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हैती के हिंचे में एक स्कूल भवन के प्रांगण में विस्थापित लोग रह रहे हैं। पूरे क्षेत्र में रस्सियों पर कपड़े सूख रहे हैं, और एक बच्चा एक छोटे पेड़ के पास चल रहा है।

हेती: गिरोह हिंसा से पीड़ित लोगों के लिए स्कूल बने शरणस्थली

© IOM/Antoine Lemonnier Anténor Firmin स्कूल अब हिंसा से विस्थापित हुए लोगों की शरणस्थली बन चुका है.

हेती: गिरोह हिंसा से पीड़ित लोगों के लिए स्कूल बने शरणस्थली

शान्ति और सुरक्षा

हेती में हिंसक गिरोहों की बढ़ती बर्बरता ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया है. इनमें से बहुत से लोग अब उन स्कूलों में शरण ले रहे हैं जो कभी शिक्षा के मन्दिर थे - जहाँ आज भी शिक्षा की ताक़त पर भरोसा बना हुआ है.

हेती के मध्यवर्ती शहर हिंचे में स्थित Anténor Firmin स्कूल की कक्षाएँ, अब बच्चों की शिक्षा से नहीं, बल्कि बच्चों के रोने, बर्तनों की नाहट और रातभर गूँजती फुसफुसाहटों से भर गई हैं.

700 से अधिक विस्थापित लोग, इस जर्जर इमारत में शरण लिए हुए हैं. ये लोग अब उसी फ़र्श पर सोते हैं जहाँ कभी बच्चे गुणा-भाग करते थे.

इन लोगों में शामिल हैं एडेंस डेसिर जोकि एक पूर्व शिक्षक और प्रशिक्षित लेखाकार हैं. उनका मानना है कि शिक्षा ही इस त्रस्त कैरेबियन देश के लिए शान्ति और समृद्धि की सबसे सशक्त राह बन सकती है.

मार्च 2025 में सौत-देउ और मीरबलाइस में भड़की हिंसा ने उनका पूरा जीवन बदल दिया. वे उन 6 हज़ार लोगों में थे जो हत्या, बलात्कार, लूट और आगज़नी से जान बचाकर भागे.

हैती के हिंचे में एक अस्थायी कक्षा में पूर्व शिक्षक एडेंस डेसिर।
© IOM/Antoine Lemonnier

उन्होंने कहा, “मैंने वर्षों में जो कुछ भी बनाया था, सब कुछ नष्ट हो गया. मैं बिल्कुल ख़ाली हाथ रह गया.”

हेती की राजधानी पोर्त-ऑ-प्रिंस के अधिकाँश हिस्सों पर हिंसक गिरोहों का लम्बे समय से कब्ज़ा रहा है. लेकिन हाल ही में, उनका प्रभाव ग्रामीण इलाक़ों तक फैलने लगा है, जहाँ हिंचे और सौत-देउ जैसे शहर स्थित हैं.

एडेंस डेसिर को शरण मिली उसी स्कूल में जहाँ वे एक समय बच्चों को पढ़ाते थे - लेकिन अब वह स्कूल अपनी मूल पहचान खो चुका है.

स्कूल में रखी मेज़ें अब बिस्तरों में तब्दील हो चुकी हैं, और कक्षाएँ शरणार्थी शिविर बन गई हैं. भीड़-भाड़ में फँसे परिवार उन कमरों में रहने को मजबूर हैं जो कभी लोगों के रहने के लिए बने ही नहीं थे.

और फिर भी, इसी भीड़ में एडेंस ने एक नई शुरुआत की - न केवल अपने लिए, बल्कि आसपास के बच्चों के लिए. एक व्हाइटबोर्ड, एक मार्कर और गहरी निष्ठा के साथ उन्होंने एक बार फिर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया.

वो कहते हैं, “बचपन से ही मुझे पढ़ाने से लगाव रहा है. मेरे लिए यही सबसे मायने रखता है. जब तक ये बच्चे मेरे पास हैं, मैं उन्हें पढ़ाता रहूँगा — यही उनका असली अवसर है.”

हैती के हिंचे में एक अस्थायी कक्षा में बच्चों सहित विस्थापित लोग।
© IOM/Antoine Lemonnier

अनिश्चितता भरा जीवन

एक समय अपने छोटे व्यापार को आगे बढ़ाने का सपना देख रहे एडेंस डेसिर अब अनिश्चितता में जी रहे हैं. “वो सपना अब ख़त्म हो चुका है. हिंसा ने सब कुछ बदल दिया. अब मुझे कहीं और जाकर ज़िन्दगी फिर से शुरू करनी होगी… लेकिन जब तक यहाँ हूँ, ज्ञान बाँटता रहूँगा.”

अब हर दिन उनके लिए एक नई चुनौती है.

वो बताते हैं, “मैं अब कोई योजना नहीं बना सकता. हर दिन नई मुश्किलें लाता है. और हर रात सोचता हूँ - रात को सोते समय यही सोचता हूँ कि कल भोजन मिलेगा या नहीं."

पानी और भोजन की भारी क़िल्लत है. महिलाएँ और बच्चे घंटों लम्बी क़तारों में भारी बर्तन लिए खड़े इन्तज़ार करते हैं.

शौचालय और स्नानघर नहीं के बराबर हैं - स्वच्छता का संकट गम्भीर होता जा रहा है, ख़ासतौर पर बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए.

भोजन की स्थिति भी उतनी ही अनिश्चित है. वो बताते हैं, “कई रातें ऐसी होती हैं जब मुझे बिना ख़ाली पेट ही सोना पड़ता है. फिर भी मैं पढ़ाता हूँ - क्योंकि ये बच्चे मेरे पास हैं.”

हैती में एक खुले में बने सहायता केंद्र में राहतकर्मी और एक विस्थापित परिवार, जिसमें व्हीलचेयर पर बैठा एक व्यक्ति भी शामिल है।
© IOM/Antoine Lemonnier

विस्थापितों तक राहत पहुँचाना आसान नहीं है. पोर्त-ऑ-प्रिंस और हिंचे के बीच की मुख्य सड़क असुरक्षा के कारण बन्द है, जिससे आपूर्ति मार्ग कट गए हैं और पूरे समुदाय बाहरी दुनिया से कट गए हैं.

इन विकट हालात में, संयुक्त राष्ट्र की अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संस्था (IOM), 17 राहत शिविरों में 800 से अधिक परिवारों तक सहायता पहुँचा चुकी है - जिसमें तम्बू, कम्बल, बर्तन और पानी के डिब्बे शामिल हैं.

IOM की टीमें, लोगों की आवश्यकताएँ समझने और ज़रूरी मदद पहुँचाने के लिए, स्थानीय प्रशासन, समुदायों और विस्थापितों के साथ मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम कर रही हैं.

साथ ही, शिविर प्रबन्धन के लिए स्थानीय समितियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है, सबसे असुरक्षित शिविरों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानान्तरित किया जा रहा है और मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी प्रदान की जा रही है.

निर्बलों की सुरक्षा ज़रूरी

एडेंस डेसिर कहते हैं, “इस संकटपूर्ण स्थिति, इन बच्चों की अपनी पसन्द नहीं है, मगर अब उन्हें इससे जूझना है. इसलिए मुझे लगता है कि शिक्षा ही उनका सबसे बड़ा बचाव है.”

जब हिंसा शिक्षा के अवसर छीन ले, जब परिवार टूट जाएँ, और जब असंवेदनशीलता हावी हो जाए - तब शिक्षा फैलाना एक शान्ति का प्रतिरोध बन जाता है.

“अगर हम बदलाव चाहते हैं, तो हमें ऐसे नागरिकों की ज़रूरत है जो बेहतर सोच सकें. मुझे नहीं मालूम कि मेरा काम काफ़ी है या नहीं, लेकिन यही मुझे ज़िन्दगी का मक़सद देता है. हाँ, यह सोचकर दिल टूटता है कि एक दिन मुझे इन्हें छोड़कर जाना पड़ेगा.”