अफ़ग़ानिस्तान में जबरन वापिस लौटे शरणार्थियों के साथ 'अत्याचार'
पाकिस्तान और ईरान से, अफ़ग़ानिस्तान में जबरन वापस भेजे गए लोगों के साथ अत्याचार किए जाने की दहला देने वाले मामले सामने आए हैं. संयुक्त राष्ट्र की गुरूवार को जारी एक रिपोर्ट में, स्वदेश वापिस लौटे अफ़ग़ान लोगों को देश में, गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों का सामना करना पड़ा है. इनमें यातना, मनमानी गिरफ़्तारी, और जान से मारने की धमकियाँ शामिल हैं.
एक पूर्व टीवी रिपोर्टर, अगस्त 2021 में तालेबान की धमकियों के कारण देश छोड़ चुकी थीं. लेकिन जब 2024 में उन्हें पाकिस्तान से जबरन वापस भेजा गया, तो उन्हें आज़ादी नहीं, बल्कि एक अदृश्य क़ैद मिली.
यूएन रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बताया, “मेरे लिए रोज़गार नहीं है, आवाज़ उठाने की आज़ादी नहीं है, और मैं स्पष्ट रूप से कह सकती हूँ कि मैं प्रभावी तौर पर घर में नज़रबन्द हूँ.”
उन जैसे 49 लोगों की गवाही पर आधारित यह रिपोर्ट, अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने जारी की है.
रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि जबरन लौटाए गए लोग - विशेष रूप से महिलाएँ, पूर्व सुरक्षा बलों से जुड़े अधिकारी, पत्रकार एवं नागरिक समाज के कार्यकर्ता - तालेबान शासन के प्रतिशोध, दमन व मानवाधिकार हनन के लगातार शिकार बन रहे हैं.
पूर्व प्रशासन से जुड़े लोगों की हालत चिन्ताजनक
रिपोर्ट के अनुसार, भले ही तालेबान ने कई पूर्व सरकारी अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों के लिए सार्वजनिक रूप से आम माफ़ी की घोषणा की हो, हक़ीकत यह है कि लौटने के बाद उन्हें लगातार छिपकर जीवन जीना पड़ रहा है.
एक ऐसे ही पूर्व अधिकारी ने बताया कि 2023 में वापसी के तुरन्त बाद उन्हें दो रातों तक एक गुप्त स्थान पर बन्दी बनाकर रखा गया, जहाँ उन्हें डंडों, तारों और लकड़ी से बेरहमी से पीटा गया, पानी में डुबोकर यातना दी गई, और अन्त में नक़ली फाँसी के ज़रिए आतंकित किया गया. इस क्रूरता के दौरान उनकी टांग टूट गई.
महिलाओं के लिए भयावह स्थिति
रोज़गार, आवाजाही और शिक्षा जैसे मूल अधिकारों से वंचित महिलाओं को ख़ासतौर पर सामाजिक दमन झेलना पड़ रहा है.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने कहा है, “किसी को भी ऐसे देश में वापस नहीं भेजा जाना चाहिए जहाँ उन्हें उनकी पहचान या व्यक्तिगत इतिहास के कारण उत्पीड़न का ख़तरा हो."
"अफ़ग़ानिस्तान में यह ख़तरा महिलाओं और लड़कियों के लिए और भी गम्भीर है, जिन्हें केवल उनके लिंग के आधार पर विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.”
किसी व्यक्ति को उस देश में वापस भेजना जहाँ उसे यातना, अमानवीय व्यवहार, या अपूरणीय क्षति का वास्तविक ख़तरा हो, Non-Refoulement के सिद्धान्त का उल्लंघन है.
यह अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार और शरणार्थी क़ानून का एक मूल स्तम्भ है और ऐसा करना अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के गम्भीर हनन की श्रेणी में आता है.
सिफ़ारिशें और अपील
रिपोर्ट में सभी देशों से स्पष्ट अपील की गई है कि वे प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति का सावधानीपूर्वक और व्यक्तिगत मूल्यांकन करें, और ऐसे किसी भी व्यक्ति को अफ़ग़ानिस्तान वापस नहीं भेजें जिसे गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन या उत्पीड़न का वास्तविक ख़तरा हो.
साथ ही, देशों से यह भी आग्रह किया गया है कि वे अफ़ग़ान लोगों के लिए वैकल्पिक व सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराएँ, ताकि वे बिना डर के सुरक्षित रूप से अन्य देशों में शरण ले सकें और निर्वासन की आशंका के बिना जीवन जी सकें.
पाकिस्तान और ईरान से लाखों अफ़ग़ान लोगों की जबरन वापसी ने, अफ़ग़ानिस्तान की पहले से ही कमज़ोर व्यवस्थाओं पर भारी दबाव डाल दिया है.
रिपोर्ट में यह भी ज़ोर दिया गया है कि अन्य देशों को अफ़ग़ान शरणार्थियों के दीर्घकालिक पुनर्वास और समर्थन के लिए वित्तीय सहायता में बढ़ोत्तरी करनी चाहिए, ताकि उनकी सुरक्षित एवं सम्मानजनक पुनर्बहाली सुनिश्चित हो सके.
अफ़ग़ानिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि रोज़ा ओटुनबायेवा ने कहा, “जब तक सभी अफ़ग़ान लोगों को सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन में समान भागेदारी नहीं मिलेगी, तब तक देश की प्रगति अधूरी रहेगी."
"मैं तालेबान से आग्रह करती हूँ कि वे अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाएँ और अपने लोगों के अधिकारों की रक्षा करें.”