SDGs को बचाना अब भी सम्भव, मगर देशों को तुरन्त उठाने होंगे क़दम, यूएन प्रमुख
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि सतत विकास लक्ष्य (SDGs), इस समय भले ही संकट में हों, लेकिन हाल के वैश्विक समझौते यह दिखाते हैं कि दुनिया अब भी मिलकर काम कर सकती है, और अब भी बदलाव सम्भव है.
यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने, सोमवार को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित उच्च स्तरीय राजनैतिक मंच (HLPF) में मंत्री स्तर की बैठक को सम्बोधित करते हुए, महामारी से निपटने की तैयारी, महासागर संरक्षण और विकास वित्त जैसे मुद्दों पर हुई हालिया प्रगति का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, “परिवर्तन केवल ज़रूरी ही नहीं, यह पूरी तरह मुमकिन भी है.”
ध्यान दिला दें कि HLPF, 2030 के विकास एजेंडा और उसके 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की समीक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र का केन्द्रीय मंच है.
यूएन प्रमुख ने जिनीवा में विश्व स्वास्थ्य महासभा में हुए महामारी समझौते, नीस में तीसरे महासागर सम्मेलन में महासागर क्षेत्रों की रक्षा को लेकर लिए गए संकल्प, और सेविया में वैश्विक वित्त पर नई सोच को हाल की बड़ी उपलब्धियों के रूप में गिनाया.
उन्होंने कहा, “ये अकेले हासिल की गई सफलताएँ नहीं हैं, ये संकेत हैं कि बहुपक्षवाद (multilateralism) अब भी कारगर है.”
उम्मीद अब भी क़ायम है...
महासचिव गुटेरेश ने आगाह किया कि दुनिया 2030 के लक्ष्यों को पाने से अब भी बहुत दूर है. उनके मुताबिक़, “सिर्फ़ 35 प्रतिशत लक्ष्य ही सही दिशा में बढ़ रहे हैं. लगभग आधे लक्ष्य बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं और 18 प्रतिशत तो पीछे की तरफ़ जा रहे हैं.”
उन्होंने देशों से तुरन्त और साहसिक क़दम उठाने की अपील की. “SDGs कोई सपना नहीं हैं. यह एक ठोस योजना है…सबसे कमज़ोर लोगों, एक-दूसरे के लिए और आने वाली पीढ़ियों से किए गए वादों को निभाने की योजना.”
महासचिव ने वर्ष 2015 के बाद हुई कुछ अहम प्रगति का भी ज़िक्र किया, जैसे कि सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, बाल विवाह में कमी, और महिलाओं की भागेदारी में वृद्धि.
उन्होंने कहा कि यदि राजनैतिक इच्छाशक्ति और संसाधनों को सही दिशा दी जाए, तो SDGs अब भी हासिल किए जा सकते हैं.
महासचिव ने यह भी कहा कि विकास और शान्ति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. मगर, ग़ाज़ा, सूडान, म्याँमार, यूक्रेन जैसी जगहों पर जारी हिंसा दिखाती है कि टिकाऊ विकास के बिना टिकाऊ शान्ति नहीं आ सकती.
उन्होंने कहा, "हर क़दम पर हम जानते हैं कि टिकाऊ शान्ति के लिए टिकाऊ विकास ज़रूरी है."
यूएन प्रमुख ने तत्काल युद्धविराम तथा कूटनीति के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता की अपील की.
आदर्श नहीं, ज़िम्मेदारी हैं SDGs
आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) के अध्यक्ष बॉब रे ने भी महासचिव की बातों का समर्थन करते हुए कहा, “SDGs कोई वैकल्पिक आदर्श नहीं, बल्कि ज़रूरी प्रतिबद्धताएँ हैं. यह समय अपने आदर्शों को छोड़ने का नहीं है… बल्कि अब वह समय है जब हमें एक-दूसरे के प्रति अपनी बहुपक्षीय ज़िम्मेदारियों को और मज़बूती से निभाना चाहिए.”
बॉब रे ने आगाह किया कि घटते बजट और बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति विकास को कमज़ोर कर रहे हैं, लेकिन यह भी दोहराया कि “बहुपक्षीय सहयोग समाज के हर स्तर पर असली और ठोस लाभ लाता है.”
उन्होंने कहा कि SDGs को दुनियाभर की नीतियों और बजट में इस रूप में शामिल किया जाए ताकि वे जनता की सेवा का मूल आधार बनें. इसके लिए नागरिक समाज, स्थानीय सरकारों और निजी क्षेत्र से गहरी साझीदारी ज़रूरी है.
धरातल पर बदलाव ज़रूरी
संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष फ़िलेमॉन यैंग ने कहा कि राजनैतिक संकल्पों को ज़मीनी कार्यों में बदला जाना चाहिए.
उन्होंने ‘Compromiso de Sevilla’ और साल 2024 के ‘Pact for the Future’ जैसे प्रयासों की सराहना की.
ये वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सुधार, जलवायु वित्त पोषण को बढ़ाने और अन्तरराष्ट्रीय कर सहयोग को मज़बूत करने का लक्ष्य रखते हैं.
उन्होंने कहा, “महत्त्वाकांक्षा और नतीजों के बीच की दूरी को केवल एकता, संसाधनों और राजनैतिक इच्छाशक्ति से ही पाटा जा सकता है.”
अध्यक्ष फ़िलेमॉन यैंग ने चेतावनी दी कि, “2030 की समयसीमा तेज़ी से पास आ रही है… चाहे हमें यह पसन्द हो या न हो.. और हालाँकि प्रगति धीमी है, हमारे पास इसे पूरा करने के लिए ज़रूरी संसाधन और इच्छाशक्ति मौजूद है.”
जवाबदेही और साझेदारी अहम
उच्च स्तरीय राजनैतिक मंच (HLPF) की स्थापना 2012 में, रियो+20 सम्मेलन के बाद हुई थी. यह SDGs की प्रगति की निगरानी के लिए संयुक्त राष्ट्र का मुख्य मंच है.
अब तक 150 से अधिक देशों ने स्वैच्छिक राष्ट्रीय समीक्षाएँ (VNRs) प्रस्तुत की हैं. इस साल 36 देश अपनी नवीन रिपोर्ट पेश कर रहे हैं.
ये रिपोर्ट दिखाती हैं कि उन्होंने 2030 एजेंडा (जो विकास के लक्ष्य हैं) को पूरा करने के लिए क्या किया और किन समस्याओं का सामना किया.
महासचिव ने मंत्रियों से अपील की कि अब जब SDGs को पूरा करने के लिए सिर्फ पाँच साल बचे हैं, “अब इन छोटे-छोटे बदलावों को विशाल बदलाव में तब्दील करने का समय है…सभी देशों के लिए.”