जलवायु संकट का सबसे अधिक प्रभाव वृद्धजन पर
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई रिपोर्ट में, एक मौन मगर जानलेवा संकट की चेतावनी दी गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बुज़ुर्ग आबादी ख़ासतौर पर, जलवायु परिवर्तन के कारण गम्भीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना कर रही है.
Frontiers 2025 रिपोर्ट में तापलहरों, बाढ़, पिघलते हिमनदों व जर्जर बुनियादी ढाँचे जैसे, तेज़ी से बढ़ते ख़तरों का विश्लेषण किया गया है, विशेष रूप से उन जोखिमों का, जो कमज़ोर एवं संवेदनशील वर्गों पर अत्यधिक व असमान रूप से प्रभाव डालते हैं.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 1990 के दशक से अब तक, 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में, तापलहर के कारण होने वाली मौतों में लगभग 85% की वृद्धि हुई है.
बुज़ुर्ग आबादी पर गहराता जलवायु संकट
रिपोर्ट के अनुसार, “तापलहरें, बाढ़ और बर्फ़ के पिघलने जैसे जलवायु परिवर्तन के सबसे घातक प्रभावों में से एक हैं. हमें इनका सामना लिए तैयार रहना होगा - ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों जैसे सबसे संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा के लिए.”
रिपोर्ट में कहा गया है कि बुज़ुर्ग लोग, अक्सर पुरानी बीमारियों, चलने-फिरने में कठिनाई या शारीरिक कमज़ोरी से जूझते हैं, वो भीषण गर्मी में जानलेवा ख़तरे का सामना करते हैं.
ये ख़तरे तब और बढ़ जाते हैं जब वो प्रदूषित, भीड़भाड़ वाले शहरों या तटीय इलाक़ों में रहते हैं, जहाँ बुज़ुर्गों की आबादी ज़्यादा है और समुद्र-स्तर लगातार बढ़ रहा है .
रिपोर्ट की सिफ़ारिशें
रिपोर्ट में शहरों को प्रदूषण-मुक्त, सुदृढ़ और सर्वजन के लिए सुलभ बनाने की सिफ़ारिश की गई है, जहाँ हरित क्षेत्रों की पर्याप्त मौजूदगी हो.
इसके लिए प्रमुख रणनीतियों में सुनियोजित शहरी विकास, सामुदायिक-आधारित आपदा जोखिम प्रबन्धन, और बुज़ुर्ग आबादी के लिए जलवायु सम्बन्धी सूचनाओं तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करना शामिल है.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने, 2025 के आरम्भ में, एक नया प्रस्ताव पारित किया था, जिसके अन्तर्गत बुज़ुर्गों के मानवाधिकारों पर, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक बाध्यकारी क़ानूनी दस्तावेज़ तैयार किया जाएगा.
यह एक ऐसा क़दम है, जिसे जलवायु परिवर्तन के सबसे अधिक प्रभाव झेलने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
पिघलती बर्फ़ से जागते पुराने रोगाणु
रिपोर्ट एक और गम्भीर चेतावनी देती है कि हिमनदों और स्थाई रूप से जमी मिट्टी के पिघलने से, हज़ारों साल पुराने वायरस, बैक्टीरिया और फफून्द पुनः सक्रिय हो सकते हैं.
वहीं पुनर्जीवित रोगाणु, एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (रोगाणुरोध प्रतिरोध) को बढ़ा सकते हैं, जिससे संक्रमणों का इलाज कठिन हो जाएगा.
रिपोर्ट में उन ख़तरों की भी स्पष्ट रूप से पहचान की गई है जो ऐसे रासायनिक पदार्थों के पुनः सक्रिय होने से जुड़े हैं, जिन्हें उनके गम्भीर जोखिमों को देखते हुए, दशकों पहले प्रतिबन्ध लगाकर, उन्हें धीरे-धीरे चरणबद्ध रूप से समाप्त कर दिया गया था.
हालाँकि ये रसायन, वर्षों तक तलछट में दबे रहते हैं, और बाढ़ की स्थिति में सतह पर आ सकते हैं.
जब बाढ़ का पानी मिट्टी व मलबे को उथल-पुथल करता है, तो ये विषैले रसायन फिर से सक्रिय होकर शहरी इलाक़ों या खाद्य आपूर्ति तंत्र में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों को गम्भीर नुक़सान पहुँच सकता है.
रिपोर्ट में, इस बढ़ते ख़तरे को कम करने के लिए, कई प्रभावी उपायों की सिफ़ारिश की गई है, मसलन पारम्परिक बाढ़ नियंत्रण ढाँचे, बेहतर जल निकासी प्रणालियाँ, प्रदूषकों की नियमित निगरानी, और इस प्रकार के प्रदूषण के आर्थिक प्रभावों पर अध्ययन करना.
जर्जर बांध और पारिस्थितिकी संकट
यह रिपोर्ट एक नए ख़तरे की ओर संकेत करती है - पुराने और जर्जर बांधों का जोखिम. ये बांध, भले ही सिंचाई और बिजली जैसे लाभ देते हैं, लेकिन आदिवासी समुदायों, मछली पालन और पारिस्थितिकी तंत्र को गम्भीर नुक़सान पहुँचा सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, योरोप और उत्तरी अमेरिका में ऐसे असुरक्षित व अनुपयोगी बांधों को हटाने का चलन बढ़ रहा है.
इससे नदियों की प्राकृतिक धारा बहाल होती है और जैव विविधता तथा पारिस्थितिक तंत्र को पुनर्जीवित करने में मदद मिलती है, जो संयुक्त राष्ट्र की पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन पहल के अनुरूप है.
कार्रवाई ज़रूरी
रिपोर्ट का यह सातवाँ संस्करण, UNEP की Foresight Trajectory पहल का हिस्सा है. यह रिपोर्ट न केवल तेज़ी से उभरते पर्यावरणीय ख़तरों की पहचान करती है, बल्कि उनके सम्भावित समाधान भी प्रस्तुत करती है.
2016 में प्रकाशित पहली रिपोर्ट ने ही, कोविड-19 महामारी से चार साल पहले, ज़ूनोटिक बीमारियों के ख़तरे को लेकर आगाह किया था.
2025 की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब एशिया, योरोप और अमेरिका जैसे क्षेत्र भीषण गर्मी और रिकॉर्ड-तोड़ बारिश से जूझ रहे हैं.
इस वर्ष का सन्देश भी उतना ही तीखा और स्पष्ट है: समय हमारे हाथ से निकलता जा रहा है.
यूनेप की कार्यकारी निदेशक इंगेर ऐंडरसन ने आगाह करते हुए कहा है, "हमारे पास समाधान मौजूद हैं. हम बुज़ुर्गों की रक्षा कर सकते हैं, पारिस्थितिक तंत्र को फिर से जीवित कर सकते हैं, और अगली जलवायु-जनित आपदा को टाल सकते हैं - लेकिन यह तभी सम्भव है, जब हम तुरन्त और निर्णायक कार्रवाई करें."