये देश ऊँची परिवहन लागत, वैश्विक बाज़ारों तक सीमित पहुँच और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते ख़तरों के कारण लगातार पीछे छूटते जा रहे हैं.
वित्तीय संसाधनों की कमी
संयुक्त राष्ट्र की उच्चायुक्त और LLDCs मामलों की प्रमुख, रबाब फ़ातिमा कहती हैं, "ये चुनौतियाँ केवल भौगोलिक स्थिति की वजह से नहीं हैं, बल्कि अविकसित बुनियादी ढाँचे, सीमित निर्यात क्षमताओं और वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी ढाँचागत बाधाओं से उपजी हैं."
उन्होंने बताया कि इन देशों की जनसंख्या विश्व की कुल आबादी का 7 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन वैश्विक सकल घरेलु उत्पाद (GDP) में इनकी हिस्सेदारी केवल 1 प्रतिशत है.
यहाँ व्यापार लागत तटीय देशों की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक है, और केवल 61 प्रतिशत लोगों को बिजली की सुविधा प्राप्त है, जबकि वैश्विक औसत 92 प्रतिशत है. इंटरनैट से भी 40 प्रतिशत से भी कम लोग जुड़े हैं.
अवसरों की नई दिशा
उच्चायुक्त रबाब फ़ातिमा ने ‘अवाज़ा सम्मेलन’ को एक महत्वपूर्ण पड़ाव और स्पष्ट रोडमैप बताते हुए कहा कि इस योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर ठोस क़दम ज़रूरी हैं.
उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे अपने देशों की रणनीतियों को इस योजना से जोड़ें, वित्तीय संसाधन सुनिश्चित करें, व्यापार और क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा दें और क्रियान्वयन के लिए संसदीय समूहों का गठन करें.
उच्चायुक्त रबाब फ़ातिमा ने प्रतिनिधियों से कहा, "आप सिर्फ़ क़ानून बनाने वाले नहीं, बल्कि बदलाव के वाहक भी हैं. आपकी भूमिका यह सुनिश्चित करेगी कि अवाज़ा सम्मेलन, 60 करोड़ लोगों के लिए ठोस और टिकाऊ परिणाम प्रस्तुत करे."
संसदों की केन्द्रीय भूमिका
संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष फ़िलेमॉन यैंग ने भी यह बात दोहराई कि वैश्विक प्रतिबद्धताओं को राष्ट्रीय स्तर पर साकार करने में संसदों की अहम भूमिका है.
उन्होंने कहा कि संसदें विकास के लिए क़ानूनी ढाँचा तैयार करती हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य व जलवायु जैसे क्षेत्रों में बजट की दिशा तय करती हैं.
अध्यक्ष यैंग ने अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के, जुलाई 2025 के ‘सलाहकार मत’ का हवाला देते हुए कहा कि अब जलवायु कार्रवाई सभी देशों की क़ानूनी ज़िम्मेदारी है.
उन्होंने ज़ोर दिया कहा कि संसदें, नीतियों से परे जाकर जनता और सरकार के बीच सेतु का काम करती हैं, और सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग की निगरानी करती हैं.
वैश्विक सहयोग की पुकार
उन्होंने कहा, "हमें राष्ट्रीय संसदों और वैश्विक संस्थाओं के बीच साझीदारी को और मज़बूत करना होगा, ताकि हम सतत विकास के उस वादे को पूरा कर सकें, जो शान्ति, समृद्धि और हर व्यक्ति की गरिमा पर आधारित है."
इस सम्मेलन के ज़रिए यह स्पष्ट सन्देश गया है कि अगर भुूमिबद्ध विकासशील देशों (LLDCs) के भविष्य को बदलना है, तो क़ानून बनाने वालों को केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस फै़सले और साझीदारी के ज़रिए, बदलाव का नेतृत्व करना होगा.