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इसराइल-फ़लस्तीन विवाद: दो-राष्ट्र समाधान पर एक नज़र

न्यूयॉर्क में UN मुख्यालय के न्यास परिषद कक्ष में स्थित मानवता और आशा की प्रतिमा का एक दृश्य।
UN Photo/Manuel Elias संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के ट्रस्टीशिप काउंसिल चैम्बर में स्थित यह प्रभावशाली प्रतिमा "मानवता और आशा" का प्रतीक है. यह प्रतिमा डेनमार्क के मूर्तिकार हेनरी स्टार्के द्वारा सागौन की लकड़ी से तराशी गई थी और डेनमार्क द्वारा संयुक्त राष्ट्र को भेंट की गई थी. यह कृति मानवता की दृढ़ता और आशावाद का प्रतीक मानी जाती है.

इसराइल-फ़लस्तीन विवाद: दो-राष्ट्र समाधान पर एक नज़र

शान्ति और सुरक्षा

7 अक्टूबर 2023 को इसराइल पर हमास के हमले और उसके जवाब में इसराइल द्वारा ग़ाज़ा पर किए गए भीषण हवाई हमलों के बाद, ऐसा विश्व जहाँ फ़लस्तीन और इसराइल शान्ति से साथ रहें, फ़िलहाल सम्भव नहीं लगता. इसके बावजूद, 28 जुलाई से शुरू हुआ संयुक्त राष्ट्र का उच्च-स्तरीय सम्मेलन, इस लम्बे संघर्ष को ख़त्म करने का एक और गम्भीर प्रयास है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा के शासनादेश के तहत आयोजित इस सम्मेलन में कैनेडा अग्रणी भूमिका निभा रहा है. संयुक्त राष्ट्र में कैनेडा के राजदूत बॉब रे ने, इस सम्मेलन से पहले यूएन न्यूज़ से बातचीत में स्पष्ट रूप से कहा, “यह कोई शान्ति सम्मेलन नहीं है.”

“यह एक प्रयास है ताकि संवाद बना रहे और हम अड़चनों को पार करके, समाधान की ओर बढ़ सकें. हमें उम्मीद है कि लोग न केवल सुनेंगे, बल्कि जो सुना जाएगा उससे सीखने और समझने की भी कोशिश करेंगे.”

 संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने, अप्रैल में सुरक्षा परिषद को सम्बोधित करते हुए, चेतावनी दी थी कि दो-राष्ट्र समाधान की पूरी प्रक्रिया “ख़त्म होने के कगार पर है.” 

उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को हासिल करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति “अब पहले से कहीं अधिक कमज़ोर महसूस होती है.”

कनाडा के राजदूत बॉब रे ने न्यूयॉर्क में United Nations के आपातकालीन विशेष सत्र की बैठक में भाषण दिया।
United Nations

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने, 5 जून को पत्रकारों से बातचीत में  कहा, “जो लोग दो-राष्ट्र समाधान पर सवाल उठाते हैं, मैं उनसे पूछता हूँ: फिर विकल्प क्या है? क्या हम एक ऐसा राष्ट्र चाहते हैं जहाँ या तो फ़लस्तीनियों को बाहर निकाल दिया जाए, या उन्हें उनके ही देश में बिना किसी अधिकार के जीने पर मजबूर किया जाए?”

उन्होंने याद दिलाया कि “दो-राष्ट्र समाधान को जीवित रखना और उसे वास्तविकता में बदलने के लिए उचित परिस्थितियाँ तैयार करना अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी है.”

कैनेडा के राजदूत ने बताया कि सम्मेलन में इसराइल और फ़लस्तीन से भाग लेने की अपील की गई है, लेकिन आयोजक उनकी कठिन और जटिल स्थिति को समझते हैं. 

उन्होंने कहा, “हमास अब भी इसराइल के कई नागरिकों को बन्धक बनाए हुए है. यह हमला 1940 के बाद यहूदी समुदाय पर हुआ सबसे भीषण हमला था. अब हमें उसके जवाब में ग़ाज़ा पर हुए सैन्य अभियान के परिणामों से भी निपटना पड़ रहा है, जो फ़लस्तीनियों और अरब समुदाय के लिए बेहद पीड़ादायक रहा है.”

ज़मीनी स्तर पर बदलाव की कोशिश

इस सम्मेलन को आयोजित करने का निर्णय, महासभा के प्रस्ताव ES-10/22 के तहत लिया गया था. इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुरूप एक समग्र, न्यायपूर्ण और स्थाई शान्ति के लिए स्पष्ट रास्ता तय करना है.

फ्रांस और सऊदी अरब ने सम्मेलन से पहले एक संयुक्त बयान जारी करके, दो-राष्ट्र समाधान के लिए वैश्विक समर्थन को दोहराया. 

उन्होंने कहा कि यही एकमात्र रास्ता है जिससे इसराइल और फ़लस्तीन की वैध आकांक्षाएँ पूरी हो सकती हैं तथा क्षेत्र में शान्ति स्थापित की जा सकती है.

गाजा पट्टी के नेत्ज़ारिम में एक वितरण केंद्र के पास हजारों विस्थापित फिलिस्तीनी भीड़ भरी कतार में इंतजार कर रहे हैं।
© UNICEF/Eyad El Baba

उन्होंने पिछली असफल शान्ति प्रक्रियाओं को ख़ारिज करते हुए ज़ोर दिया कि इस बार उद्देश्य केवल बातचीत शुरू करना नहीं, बल्कि दो-राष्ट्र समाधान को वास्तव में लागू करना है.

फ्रांस की सलाहकार ऐन-क्लेयर लेजेन्द्रे ने, मई में हुई एक तैयारी बैठक में ज़ोर दिया था कि लड़ाई रोकने व बन्धकों व हिरासत में रखे गए लोगों की रिहाई जैसे ठोस और अपरिवर्तनीय क़दम उठाना ज़रूरी है.

सऊदी अरब के वार्ता समूह के प्रमुख, मनाल बिन्त हसन रदवान ने भी कहा कि इसके लिए एक ऐसी योजना आवश्यक है, जो टकराव के बुनियादी कारणों को मिटाए और शान्ति, गरिमा व साझा सुरक्षा की दिशा में एक वास्तविक राह दिखाए.

दोनों देशों ने ही स्पष्ट किया कि केवल युद्धविराम ही काफ़ी नहीं होगा - ग़ाज़ा के पुनर्निर्माण, शासन, पश्चिमी तट की स्थिति और पुराने विवादों का हल भी ज़रूरी है. 

उन्होंने 1993 के ओस्लो समझौते को आख़िरी गम्भीर बातचीत बताया और असली समाधान के लिए एक नए ढाँचे की आवश्यकता पर ज़ोर दिया.

दो-राष्ट्र समाधान क्या है?

  • यह विचार कि यहूदी और फ़लस्तीनी लोगों के लिए दो अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र हों, जो शान्ति से साथ रहें, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना (1945) से पहले का है. यह अवधारणा कई सुरक्षा परिषद प्रस्तावों, शान्ति वार्ताओं और हाल के महासभा सत्रों में दोहराई जा चुकी है.
  • जब फ़लस्तीन पर ब्रिटेन का नियंत्रण समाप्त हुआ, तो "फ़लस्तीन प्रश्न" संयुक्त राष्ट्र को सौंपा गया. संयुक्त राष्ट्र ने फ़लस्तीन को दो देशों - एक यहूदी और एक फ़लस्तीनी अरब - में बाँटने का प्रस्ताव दिया. साथ ही, येरूशेलम को अन्तरराष्ट्रीय शहर बनाने की सिफ़ारिश की गई. यही दो-राष्ट्र समाधान की आधारशिला बनी.
  • शान्ति स्थापना के उद्देश्य से एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें इसराइल और अरब देशों तथा इसराइल व फ़लस्तीनियों के बीच दो अलग रास्तों पर सीधी बातचीत शुरू हुई. यह वार्ता सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 242 (1967) और 338 (1973) पर आधारित थी.
  • इसराइली प्रधानमंत्री यित्ज़हाक रबीन और फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के प्रमुख यासिर अराफ़ात ने ओस्लो समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसमें आगे की बातचीत के लिए बुनियादी सिद्धान्त तय किए गए और पश्चिमी तट व ग़ाज़ा में फ़लस्तीनी स्वशासन की नींव रखी गई.
  • कई अहम मुद्दों को स्थाई समाधान की बातचीत के लिए आगे बढ़ाया गया, जो 2000 में कैंप डेविड और 2001 में तबा में हुईं. लेकिन इनमें कोई निर्णायक समझौता नहीं हो सका.
  • ओस्लो समझौते के तीन दशक बाद भी संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य वही है - इसराइल व फ़लस्तीन के बीच संघर्ष ख़त्म करना और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून, सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों व द्विपक्षीय समझौतों के आधार पर एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक, टिकाऊ एवं संप्रभु फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना करना. यह राष्ट्र 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित हो, इसराइल के साथ शान्ति एवं सुरक्षा के साथ सह-अस्तित्व में रहे, और येरूशेलम दोनों की राजधानी बने.

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