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एक युवा लड़का सुधारगृह के एक कमरे के अंदर लगी सलाखों वाली खिड़की से बाहर देख रहा है, बाहर ग्रामीण परिदृश्य दिखाई दे रहा है।

श्रीलंका: दूसरा अवसर, भरोसे से जन्म लेता बदलाव

© UNICEF Sri Lanka/InceptChange काजन, आज भी रिमांड होम के उस एकाकी कमरे का अकेलापन याद करके सिहर उठता है.

श्रीलंका: दूसरा अवसर, भरोसे से जन्म लेता बदलाव

एसडीजी

श्रीलंका में क़ानूनी मामलों में फँसे बच्चों को अब दंडित किए जाने के बजाय, अपने हालात बेहतर बनाने के लिए दूसरा अवसर दिया जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र के समर्थन से शुरू की गई JURE नामक इस परियोजना का उद्देश्य है - बच्चों को सुधारगृहों में बन्द करने के बजाय, उन्हें उनके परिवार और समुदाय में ही सुरक्षित, सम्मानजनक व सम्मानपूर्ण माहौल उपलब्ध कराना, ताकि उनका भविष्य संरक्षित एवं सशक्त बन सके.

17 वर्षीय काजन* उस उम्र में स्कूल में होना चाहिए था. उसे वॉलीबॉल खेलने का अभ्यास करना चाहिए था और अपने भविष्य के सपने देखने चाहिए थे.

(*पहचान गुप्त रखने के लिए नाम बदल दिया गया है.)

लेकिन ये सब होने के बजाय, वह 18 दिन के लिए, रिमांड होम के एक बन्द कमरे में रहा - ना वह किसी अपराध का दोषी था, और ना ही उसे कोई सज़ा सुनाई गई थी. उस पर बस एक ऐसे अपराध का आरोप लगा था, जिसमें ज़मानत सम्भव थी.

काजन याद करते हुए कहता है, “मुझे लगा जैसे मुझसे सब कुछ छीन लिया गया हो. मैं स्कूल नहीं जा सका. क्षेत्रीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता छूट गई. मैं कोच बनने का सपना देखता था, लेकिन सब कुछ खो गया.”

काजन की कहानी इक्का-दुक्का नहीं है. यह उन सैकड़ों बच्चों की हक़ीकत है जिन्हें श्रीलंका की न्याय प्रणाली के तहत, मामला छोटा होने के बावजूद, रिमांड होम में भेज दिया जाता है.

यह व्यवस्था कई वर्षों से चली आ रही है - जहाँ बच्चों को, न्यायालय की धीमी प्रक्रिया के कारण, परिवारों से अलग कर दिया जाता है.

अधिकारियों की इस कार्रवाई का इरादा चाहे ऐसे बच्चों को “सुरक्षा” मुहैया कराना ही क्यों ना हो, मगर परिणाम अक्सर गहरी मानसिक पीड़ा और टूटी हुई उम्मीदों के रूप में सामने आता है.

मगर अब, योरोपीय संघ के सहयोग और यूनीसेफ़ की पहल से चल रही ‘JURE’ परियोजना की मदद से यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है. 

अब ज़ोर इस पर है कि बच्चों को रिमांड होम में बन्द करने के बजाय, उन्हें उनके परिवारों और समुदाय में ही दोबारा बसाया जाए - और इसी बदलाव की वजह से काजन जैसे बच्चों को जीवन में एक नया अवसर मिल रहा है. 

श्रीलंका का एक लड़का और एक महिला बाहर पीठ सटाकर बैठे हैं, पृष्ठभूमि में कपड़े सूखने के लिए लटके हुए हैं।
© UNICEF Sri Lanka/InceptChange

एकांत से समावेशन की ओर

काजन के लिए रिमांड होम का अनुभव अकेलेपन से भरा व उबाऊ रहा. वो बताता है, “मैं ज़्यादातर समय कमरे में ही रहता था. खाना भी वहीं मिलता था. कहीं जाना-आना भी सम्भव नहीं था.”

कभी-कभार की सिलाई कक्षा या बाहर खेलने का समय, थोड़ी राहत ज़रूर देता था, लेकिन अकेलापन और मन की बेचैनी दूर नहीं होती थी.

वह कहता है, “बहुत अकेलापन महसूस होता था.”

घर पर भी हालात आसान नहीं थे. उसकी माँ बताती हैं, “जब वह घर पर नहीं था, तो बहुत तकलीफ़ होती. खाना बनाने का भी मन नहीं करता था. हर दिन यही सोचती थी कि उसे कैसे वापस लाऊँ.”

स्थिति तब बदली जब श्रीलंका के उत्तरी प्रान्त के वरिष्ठ परिवीक्षा अधिकारी कंगेसामूर्ति मनिवन्नन ने मामले में हस्तक्षेप किया.

उन्होंने, JURE परियोजना के तहत आयोजित न्यायिक संवाद मंच में भाग लेने के बाद, रिमांड होम का दौरा किया. इसके बाद उन्होंने न्यायालय में एक रिपोर्ट पेश की.

वे बताते हैं, “माननीय मजिस्ट्रेट ने मेरी सिफ़ारिश स्वीकार कर ली. काजन को परिवीक्षा पर्यवेक्षण के तहत रिहा किया गया और उसे समाज में दोबारा शामिल किया गया.”

एक लड़का हरे-भरे पेड़-पौधों और नारियल के पेड़ों से घिरे ग्रामीण इलाके की सड़क पर बाल्टी लिए अकेला चल रहा है।
© UNICEF Sri Lanka/InceptChange

न्याय को फिर से परिभाषित करना

इस सोच में बदलाव का कारण हैं - वे नियमित न्यायिक संवाद (colloquiums), जिनमें न्यायाधीश, परिवीक्षा अधिकारी और अन्य क़ानूनी विशेषज्ञ मिलकर, बच्चों से जुड़े मामलों पर चर्चा करते हैं.

अब इन बैठकों में एक सवाल बार-बार उठता है - "क्या किसी बच्चे को संस्था (जैसे रिमांड होम) में भेजने से, वाक़ई उसकी भलाई होती है?"

मनिवन्नन स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, “अक्सर इसका जवाब होता है - नहीं. जब किसी बच्चे को रिमांड होम जैसी संस्था किया जाता है, तो उसे समाज में कलंक का सामना करना पड़ता है.

यह पहचान उसका पीछा नहीं छोड़ती. लेकिन अगर हम उसे परिवार और समुदाय के भीतर रखकर ही मदद करें, तो वह फिर से आगे बढ़ सकता है.”

उनके अनुसार, बच्चे को संस्था में भेजना आख़िरी विकल्प होना चाहिए - और वो भी बहुत कम समय के लिए.

अब ज़ोर दिया जा रहा है - समुदाय आधारित पुनर्वास पर, परिवार से दोबारा जोड़ने पर और बच्चों के अनुकूल न्याय प्रक्रिया पर - यही JURE परियोजना का मुख्य उद्देश्य भी है.

एक पिता अपने छोटे बेटे को पीछे से पकड़े हुए हैं, दोनों खिड़की से बाहर देख रहे हैं।
© UNICEF Sri Lanka/InceptChange

नई राह, नया विश्वास

अब काजन दोबारा शिक्षा हासिल करने में जुटा है और GCE Ordinary Level परीक्षा की तैयारी कर रहा है. वह फिर से सपने देखने लगा है. 

वो मुस्कराते हुए कहता है, “शायद मैं एयर कंडीशनर तकनीशियन बनूँ. मैं अपना हुनर सुधारना चाहता हूँ और एक दिन विदेश में काम करना चाहता हूँ.”

वह बताता है, “मैं घर पर रहते हुए, बाहर निकल सकता हूँ, दोस्तों से बात कर सकता हूँ, हँस सकता हूँ. वहाँ, रिमांड होम में, मैं हमेशा अकेला रहता था.”

उसकी राह अब भी आसान नहीं है. समाज की नज़रें और फुसफुसाहट उसका पीछा करती हैं. लेकिन अब वह अकेला नहीं है.

उसके साथ, परिवार और परिवीक्षा अधिकारियों का समर्थन है. वह आगे बढ़ रहा है - धीरे-धीरे, लेकिन आत्मविश्वास के साथ.

वह कहता है, “मैं एक कोर्स करने की सोच रहा हूँ. जब प्रमाणपत्र मिल जाएगा, तो काम कर सकूँगा. मैं बस आगे बढ़ना चाहता हूँ.”

व्यवस्था में बदलाव

JURE परियोजना को योरोपीय संघ ने धन मुहैया कराया है और इसे UNICEFUNDP, श्रीलंका न्यायाधीश संस्थान, राष्ट्रीय परिवीक्षा एवं बाल देखभाल सेवा विभाग के सहयोग से चलाया जा रहा है. 

इसका उद्देश्य है - श्रीलंका की न्याय प्रणाली को अधिक समावेशी, प्रभावशाली और बच्चों के अनुकूल बनाना.

इसका असर केवल अदालतों के फ़ैसलों में नहीं दिखता - बल्कि उन छोटे गाँवों के घरों में भी महसूस होता है, जहाँ एक परिवार अपने बच्चे को वापस पाता है, और एक किशोर फिर से अपने भविष्य पर भरोसा करना शुरू करता है.

यह परिवर्तन उन परिवीक्षा अधिकारियों की प्रतिबद्धता में भी झलकता है, जो दंड की जगह देखभाल को चुनकर, बच्चों को दोबारा जीने की राह दिखाते हैं.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.