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भारत के बिहार राज्य में अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता, प्रारम्भिक बाल विकास को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं.

भारत: ग्रामीण इलाक़ों में बच्चों की देखभाल के लिए खेल मंत्र

© UNICEF/Raghvendra Kumar
भारत के बिहार राज्य में अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता, प्रारम्भिक बाल विकास को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं.

भारत: ग्रामीण इलाक़ों में बच्चों की देखभाल के लिए खेल मंत्र

स्वास्थ्य

यूनीसेफ़ बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में बच्चों के समग्र विकास के लिए खेलकूद का सहारा ले रहा है. यह एक तरह का शान्त बदलाव है जिसमें यूनीसेफ़ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को यह सिखा रहा है कि वे खेल के ज़रिए, किस तरह बच्चों की देखभाल और सीखने में परिवारों की मदद करें. 

यूनीसेफ़ स्वास्थ्यकर्मियों को ज़रूरी संसाधन और प्रशिक्षण मुहैया करा रहा है, ताकि वे परिवारों को यह समझा सकें कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातें भी, बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में अहम भूमिका निभा सकती हैं.

इस पहल के ज़रिए, बिहार के पूर्णिया ज़िले के बाइस प्रखंड के डंगराहा घाट गाँव में, एक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है. यह कोई बड़ा कार्यक्रम या नीति परिवर्तन नहीं है - बल्कि घरों में गूंजती हँसी के साथ उठी बदलाव की लहर है.

18 महीने की सुहाना परवीन अब अपने पिता के साथ पानी में छींटे मारती हैं, मिट्टी की गोलियाँ बनाती हैं, और अपने चचेरे भाई आमिर व अल्मिश के साथ हँसती-खिलखिलाती हैं. कुछ महीने पहले तक, ऐसा दृश्य दुर्लभ था.

यहाँ समुदायों में माना जाता था कि खिलौनों का मतलब बाज़ार से लाया गया प्लास्टिक होता है. उन्हें मालूम ही नहीं था कि पानी, चम्मच और कपड़ा जैसे घर के सामान भी बच्चों के लिए खिलौने बन सकते हैं.

लेकिन सितम्बर 2024 से सब कुछ बदलने लगा, जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता वाजेदा तबस्सुम और मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता पिंकी कुमारी ने, यूनीसेफ़ समर्थित प्रारम्भिक बाल विकास (ECD) प्रशिक्षण में भाग लिया.

व्यावहारिक गतिविधियाँ, जीवन से जुड़े उदाहरण और साथ मिलकर, घर-घर जाकर लोगों से मिलना, तीन दिन के इस प्रशिक्षण का हिस्सा थे. 

इससे उन्हें यह सीखने में मदद मिली कि बच्चों की उम्र के प्रारम्भिक वर्षों में मस्तिष्क विकास कितना महत्वपूर्ण है - और किस तरह एक स्नेहिल खेल, जीवन को दिशा दे सकता है.

पूर्वी भारत के बिहार राज्य के पूर्णिया ज़िले में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता वाजेदा तबस्सुम और मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता पिंकी कुमारी, साथ मिलकर परिवारों से मिलने जाती हैं.
© UNICEF/Raghvendra Kumar

देखभाल का नया तरीक़ा

इससे पहले, दोनों कार्यकर्ता नवजात शिशुओं की देखभाल, बच्चों की उम्र बढ़त की निगरानी और स्तनपान पर सलाह देने जैसे कार्य करती थीं - लेकिन उनका ध्यान केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित था.

वे न तो भाषाई, सामाजिक या खेल के विकास में देरी की पहचान कर रही थीं, और न ही पिता या दादा-दादी को देखभाल में शामिल कर रही थीं.

अब, उनके पास माता व बच्चा संरक्षण (MCP) कार्ड और नवचेतना पॉकेटबुक जैसे साधन हैं - जिससे उन्होंने परिवारों को यह समझाना शुरू किया कि स्पर्श, बोलना और खेलना भी भोजन और दवा जितना ही ज़रूरी है.

उन्होंने लोगों को विभिन्न गतिविधियों के ज़रिए यह दिखाना शुरू किया कि एक चम्मच, ड्रमस्टिक बन सकता है, कप छुपा-छुपी का खिलौना, और पिता की गोद - खेल का सबसे बेहतरीन मैदान.

सोच बदली, ज़िन्दगी बदली

शुरुआत में कई परिवारों ने कहा, “हम बहुत व्यस्त हैं.” कुछ ने कहा, “ये सब ज़रूरी नहीं है.”

लेकिन वाजेदा और पिंकी ने हार नहीं मानी. उन्होंने कहानियाँ सुनाकर, उदाहरण दिखाकर और बार-बार समझाकर - धीरे-धीरे लोगों की मानसिकता बदली. घरों में हँसी व किलकारियाँ लौटी. देखभाल साझी और समावेशी बनी - और सबसे बढ़कर, इसमें खेल जुड़ गया.

पिंकी कहती हैं, “अब हमें गर्व होता है - क्योंकि हम ऐसे बच्चे बनाने में मदद कर रहे हैं जो केवल स्वस्थ ही नहीं, बल्कि ख़ुशहाल और स्मार्ट हैं.”

इंटरऐक्टिव सत्रों व व्यावहारिक प्रदर्शन के ज़रिए अभिभावकों को यह सिखाया जाता है कि वे खेल-आधारित गतिविधियों को अपने परिवार के साथ होने वाली रोज़मर्रा की बातचीत में किस तरह शामिल कर सकते हैं.
© UNICEF/Raghvendra Kumar

पहल का विस्तार

आज, यह केवल दो महिलाओं की कहानी नहीं है - यह एक आन्दोलन बन चुका है. बाइस प्रखंड में 650 प्रशिक्षित कार्यकर्ता और 40 पर्यवेक्षक अब लगभग 10 हज़ार बच्चों तक एकीकृत ECD सेवाएँ पहुँचा रहे हैं - यह सुनिश्चित करते हुए कि हर घर तक शुरुआती देखभाल और खेल आधारित सीख पहुँच सके.

और यह तो बस शुरुआत है.

अगर हम चाहते हैं कि बिहार में और देशभर में हर बच्चा ख़ुशहाल एवं विकसित हो, तो ECD को हर स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा.

साथ ही प्रशिक्षण व नवचेतना जैसी किताबें. और पिंकी और वाजेदा जैसी नायिकाओं की भूमिका बहुत अहम हो जाती है.

क्योंकि जब देखभाल करने वालों को सही जानकारी होती है, तो एक चम्मच, एक गीत, या एक साझा पल भी एक सुनहरे भविष्य की नींव रख सकता है.