जिनीवा: प्लास्टिक प्रदूषण समझौते के लिए वैश्विक चर्चा तेज़
दुनिया भर में, बढ़ते प्लास्टिक कचरे और इसके मानव स्वास्थ्य, समुद्री जीवन व अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे विनाशकारी प्रभावों से निपटने के लिए, जिनीवा में एक वैश्विक समझौते को अन्तिम रूप देने के प्रयासों ने गति पकड़ी है, जिनमें एक समझौते को अन्तिम रूप देने की कोशिशें की जा रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने आगाह किया है कि अगर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ, तो वर्ष 2060 तक, प्लास्टिक कचरा तीन गुना हो जाएगा. इससे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को भारी नुक़सान का सामना करना होगा.
यह चर्चा 2022 में लिए गए उस ऐतिहासिक निर्णय का परिणाम है, जिसमें सदस्य देशों से प्लास्टिक प्रदूषण, ख़ासतौर पर समुद्री प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए, दो वर्ष के भीतर एक वैश्विक समझौते को अन्तिम रूप देने का निर्णय लिया गया था, जोकि क़ानूनी रूप से बाध्य हो.
वैश्विक कार्यवाई ज़रूरी
प्लास्टिक की समस्या का स्तर बहुत बड़ा है. यह दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों के रूप में, व्यापक मात्रा में मौजूद है.
उदाहरण के लिए गरम और ठंडे पदार्थ पीने के लिए प्लास्टिक की नलियाँ, (Straw) कप, चम्मच, थैलियाँ और सौन्दर्य सामान,इन सबको एक बार इस्तेमाल करने के बाद, सीधे समुद्रों या कूड़ेदानों में फेंक दिया जाता है, जहाँ उनसे भारी कूड़ा-कचरा इकट्ठा हो जाता है.
इस समझौते के समर्थकों का मानना है कि प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए प्रस्तावित यह वैश्विक सन्धि, महत्व के लिहाज़ से 2015 के पेरिस जलवायु समझौते जितनी बड़ी हो सकती है.
वहीं, उनका यह भी कहा है कि पैट्रो-देशों की तरफ़ से इस समझौते को कमज़ोर करने के लिए कथित रूप से दबाव डाला जा रहा है क्योंकि उनके कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस उद्योग, प्लास्टिक उत्पादन के लिए कच्ची यानि मूलभूत सामग्री मुहैया कराते हैं.
UNEP की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐंडरसन ने कहा है, "हम केवल री-सायकलिंग के ज़रिए प्लास्टिक प्रदूषण संकट से बाहर नहीं निकल सकते. इसके लिए हमें सर्कुलर अर्थव्यवस्था (circular economy) की ओर जाने के लिए एक प्रणालीगत परिवर्तन की आवश्यकता है."
समाधान पर होगा ज़ोर
इस समझौते का उद्देश्य प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र (डिज़ाइन, उत्पादन से लेकर निपटान तक) को शामिल करना है, ताकि "प्लास्टिक चक्रात्मकता (circularity) को बढ़ावा मिले और प्लास्टिक को पर्यावरण में पहुँचने से रोका जा सके."
यह 10-दिवसीय वार्ता, संयुक्त राष्ट्र के जिनीवा कार्यालय में 5 से 14 अगस्त तक चल रही है, जहाँ 179 देशों के प्रतिनिधि, 618 पर्यवेक्षक संगठनों के 1900 से अधिक प्रतिभागी, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और उद्योग जगत के लोग शिरकत कर रहे हैं.
इस दौरान प्लास्टिक के गै़र-प्लास्टिक विकल्प और कम प्रदूषणकारी उपाय भी सामने रखे जाएंगे.
आर्थिक हानि
यह वार्ता आरम्भ होने से पहले, प्रतिष्ठित मैडिकल जर्नल द लैंसेट ने आगाह किया है कि प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, मानव जीवन के हर चरण में और प्लास्टिक के पूरे जीवन चक्र में गम्भीर बीमारियाँ फैलाती है.
इस जर्नल में के अनुसार, नवजात और छोटे बच्चे विशेष रूप से असुरक्षित हैं.
प्लास्टिक, मानव और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए एक गम्भीर, बढ़ता हुआ और कम पहचाना गया ख़तरा है, जो हर साल 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का आर्थिक नुक़सान भी पहुँचाता है.
इस वार्ता का नेतृत्व अन्तरसरकारी वार्ता समिति (INC) की कार्यकारी सचिव ज्योति माथुर-फ़िलिप कर रही हैं. उन्होंने बताया कि केवल 2024 में ही विश्व आबादी ने 50 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उपयोग किया है, जिसमें से 39 करोड़ 90 लाख टन प्लास्टिक, कचरे में तब्दील हो जाएगा.
अनुमान है कि वर्ष 2040 तक पर्यावरण में प्लास्टिक रिसाव, 50 प्रतिशत बढ़ जाएगा और 2016 से 2040 के बीच प्लास्टिक प्रदूषण से होने वाले नुक़सान की कुल राशि 281 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकती है.
अब तक प्लास्टिक समझौते के लिए पाँच बार वार्ता हो चुकी है.