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वैश्विक भूख स्थिति में मामूली कमी, असमानताओं का दायरा बढ़ा

ये दक्षिण सूडान का दृश्य है. दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा की स्थिति कुछ बेहतर तो हुई है मगर विषमताएँ बढ़ी हैं.
© WFP/Peter Louis
ये दक्षिण सूडान का दृश्य है. दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा की स्थिति कुछ बेहतर तो हुई है मगर विषमताएँ बढ़ी हैं.

वैश्विक भूख स्थिति में मामूली कमी, असमानताओं का दायरा बढ़ा

आर्थिक विकास

दुनिया भर में, वर्ष 2022 के बाद से, भूख यानि जीने के लिए ज़रूरी भरपेट भोजन नहीं मिलने की स्थिति का सामना करने वाले लोगों की संख्या में, मामूली कमी तो दर्ज की गई है मगर यह सभी स्थानों पर समान नहीं है. साथ ही, दुनिया भर में विषमताओं का दायरा बढ़ा है.

संयुक्त राष्ट्र के एक अन्तर-एजेंसी समूह -  SOFI ने सोमवार को अपनी प्रमुख रिपोर्ट जारी की है जिसका नाम है -"विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति 2025 (SOFI)".

रिपोर्ट का अनुमान है कि 2024 में वैश्विक जनसंख्या के लगभग 8.2 प्रतिशत हिस्से यानि लगभग 67.3 करोड़ लोगों ने भूख यानि भरपेट भोजन नहीं मिलने के हालात का सामना किया. यह संख्या वर्ष 2023 में 8.5 प्रतिशत और 2022 में 8.7 प्रतिशत से कम है.

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लातीनी अमेरिका और एशिया में कुछ सुधार देखा गया, जहाँ 2022 और 2024 के बीच एशिया में कुपोषण की स्थिति में 1.2 प्रतिशत और लातीनी अमेरिका व कैरीबियाई में 1 प्रतिशत की गिरावट आई.

मगर,अफ़्रीकी देशों की 20 प्रतिशत आबादी और पश्चिमी एशियाई देशों में 12.7 प्रतिशत लोग, भूख यानि जीवित रहने के लिए ज़रूरी भरपेट भोजन नहीं मिलने के हालात का सामना कर रहे हैं. यह दुर्भाग्य से लगातार वृद्धि का संकेत है.

अनुमान है कि 2030 तक 51 करोड़ 20 लाख करोड़ लोग गम्भीर रूप से कुपोषित हो सकते हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत लोग अफ़्रीका में होंगे.

कुछ राहत, कुछ चिन्ता

रिपोर्ट में इन ये आँकड़े, भूख यानि भारपेट भोजन नहीं मिलने की स्थिति को पूरी तरह दूर करने के, वैश्विक लक्ष्य को प्राप्त करने की अपार चुनौती को मुखर करते हैं.

बाल पोषण संकेतकों में, पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनेपन का फैलाव, 2012 से 2024 तक 3.2 प्रतिशत कम हुआ है, मगर अधिक वज़न वाले या कमज़ोर बच्चों के अनुपात में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है.

15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं में, एनीमिया यानि रक्त की कमी और वयस्कों में मोटापे में भी वृद्धि ने ख़ास ध्यान खींचा है.

अहम बात ये है कि 2023 से 2024 के दौरान, वैश्विक खाद्य असुरक्षा में मामूली गिरावट आई. मगर 2019 की तुलना में देखा जाए तो, वर्ष 2024 में साढ़े 33 करोड़ अधिक लोग, खाद्य असुरक्षा से प्रभावित हुए.

कोविड-युग की खाद्य महंगाई

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की पाँच एजेंसियों मिलकर प्रकाशित की है: खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO), अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD), संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF), विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP), और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO).

इन एजेंसियों का कहना है कि कोविड-19 के दौर की महंगाई, यूक्रेन में युद्ध और जलवायु झटकों के कारण, भूख और खाद्य सुरक्षा के अनुमान, महामारी-पूर्व के स्तर से ऊपर बने हुए हैं.

FAO के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो कुलेन ने, 22 जुलाई को इस रिपोर्ट के पूर्वावलोकन में कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान, राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के कारण, मांग और महंगाई को बढ़ावा मिला.

यूक्रेन में युद्ध से जुड़े खाद्य और वस्तु व्यापार प्रतिबन्धों और जारी जलवायु झटकों के साथ, इन कारकों ने, खाद्य महंगाई को तेज़ी से बढ़ा दिया, जिससे खाद्य सुरक्षा और पोषण में महामारी के बाद की पुनर्बहाली में बाधा उत्पन्न हुई.

इन हालात ने निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों को विशेष रूप से प्रभावित किया, जिससे खाद्य महंगाई पहले से ही उच्च वैश्विक औसत से भी अधिक बढ़ गई.

सिफ़ारिशें और धन की ज़रूरतें

इस रिपोर्ट में, वैश्विक खाद्य महंगाई से निपटने के लिए, नीतिगत उपायों की सिफ़ारिश करती है. इनमें सबसे अधिक प्रभावित देशों की रक्षा के लिए लक्षित वित्तीय उपाय, महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए विश्वसनीय और पारदर्शी मौद्रिक नीतियाँ और कृषि-खाद्य प्रणालियों में रणनैतिक निवेश जैसे उपाय शामिल हैं.

रिपोर्ट और एजेंसी के नेताओं ने यह भी रेखांकित किया कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए धन उपलब्धता की सख़्त आवश्यकता है.

विश्व खाद्य कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक सिंडी मैक्केन ने ज़ोर देकर कहा है, "भूख या खाद्य असुरक्षा, अब भी चिन्ताजनक स्तर पर है, फिर भी इससे निपटने के लिए आवश्यक धनराशि कम हो रही है."

उन्होंने कहा, "इस वर्ष धनराशि में, 40 प्रतिशत तक की कटौती का मतलब है कि करोड़ों लोग हमारी जीवनरक्षक सहायता से वंचित हो जाएंगे."

"वैसे तो, खाद्य असुरक्षा के समग्र स्तर में मामूली कमी स्वागत योग्य है, मगर ज़रूरतमंद लोगों को ज़रूरी सहायता प्रदान करने में लगातार विफलता, कड़ी मेहनत से हासिल की गई इन उपलब्धियों को जल्द ही ख़त्म कर देगी. अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के अस्थिर क्षेत्रों में और अधिक अस्थिरता पैदा होगी."