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बोदिपुर, कुर्बान नगर यूनियन (सुनामगंज) में दोपहर के समय एक नुक्कड़ नाटक देखने के लिए एकत्र हुए ग्रामीण. जलवायु अनुकूलन स्वास्थ्य प्रणाली और सामुदायिक परियोजना के तहत आयोजित ये प्रस्तुतियाँ, मातृ स्वास्थ्य, स्वच्छता, आपदा की तैयारी और बाल विवाह की रोकथाम जैसे विषयों पर जागरूकता बढ़ाने का काम करती हैं.

बांग्लादेश: रोज़मर्रा के वजूद की जंग लड़तीं, सुनामगंज की महिलाएँ

© UNFPA Bangladesh बोदिपुर, कुर्बान नगर यूनियन (सुनामगंज) में दोपहर के समय एक नुक्कड़ नाटक देखने के लिए एकत्र हुए ग्रामीण. जलवायु अनुकूलन स्वास्थ्य प्रणाली और सामुदायिक परियोजना के तहत आयोजित ये प्रस्तुतियाँ, मातृ स्वास्थ्य, स्वच्छता, आपदा की तैयारी और बाल विवाह की रोकथाम जैसे विषयों पर जागरूकता बढ़ाने का काम करती हैं.

बांग्लादेश: रोज़मर्रा के वजूद की जंग लड़तीं, सुनामगंज की महिलाएँ

महिलाएँ

बांग्लादेश के पूर्वोत्तर इलाक़े - हाओर (haor) जलक्षेत्रों में जब बाढ़ का पानी धीरे-धीरे चढ़ता है, तो उससे केवल दिनचर्या में बाधा ही नहीं पड़ती - बल्कि वह जीवन की परिभाषा ही बदल देता है. यहाँ की महिलाओं के लिए सहनसक्षमता कोई नारा या आदर्श नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अस्तित्व की ज़रूरत बन चुकी है. दो बच्चों की माँ 24 वर्षीय शकीला अख़्तर, इसी जिजीविषा की एक जीवन्त मिसाल हैं, जिनके लिए यह संघर्ष अब जीने का एकमात्र रास्ता बन गया है.

शकीला याद करते हुए बताती हैं, “पिछली बाढ़ के समय मैं आठ महीने की गर्भवती थी. हम तीन दिन तक केवल ज़रूरी सामान लेकर शरण में रहे. शुक्र है, मैंने जो प्रशिक्षण लिया था, उसी ने मुझे यह समझ दी कि क्या साथ रखना है, कैसे तैयारी करनी है, और अपने परिवार को सुरक्षित कैसे रखना है.”

प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध सुनामगंज उतना ही संवेदनशील और जलवायु जोखिमों से प्रभावित क्षेत्र भी है. यहाँ प्रजनन आयु की लगभग 6 लाख 70 हज़ार महिलाएँ बसती हैं, लेकिन बार-बार आने वाली जलवायु आपदाएँ, उनकी यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को गम्भीर रूप से प्रभावित करती हैं.

प्रशिक्षण से बदलाव

24 वर्षीय अनीमा अख़्तर अपने 30 वर्षीय पति, राहुल अमीन और दो बच्चों के साथ बोदिपुर गाँव, कुर्बान नगर यूनियन में अपने घर के बाहर खड़ी हैं.
© UNFPA Bangladesh

26 वर्षीय शकीला बेगम एक स्थानीय स्वयंसेविका हैं जो अपने गाँव के 75 से अधिक परिवारों की महिलाओं का स्वास्थ्य मार्गदर्शन करती हैं. 

शकीला, गर्भनिरोधक उपायों से लेकर प्रसवकालीन आपात स्थितियों तक, उन महिलाओं के लिए सम्पर्क की पहली कड़ी बन चुकी हैं, जिनके पास विश्वसनीय स्वास्थ्य जानकारी तक पहुँच का कोई अन्य माध्यम नहीं है.

वो बताती हैं, “प्रसव से ठीक पहले एक महिला का रक्तचाप ख़तरनाक स्तर तक पहुँच गया था. मैंने उसके परिवार को, उसे तत्काल अस्पताल ले जाने की सलाह दी, और वह महिला बिना किसी ख़र्च के सुरक्षित रूप से बच्चे को जन्म दे सकी.”

शकीला का काम व्यापक "जलवायु सहनसक्षम स्वास्थ्य प्रणाली और समुदाय पहल" का हिस्सा है, जिसे 2022 में  UNFPA, स्वीडन की अन्तरराष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी (SIDA) और स्थानीय साझीदार ‘पार्टनर्स इन हेल्थ एंड डिवेलपमेंट (PHD’) के सहयोग से प्रारम्भ किया गया था.

इस पहल का उद्देश्य महिलाओं और किशोरियों को ऐसी जानकारी और संसाधन प्रदान करना है, जिससे वे जलवायु और स्वास्थ्य के परस्पर सम्बन्धों को बेहतर समझ सकें - फिर चाहे वह बाढ़ के दौरान आपात प्रसव की तैयारी हो या मासिक धर्म से जुड़ी जटिलताओं का सामना करना.

सामुदायिक संवाद

इस पहल के तहत, क़ुरबान नगर जैसे ग्रामीण इलाक़ों में स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने के लिए नुक्कड़ नाटकों का सहारा लिया जा रहा है. 

ये जीवन्त प्रस्तुतियाँ सैकड़ों ग्रामीणों को आकर्षित करती हैं और स्वच्छता, लैंगिक समानता व प्रजनन स्वास्थ्य जैसे अक्सर उपेक्षित एवं वर्जित विषयों पर खुलकर संवाद की शुरुआत करती हैं. कई महिलाओं के लिए ये मंच पहली बार खुलकर बोलने का अवसर बनते हैं.

अनीमा अख़्तर बताती हैं, “हम अपने शरीर से जुड़ी समस्याओं के बारे में बात तो करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते.”

अब वह न केवल अपने पति के साथ नियमित रूप से स्वास्थ्य सत्रों में भाग लेती हैं, बल्कि अपने समुदाय की अन्य महिलाओं को भी जागरूक कर रही हैं.

24 वर्षीय अनीमा अख़्तर ने बोदिपुर गाँव के सामुदायिक दौरे के दौरान UNFPA प्रतिनिधि कैथरीन ब्रीन कैमकोंग को गर्व से अपने सात महीने के बेटे से मिलवाया. जलवायु अनुकूलन स्वास्थ्य प्रणाली और सामुदायिक परियोजना के तहत एक स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के सहयोग से अनीमा ने अपने बच्चे को सदर अस्पताल में सुरक्षित रूप से जन्म दिया. यह उनके परिवार में पहली संस्थागत डिलीवरी थी.
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चुनौतियाँ शेष

बाढ़ प्रभावित गाँवों में आज भी आधे से अधिक शिशु-जन्म घरों में ही होते हैं, जहाँ चिकित्सा सहायता के अभाव से गम्भीर जोखिम उत्पन्न होता है.

अधिकाँश महिलाएँ अब भी पारम्परिक धुएँ वाले चूल्हों पर खाना बनाती हैं, जिससे गर्भवती महिलाओं की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

जानकारी की कमी और सामाजिक वर्जनाओं के कारण, किशोरियाँ मासिक धर्म से जुड़ी बातों को छुपाने के लिए मजबूर होती हैं. 

वहीं, जो महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए सब्ज़ियाँ उगाना या सामान बेचना चाहती हैं, उन्हें भी सामाजिक सीमाओं और रूढ़िवादी सोच के कारण अक्सर पीछे हटना पड़ता है.

लेकिन फिर भी, बदलाव की बयार चल पड़ी है.

शकीला अख़्तर बताती हैं, “मैंने अब पर्यावरण अनुकूल चूल्हे का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, ताकि घर के अन्दर की गर्मी कम हो सके. अब मैं परिवार नियोजन के साधनों का उपयोग करती हूँ - जिनके बारे में पहले मुझे कोई जानकारी नहीं थी मैं ख़ुद तय करना चाहती हूँ कि अगला बच्चा कब होना चाहिए.”

सुनामगंज की महिलाएँ अब केवल आपदाओं का सामना नहीं कर रहीं - वे बदलाव की अगुवाई कर रही हैं. जब उन्हें सही जानकारी, समर्थन और अपनी आवाज़ उठाने का अवसर मिलता है, तो वे न केवल स्वयं को सशक्त बनाती हैं, बल्कि पूरे समुदाय की रीढ़ बन जाती हैं.

बांग्लादेश में UNFPA प्रतिनिधि, कैथरीन ब्रीन कैमकोंग (मध्य में) सुनामगंज में जलवायु अनुकूलन स्वास्थ्य प्रणाली और सामुदायिक परियोजना से जुड़ी 26 वर्षीय स्वयंसेविका शकीला बेगम (दाएँ, हरे रंग में) से मुलाक़ात करते हुए.
© UNFPA Bangladesh

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.